- पश्चिम बंगाल कभी भारत का सबसे बड़ा औद्योगिक केंद्र था, आज ‘रस्ट बेल्ट’ बन चुका है.
- सिंगूर से टाटा नैनो प्रोजेक्ट का जाना इसमें एक बड़ा टर्निंग पॉइंट रहा.
- 2026 के चुनाव में BJP का फोकस बंगाल की पुरानी चमक वापस लाना है. ऐसे में उद्योग, रोजगार सबसे बड़े मुद्दे हैं.
करीब 50 साल पहले की बात है. तब का कलकत्ता, आज का कोलकाता है, पर तब आज की तरह वहां शोर-शराबा नहीं था. उस वक्त ये शहर तरक्की और खुशहाली की मिसाल था. ये एक ऐसा शहर था जो नए आजाद भारत के सपनों को आवाज देता था. मैंने अपना स्कूल का समय आसनसोल-बर्नपुर जैसे जुड़वा शहरों में बिताया. वहां से कलकत्ता तक का सफर अपने आप में बंगाल के औद्योगिक विकास की कहानी कहता था. ग्रैंड ट्रंक रोड के किनारे-किनारे, जहां मेरा स्कूल सेंट पैट्रिक्स और मेरा घर था उसके ईर्द-गिर्द कई ऐसे शहर आते थे जहां उद्योग फल-फूल रहे थे. बाराकर, कुमारधुबी, कुल्टी, बर्नपुर, आसनसोल, रानीगंज, दुर्गापुर- ये सब बंगाल की अर्थव्यवस्था के मजबूत पहिए थे.
मेरे घर से इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी के प्लांट की चमक साफ दिखती थी. ये कंपनी 1918 में बनी थी, और इसकी शुरुआत 1875 में बंगाल आयरन वर्क्स से हुई थी. मैं ऐसे माहौल में बड़ा हुआ जहां पिघलते लोहे की खुशबू और स्टील बनने की उम्मीद हर तरफ थी. फैक्ट्रियां सिर्फ इमारतें नहीं थीं, बल्कि लोगों की जिंदगी थीं. बर्नपुर क्लब, जहां मैं डिबेट करता था, और ड्यूरंड इंस्टीट्यूट- जहां मैंने कला, संगीत और डांस सीखा- ये सब उस दौर की समृद्धि की निशानी थे. पूर्व की तरफ जाते हुए कोयला खदानों वाले शहर निर्सा, सीतारामपुर, जामुरिया, पांडवेश्वर, चिनाकुड़ी और रानीगंज, एक समय टाटा और बर्ड कंपनी जैसे बड़े उद्योगपतियों के कब्जे में थे. इनके साथ छोटे व्यापारी भी जुड़े थे. आसपास के इलाकों में बिहार और यूपी से आए मजदूर काम करते थे. इसके पश्चिम में बिहार के धनबाद, बोकारो और जमशेदपुर जैसे औद्योगिक शहर थे. बर्नपुर के बाद दुर्गापुर के स्टील प्लांट और केमिकल फैक्ट्रियां इस पूरे औद्योगिक साम्राज्य का ताज थीं.

कोलकाता डॉक सिस्टम का 118 साल पुराना स्विंग ब्रिज- यह पुल लंदन स्थित वेस्ट वुड बेली एंड कंपनी द्वारा 1890 में बनाया गया था
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कोलकाता तब दुनिया के कई बड़े शहरों से भी आगे था
उस समय का कलकत्ता हांगकांग, सिंगापुर, बहरीन और दुबई से भी ज्यादा डायनामिक था. किडरपुर डॉक और बजबज जैसे पोर्ट इसे बड़ा व्यापारिक हब बनाते थे. ये सिर्फ एक शहर नहीं था, बल्कि एक ग्लोबल सेंटर था. यहां दुनिया भर के लोग आते थे. चीन, आर्मेनिया, इराक के यहूदी, सब यहां बसा करते थे. कलकत्ता ने नोबेल पुरस्कार विजेता गुंटर ग्रास, डोमिनिक लैपियर, एलेन गिन्सबर्ग, क्लार्क ब्लेज और अन्य लेखकों को भी अपनी ओर आकर्षित किया, जिन्होंने शहर की भव्यता के साथ-साथ उसकी दुर्दशा के बारे में भी लिखा.
बीबीडी बाग (डलहौजी) के हलचल भरे स्टॉक एक्सचेंज और प्रतिष्ठित इमारतों के बीच फॉर्च्यून 500 कंपनियां फली-फूलीं, जिनका भाग्य कलकत्ता के भाग्य के जुड़ गया. यह वो जगह थी जहां पैसा अवसरों में तब्दील होने का वादा करता था. उस दौरान बंगाल को अक्सर जर्मनी के रूर बेल्ट जैसा कहा जाता था. जर्मनी का रूर बेल्ट, जिसे रूर घाटी भी कहा जाता है, पश्चिमी जर्मनी के नॉर्थ राइन-वेस्टफेलिया राज्य में स्थित एक प्रमुख औद्योगिक महानगरीय क्षेत्र है. यह यूरोप के सबसे बड़े कोयला भंडार और इस्पात उत्पादन केंद्रों में से एक रहा है, जो देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह जर्मन औद्योगीकरण का प्रमुख केंद्र था.
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रूर बेल्ट से रस्ट बेल्ट तक का सफर
आज हालात इसके ठीक विपरीत हैं वही रूर बेल्ट अब रस्ट बेल्ट बन गया है. दुर्गापुर से आसनसोल तक का सफर अब बंद फैक्ट्रियों और सूने शहरों की कहानी कहता है. जहां हांगकांग, सिंगापुर और दुबई आगे बढ़ गए, वहीं कोलकाता और उसके आसपास का इलाका न केवल रुक गया, बल्कि इसे ये कहें कि इसमें गिरावट आ गई तो गलत नहीं होगा. 1970-80 के दशक में लेफ्ट फ्रंट की सरकार के दौरान यूनियनों को ताकत देने के नाम पर हड़तालें, अशांति और अराजकता बढ़ीं. इससे उद्योग धीरे-धीरे खत्म होते गए. 2011 से मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी भी इस गिरावट को रोक नहीं पाईं. 2008 में टाटा मोटर्स ने सिंगूर से नैनो प्रोजेक्ट हटाने का फैसला किया. ये फैसला सीपीआईएम के अंतिम मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के समय हुआ, लेकिन ममता बनर्जी के विरोध प्रदर्शन के चलते हालात ऐसे बने कि प्रोजेक्ट चल नहीं पाया. नतीजा ये हुआ कि टाटा के नैनो का प्रोजेक्ट सिंगूर से गुजरात के सानंद चला गया. यही वो मोड़ था जिसने बंगाल को औद्योगिक रेगिस्तान बना दिया.
बंगाल की गिरावट सिर्फ आर्थिक नहीं, अस्तित्व का संकट
ये वो समय था जब फैक्ट्रिंया बंद हो रही थीं और पूरी एक पीढ़ी के उद्योगपति राज्य छोड़ने को मजबूर हो गए थे. 34 वर्षों के निरंतर शासन के बाद जब करिश्माई ममता बनर्जी ने वाम मोर्चे को सत्ता से बेदखल कर दिया, तब भी बंगाल का पतन रुकने के बजाय जारी रहा. सिंगूर से टाटा मोटर्स के संयंत्र के पलायन ने बंगाल को एक औद्योगिक रेगिस्तान बना दिया. यह विनाश केवल आर्थिक नहीं था, बल्कि इसके अस्तित्व से जुड़ा था. महत्वाकांक्षी उद्योगपतियों की एक पीढ़ी को अपनी ही धरती से निकलकर विदेशी बाजारों में जाना पड़ा. कभी अजेय रहा कलकत्ता अपनी ही गलत विचारधाराओं के कारण लड़खड़ाने लगा. ममता के नेतृत्व वाली तृणमूल पार्टी का अगले 15 वर्षों तक उदय होना, इस वास्तविकता को और भी पुख्ता करता है- यह उद्यम-विरोधी भावना का एक सिलसिला था जो बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य का पर्याय बन चुका था. अपने उद्योगों को लेकर कोलकाता कभी बेहद ताकतवर शहर था वो अब अपनी नीतियों के चलते कमजोर हो गया है. तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन में भी यह स्थिति नहीं बदली.
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2026 चुनाव: उद्योग बना सबसे बड़ा मुद्दा
पश्चिम बंगाल में औद्योगिक गिरावट ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए 2026 के विधानसभा चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बन गई है. यहा मुद्दा टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है. बीजेपी ने डबल इंजन सरकार लाने के साथ ही उद्योगों की वापसी का वादा किया है. यह बीजेपी के चुनावी वादों का आधार है, जिसमें राज्य में निवेश वापस लाने पर जोर दिया गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बंगाल को महा जंगलराज बताते हैं. बीजेपी गुजरात जैसे राज्यों का उदाहरण देकर कहती है कि बंगाल अपनी क्षमता खो चुका है.
आंकड़ों में गिरता बंगाल
1960 में भारत की जीडीपी में बंगाल का हिस्सा 10.5% था. 2023-24 में यह घटकर 5.6% रह गया है. तृणमूल कांग्रेस के शासन के दरम्यान जीएसडीपी ग्रोथ 4.3% रही, जबकि भारत का औसत 5.6% रहा. प्रति व्यक्ति आय अब राष्ट्रीय औसत से 20 फीसद तक कम हो गया है. इस मामले में बंगाल का स्थान आज पूरे देशभर के राज्यों के बीच 21वां है. यहां तक कि ओडिशा भी अब बंगाल से आगे निकल गया है.

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आखिर उद्योग क्यों नहीं आ रहे?
2026 की शुरुआत तक आते-आते बंगाल की अर्थव्यवस्था काफी उलझी हुई हालत में है. यहां एक तरफ सरकार बहुत ज्यादा वेलफेयर योजनाओं पर खर्च कर रही है, ऊपर से कर्ज भी काफी है, और उद्योगों की रफ्तार धीमी है. जबकि बंगाल के पास पूर्वी भारत का बड़ा ट्रेड हब बनने की पूरी क्षमता है. 2025-26 में राज्य की अर्थव्यवस्था 7.62% की दर से बढ़ने का अनुमान है, लेकिन अंदरूनी कमजोरियां अब भी बनी हुई हैं, जिसकी वजह से पश्चिम और दक्षिण भारत के तटीय राज्यों के मुकाबले बंगाल पीछे रह रहा है.
बंगाल की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है. भारत की कुल जीडीपी में बंगाल का हिस्सा हर दशक के साथ घटता गया है. 1960-61 में बंगाल देश की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था और जीडीपी में 10.5% योगदान देता था. लेकिन 2023-24 तक ये घटकर करीब 5.6% रह गया. समुद्र किनारे होने के बावजूद बंगाल अपने इस फायदे का सही इस्तेमाल नहीं कर पाया, जबकि गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने इसका पूरा फायदा उठाया.
जब से 20 मई 2011 को टीएमसी सत्ता में आई, तब से बंगाल की जीएसडीपी ग्रोथ देश के औसत से कम ही रही है. 2012-13 से 2021-22 के बीच बंगाल की ग्रोथ 4.3% रही, जबकि पूरे भारत की औसत ग्रोथ 5.6% रही. राज्य में आबादी बहुत ज्यादा है और विकास की रफ्तार धीमी है, इसलिए प्रति व्यक्ति आय भी कमजोर है. बंगाल इस मामले में सभी राज्यों में 21वें नंबर पर है और यहां की प्रति व्यक्ति आय देश के औसत से करीब 20% कम है. जबकि 1960-61 में यही आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से 127.5% ज्यादा था. गिरावट इतनी ज्यादा है कि 2023-24 में बंगाल की प्रति व्यक्ति आय 83.7% रह गई, जो ओडिशा (88.5%) से भी कम है.
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उद्योग और निवेश में दिक्कतें
बंगाल में मैन्युफैक्चरिंग और निवेश का प्रदर्शन लगातार कमजोर रहा है. 2012 से 2020 के बीच यहां मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर सिर्फ 6.6% बढ़ा, जबकि पूरे देश का औसत 8.6% था. कोविड के बाद थोड़ी सुधार हुई और ये करीब 8% तक पहुंचा. राज्य में बड़े उद्योग लाना मुश्किल रहा है, क्योंकि जमीन अधिग्रहण के नियम जटिल हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर है और सरकारी कामकाज में देरी होती है. बिजनेस करने में आसानी के मामले में भी बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों से पीछे है. इसका मतलब है कि जमीन अधिग्रहण की समस्या, खराब इंफ्रास्ट्रक्चर, सरकारी देरी और बिजनेस करने में मुश्किलें जैसी समस्याएं बंगाल में उद्योगों को आने से रोक रहे हैं.
ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में बंगाल 22-25वें स्थान पर
सरकार सामाजिक योजनाओं पर काफी खर्च कर रही है, लेकिन इसके बावजूद हालात बहुत अच्छे नहीं हैं. ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स यानी मानव विकास सूचकांक में बंगाल दक्षिण भारत के राज्यों से पीछे है. बंगाल का एचआईडी करीब 0.65 है और इसकी रैंकिंग 22 से 25 के बीच है, जबकि केरल का 0.78 और तमिलनाडु का 0.71 है.
राज्य ने ऐसा मॉडल अपनाया है जिसमें वेलफेयर को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है, जैसे लक्ष्मी भंडार योजना. बजट का करीब 45% हिस्सा सामाजिक योजनाओं पर खर्च होता है. लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इससे एक मजबूत और खुद चलने वाली अर्थव्यवस्था नहीं बन पा रही.

कलकत्ता (कोलकाता) के बंदरगाह पर भाप के जहाज और मछली पकड़ने वाली नावें
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पुराना बंगाल याद करने वालों के लिए दर्दनाक तस्वीर
जो लोग बंगाल और कोलकाता के पुराने सुनहरे दौर को जानते हैं, उनके लिए आज की हालत बहुत दुख देने वाली है. एक समय का ताकतवर शहर आज गिर चुका है. ये दिखाता है कि अगर धन बनाने और उद्योग बढ़ाने पर ध्यान नहीं दिया जाए, तो क्या हाल हो सकता है. ये एक चेतावनी भी है कि सरकार का रोल बहुत अहम होता है, ऐसा माहौल बनाने में जहां बिजनेस बढ़े, न कि दब जाए.
2026 चुनाव: बीजेपी का फोकस- बंगाल की पुरानी चमक वापस लाना
2026 का चुनावी माहौल काफी गर्म है और ये ममता बनर्जी के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. बीजेपी ने सिंगूर में बंद पड़े टाटा नैनो फैक्ट्री को मिस्ड अपॉर्चुनिटी का प्रतीक बना दिया है और फिर से उद्योग लाने का वादा किया है. उनका मुख्य वादा है रोजगार पैदा करना, मजदूरों का पलायन रोकना और बंगाल की खोई पहचान वापस लाना. विपक्षी पार्टी ने ये भी कहा है कि सत्ता में आने के एक साल के भीतर बड़े उद्योग लगाए जाएंगे. साथ ही ये वादा भी किया है कि बहु-फसली जमीन जबरन नहीं ली जाएगी, जो पहले बड़ा विवाद रहा है. बीजेपी नेताओं का कहना है कि लेफ्ट और टीएमसी सरकारों के दौरान बंगाल जीडीपी और उद्योग दोनों में काफी पीछे चला गया है, और वो इस ट्रेंड को बदल सकते हैं.
ये पूरा आर्थिक मुद्दा टीएमसी के खिलाफ एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें सिंडिकेट राज (भ्रष्टाचार), कानून व्यवस्था और घुसपैठ जैसे मुद्दे भी शामिल हैं. खास बात ये है कि उद्योग वाला मुद्दा खास तौर पर युवाओं और कारोबारियों को ध्यान में रखकर उठाया जा रहा है.
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