- TMC की अगुवाई में विपक्ष ने CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव लोकसभा और राज्यसभा में पेश किया है
- संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज हटाने जैसी प्रक्रिया अपनाई जाती है
- नोटिस पर लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति विचार करेंगे और जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की जाएगी
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ टीएमसी की अगुवाई में विपक्ष ने हटाने का प्रस्ताव दिया है. करीब 10 पन्नों वाले नोटिस में 7 बिंदु गिनाए गए हैं, जिनके आधार पर ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव किया गया है. लोकसभा में दिए गए नोटिस में 130 सांसदों के, जबकि राज्यसभा में दिए गए नोटिस में 63 सांसदों के हस्ताक्षर करवाए गए हैं. प्रस्ताव लाने की पहल तृणमूल कांग्रेस की तरफ से की गई थी लेकिन ज्यादातर विपक्षी पार्टियों के सांसदों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं. हालांकि न तो लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और न ही राज्यसभा में विपक्ष के मल्लिकार्जुन खरगे हस्ताक्षर करने वालों में शामिल हैं.
क्या होती है प्रक्रिया ?
संविधान के अनुच्छेद 324 (5) में मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का प्रावधान किया गया है. इस अनुच्छेद के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए वैसी ही प्रक्रिया अपनाई जाएगी जो सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाने की होती है. सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को उसके पद से हटाने का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 124 (4) में किया गया है. इसमें साफ किया गया है कि जज को केवल दो आधार पर ही हटाया जा सकता है - दुर्व्यवहार और कार्य निष्पादन में अक्षमता. 124 (5) के मुताबिक संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत के द्वारा एक प्रस्ताव पारित करके राष्ट्रपति को किसी जज को हटाने की सिफारिश की जा सकती है. इस पूरी प्रक्रिया का कोई नाम तो नहीं दिया गया है लेकिन आम तौर पर इसे महाभियोग प्रस्ताव के नाम से जाना जाता है.
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सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाने की पूरी प्रक्रिया जजेज इंक्वायरी एक्ट 1968 (Judges Inquiry Act) में दी गई है. इसके मुताबिक हटाने का नोटिस दिनों में से किसी एक सदन में या दोनों सदनों में एक साथ दिया जा सकता है. ऐसे संकेत हैं कि ज्ञानेश कुमार को हटाने का नोटिस दोनों सदनों में एक साथ दिया जाएगा. चूंकि नोटिस दोनों सदनों में एक साथ दिए जाने की संभावना है, ऐसे में राज्यसभा के सभापति और लोकसभा के अध्यक्ष मिलकर नोटिस पर विचार करेंगे.
लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति के पाले में है गेंद
कानूनी प्रावधान के मुताबिक विचार करने के बाद ये फैसला लिया जाएगा कि नोटिस स्वीकृत किया जाए या नहीं. नोटिस स्वीकृत होने की स्थिति में ज्ञानेश कुमार पर लगे आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमिटी बनाई जाएगी. कमिटी के लिए जांच पूरा करने की कोई समय सीमा नहीं होती है. कमिटी की रिपोर्ट आने के बाद उसे दोनों सदनों में पेश किया जाएगा. अगर रिपोर्ट में ज्ञानेश कुमार पर लगाए गए आरोप गलत पाए जाते हैं तो मामला वहीं ख़त्म हो जाएगा लेकिन अगर आरोप सही पाए गए तो लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति आपस में सहमति बनाकर दोनों में से किसी एक सदन में महाभियोग का प्रस्ताव पेश करने की इजाजत देंगे.
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विपक्ष के पास संख्या का अभाव
प्रस्ताव को पारित करवाने के लिए विशेष बहुमत की ज़रूरत होती है. विशेष बहुमत का मतलब होता है सदन की कुल सदस्य संख्या का कम से कम 50 फीसदी और वोटिंग के समय मौजूद कुल सदस्यों के एक तिहाई सदस्यों का समर्थन. इसका मतलब ये हुआ कि संख्या बल के आधार पर महाभियोग का प्रस्ताव जिस भी सदन में पहले पेश होगा वहीं पर खारिज कर दिया जाएगा,क्योंकि दोनों में से किसी सदन में विपक्ष के पास विशेष बहुमत लायक संख्याबल नहीं है.
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