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Census 2027 Explainer: लद्दाख से शुरू होगी आजाद भारत की पहली जाति जनगणना, जानिए कैसे होगा पूरा काम?

भारत में पहली बार आजादी के बाद होने वाली जनगणना में जाति को भी दर्ज किया जाएगा. इसकी शुरुआत देश के बाकी हिस्सों से पहले लद्दाख और बर्फीले इलाकों से होगी. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जाति पूछी कैसे जाएगी और उसके जवाब को दर्ज करने का तरीका क्या होगा?

Census 2027 Explainer: लद्दाख से शुरू होगी आजाद भारत की पहली जाति जनगणना, जानिए कैसे होगा पूरा काम?
लद्दाख से शुरू होगी जाति जनगणना
Census Government of India
  • जनगणना 2027 का दूसरा चरण अगले महीने से शुरू होने जा रहा है. इसमें जाति गणना भी होगी.
  • पूरे देश में सबसे पहले लद्दाख की आबादी की गिनती होगी.
  • जनगणना से मिलने वाले जनसांख्यिकीय डेटा आने वाले वर्षों की सरकारी नीतियों के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं.

जनगणना 2027 का दूसरा चरण अगले महीने से शुरू होने जा रहा है. पहली बार आजाद भारत की नियमित जनगणना में जाति से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाएगी. यह देश की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना है. इसके दूसरे चरण की प्रक्रिया में लद्दाख की भूमिका खास हो गई है. देश के सबसे ऊंचाई पर बसे इलाकों में शामिल लद्दाख की आबादी की गिनती बाकी देश से पहले होगी. लेकिन लद्दाख में जनगणना का तरीका थोड़ा अलग होगा. दरअसल, अभी चल रही जनगणना भारत की पहली डिजिटल जनगणना है, लेकिन लद्दाख के लिए अपवाद स्वरूप बड़ी संख्या में कागज के फॉर्म भी छपवाए जा रहे हैं.

यह कदम चीन और पाकिस्तान की सीमा से लगे इस इलाके में मौजूद कई रक्षा प्रतिष्ठानों को ध्यान में रखकर उठाया गया है, जिनकी लोकेशन सुरक्षा कारणों से जियो-टैग नहीं की जा सकती.

डिजिटल जनगणना में डेटा इकट्ठा करने वालों (एन्यूमरेटर) के लिए मोबाइल ऐप पर इमारतों या ढांचों की जियो-लोकेशन दर्ज करना जरूरी है. जो लोग जनगणना पोर्टल पर खुद अपनी जानकारी भरते हैं, उन्हें भी ऐसा ही करना होता है.

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Photo Credit: Census Government of India

जनगणना 2027 में जाति की गिनती कैसे होगी?

उपलब्ध तैयारियों के मुताबिक जनसंख्या गणना के लिए करीब 40 सवालों वाला फॉर्म तैयार किया गया है. अंतिम प्रश्नावली को भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त की ओर से अधिसूचित किया जाना बाकी है. सबसे महत्वपूर्ण बदलाव जाति से जुड़ा है.

जाति के लिए खुला कॉलम रखने की तैयारी है. इसका मतलब यह होगा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पहले से तय श्रेणियों के अलावा दूसरे लोग अपनी जाति का नाम जैसा बताएंगे, उसे उसी रूप में दर्ज किया जाएगा.

यानी गणनाकर्मी किसी सीमित सूची में से जाति चुनने के बजाय व्यक्ति द्वारा बताई गई जाति का नाम दर्ज कर सकता है. यही तरीका जाति गणना को लेकर सबसे बड़ी चुनौती भी पैदा करता है.

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Photo Credit: Census Government of India

खुला जाति कॉलम इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

भारत में जाति के नाम अलग-अलग क्षेत्रों, भाषाओं और सामाजिक समूहों में अलग तरीके से इस्तेमाल होते हैं. एक ही सामाजिक समूह के लिए अलग-अलग नाम हो सकते हैं. कई बार किसी जाति, उपजाति, समुदाय या स्थानीय पहचान को लोग अपनी जाति के रूप में बताते हैं.

लिहाजा अगर लोगों से पूछा जाए कि उनकी जाति क्या है और जवाब को बिना किसी तय सूची के दर्ज किया जाए, तो बड़ी संख्या में अलग-अलग नाम सामने आ सकते हैं. इसका उदाहरण 2011 का सामाजिक-आर्थिक और जाति सर्वेक्षण है.

अंग्रेजी अखबार द हिंदू के मुताबिक सामाजिक-आर्थिक और जाति सर्वेक्षण 2011 (SECC) में जाति से जुड़े जवाबों के आधार पर 46 लाख से अधिक अलग-अलग जाति नाम सामने आए थे. हालांकि इसे सामान्य जनगणना के समान नहीं माना जा सकता क्योंकि यह एक सर्वे था जो जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत होने वाली नियमित जनगणना का हिस्सा नहीं था.

सरकार ने बाद में 2011 SECC के जाति संबंधी आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए और डेटा में गलतियों का हवाला दिया. इसी वजह से 2011 में जुटाया गया जाति संबंधी पूरा डेटा सार्वजनिक नहीं किया गया.

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1931 में कितनी जातियां दर्ज हुई थीं?

जाति गणना को समझने के लिए 1931 की जनगणना महत्वपूर्ण है. 1931 की जनगणना में कुल 4,147 जातियां दर्ज की गई थीं. यह आखिरी बार था जब स्वतंत्र भारत में नियमित जनगणना के साथ ही जाति गणना भी कई गई थी.

हालांकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़ी जानकारियां नियमित रूप से दर्ज की जाती रही हैं. अब जनगणना 2027 में बड़े बदलाव के तौर पर जाति को शामिल करने का फैसला किया गया है. 

इससे सरकार के पास देश की सामाजिक संरचना से जुड़ा एक नया और व्यापक आंकड़ा तैयार हो सकता है. इसका इस्तेमाल सामाजिक कल्याण योजनाओं, आरक्षण से जुड़ी बहस, सरकारी नीतियों और संसाधनों के वितरण जैसे मुद्दों पर चर्चा में किया जा सकता है. हालांकि असली चुनौती आंकड़ा जुटाने के बाद उसकी सफाई, वर्गीकरण और व्याख्या की होगी.

लद्दाख से सबसे पहले क्यों शुरू होगी जनगणना?

लद्दाख और कुछ दूसरे पहाड़ी तथा बर्फीले इलाकों में मौसम की परिस्थितियां सामान्य राज्यों से अलग हैं. सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण कई इलाकों तक पहुंच मुश्किल हो जाती है. इसलिए इन क्षेत्रों में जनगणना का कार्यक्रम देश के बाकी हिस्सों से अलग समय पर रखा गया है.

भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त की 3 अगस्त की अधिसूचना के अनुसार लद्दाख तथा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ बर्फीले क्षेत्रों में जनगणना का काम सितंबर 2026 में किया जाना है.

इन इलाकों के लिए जनसंख्या गणना का निर्धारित समय 1 सितंबर से 30 सितंबर 2026 है. इसके बाद 1 अक्टूबर से 5 अक्टूबर तक संशोधन चरण रखा गया है. इससे पहले 17 से 31 अगस्त तक सेल्फ इन्युमरेशन यानी स्व-गणना का विकल्प उपलब्ध कराया गया है.

देश के अधिकांश हिस्सों में इस वक्त सेल्फ इन्युमरेशन हो चुका है. सितंबर तक हाउसलिस्टिंग की जानी है. इसके बाद गणना फरवरी 2027 में होने की योजना है. 1 मार्च, 2027 को पूरे देश के लिए जनगणना की संदर्भ तारीख रखी गई है. यानी इस तारीख के बाद जन्म लिए बच्चे की गिनती इस जनगणना में नहीं होगी, वहीं जिस व्यक्ति की मौत इस तारीख से पहले हो गई है, जनगणना में उसे भी जगह नहीं दी जाएगी.

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Photo Credit: Ladakh Tourism

डिजिटल जनगणना है तो लद्दाख में कागज का इस्तेमाल क्यों?

भारत की पहली डिजिटल जनगणना में गणनाकर्मी मोबाइल एप के जरिए घरों और दूसरी संरचनाओं की जानकारी दर्ज करेंगे. इसमें जियो-लोकेशन यानी घरों की संरचनाओं की लोकेशन को टैग करना महत्वपूर्ण होगा. लेकिन सीमा से लगे इलाकों में यही व्यवस्था सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील हो सकती है.

लद्दाख पश्चिम और उत्तर-पश्चिम में पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र के साथ अपनी सीमा साझा करता है. वहीं लद्दाख की पूर्वी सीमा चीन (तिब्बत और शिनजियांग क्षेत्र) से लगती है.

चीन और पाकिस्तान से लगी सीमाओं के पास कई महत्वपूर्ण रक्षा प्रतिष्ठान मौजूद हैं. ऐसे स्थानों की सटीक भौगोलिक स्थिति को डिजिटल डिवाइस में दर्ज करना सुरक्षा से जुड़ा जोखिम पैदा कर सकता है. इसी कारण संवेदनशील रक्षा ढांचों के लिए कागजी फॉर्मों का इस्तेमाल किए जाने की तैयारी है.

गणनाकर्मियों को निर्देश दिया जा रहा है कि ऐसे रक्षा ढांचों को विशेष श्रेणी में दर्ज करें और उनकी संवेदनशील लोकेशन को डिजिटल रूप से जियो-टैग न करें.

तो जनगणना 2027 पहली बार डिजिटल होने के बावजूद कुछ खास परिस्थितियों में कागजी प्रक्रिया को भी साथ लेकर चलेगी.

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जनगणना 2027 में कितने सवाल होंगे?

अभी अंतिम प्रश्नावली आधिकारिक रूप से नहीं बताई गई है. हालांकि द हिंदू ने जनगणना अधिकारियों के हवाले से बताया है कि करीब 40 सवालों वाला फॉर्म तैयार किया जा रहा है.

इनमें आबादी और परिवार से जुड़े विभिन्न जनसांख्यिकीय सवाल शामिल होंगे. जाति से जुड़ा सवाल भी इसका हिस्सा होगा.

40 सवालों की बात अभी मौजूद सार्वजनिक खबर के मुताबिक है, अंतिम संख्या और हर सवाल की सटीक भाषा आधिकारिक प्रश्नावली जारी होने के बाद ही निश्चित मानी जाएगी.

People wear traditional costumes to a celebration of the new season and blooming of apricot trees in Leh

लेह में पारंपरिक पोशाक में खुबानी के पेड़ों पर फल खिलने का जश्न मनाते लोग
Photo Credit: Ladakh Tourism

क्या हर व्यक्ति से उसकी जाति पूछी जाएगी?

जनगणना 2027 में जाति गणना का प्रस्ताव इसी दिशा में है कि लोगों से जाति संबंधी जानकारी ली जाए और जवाब को दर्ज किया जाए.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जाति के लिए खुला कॉलम रखने की तैयारी है.

इसका अर्थ है कि जवाब देने वाला व्यक्ति अपनी जाति का नाम बताएगा और गणनाकर्मी उसे दर्ज करेगा.

यहीं से आगे डेटा को व्यवस्थित करना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती बन सकता है.

मान लीजिए एक ही समुदाय को अलग-अलग लोग अलग नामों से बताते हैं. किसी जगह उपजाति का नाम प्रचलित है तो कहीं व्यापक जाति का नाम. ऐसे में कच्चे आंकड़ों में बड़ी संख्या में अलग-अलग नाम दिखाई दे सकते हैं.

इसलिए जाति की गिनती केवल घर-घर जाकर नाम लिखने तक सीमित नहीं होगी. इसके बाद आंकड़ों की जांच, समान नामों की पहचान, वर्गीकरण और डेटा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा.

हालांकि इस जनगणना से मिलने वाला सामाजिक और जनसांख्यिकीय डेटा आने वाले वर्षों की सरकारी नीतियों के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं.

ये भी पढ़ें: जनगणना के पहले दौर में पूछे गए 33 सवाल, देखें पूरी लिस्ट?

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