- गौतम अदाणी ने कहा कि भारत को AI को रोजगार घटाने वाली शक्ति नहीं, बल्कि अवसर सृजित करने वाली समझना चाहिए
- अदाणी के अनुसार पश्चिमी देशों से आ रहे AI से नौकरियां खत्म होने के भय को भारत को सही नहीं मानना चाहिए
- अदाणी ने यूपीआई के शुरुआत में उसके सीमित दृष्टिकोण की तुलना AI के भविष्य के व्यापक प्रभाव से की है
CII Annual Business Summit 2026: क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के आने से नौकरियां कम होंगी? कई लोगों को ऐसा लगता है, लेकिन अदाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अदाणी का मानना है कि भारतीयों को ऐसा नहीं सोचना चाहिए. भारत को AI को रोजगार खत्म करने वाली नहीं, बल्कि उत्पादकता और नए अवसर सृजित करने वाली शक्ति के रूप में देखना चाहिए. जिस तरह UPI ने डिजिटल भरोसे और कारोबार को बदला. अदाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अदाणी आज नई दिल्ली में आयोजित हो रहे CII Annual Business Summit 2026 के स्पेशल प्लेनरी सेशन को संबोधित कर रहे थे.
AI को लेकर सिर्फ डर
गौरम अदाणी ने कहा, "वैश्विक स्तर पर राजनीतिक बैठकों में AI को लेकर एक खास तरह की कहानी सुनने को मिलती है. इसमें कहा जाता है कि AI नौकरियां खत्म कर देगा. तकनीक मानवीय निर्णय लेने की क्षमता को बदल देगी. कहा जा रहा है कि दक्षता का अर्थ है कम लोग. मैं इस कहानी को पूरी तरह से खारिज करता हूं. भारत को पश्चिमी देशों से आ रहे इस भय को सही नहीं मानना चाहिए. कोई भी देश न केवल अपनी क्षमता की कमी से, बल्कि दूसरों की मान्यताओं को सत्य मानकर भी अपने भविष्य को सीमित कर सकता है."

UPI को लेकर भी लोगों को भ्रम था
अदाणी ग्रुप के चेयरमैन ने कहा, "भारत को AI को एक ऐसी शक्ति के रूप में विकसित करना चाहिए जो अवसरों को छीनती नहीं, बल्कि उत्पादकता बढ़ाती है, नए रोजगार सृजित करती है, छोटे व्यवसायों को सशक्त बनाती है और भारतीयों को सर्वश्रेष्ठ के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए आवश्यक उपकरण प्रदान करती है. जब यूपीआई लॉन्च हुआ था, तब कई लोगों ने इसे केवल एक भुगतान प्रणाली माना था. यूपीआई को समझने का यह बहुत ही छोटा नजरिया था. मेरा मानना है कि जैसे UPI ने भरोसे को लोकतांत्रिक बनाया, वैसे ही AI नए बाज़ार, नए व्यवसाय और नए उद्यम खड़े करेगा."
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अदाणी समूह के चेयरमैन ने कहा कि 'सपाट दुनिया' का दौर खत्म हो चुका है और आज की दुनिया ऊर्जा, डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर केंद्रित खंडित व्यवस्था में प्रवेश कर चुकी है. उनका तर्क था कि ऊर्जा सुरक्षा और डिजिटल सुरक्षा अब अलग‑अलग नहीं रहीं. जो देश अपनी ऊर्जा और कम्प्यूट क्षमता को नियंत्रित करता है, वही अपना औद्योगिक और बौद्धिक भविष्य तय करेगा. अमेरिका और चीन के उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे दोनों देशों ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता और AI संप्रभुता को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया.
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