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मुंबई में अब वड़ा पाव पर पॉलिटिक्स, फडणवीस के वार पर सामना में पलटवार

महाराष्ट्र में महानगरपालिका चुनाव प्रचार खत्म होते ही सामना के संपादकीय ‘वड़ा-पाव जिंदाबाद!’ ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया है. शिवसेना (UBT) ने फडणवीस के बयान को मराठी अस्मिता का अपमान बताते हुए महायुति सरकार पर तीखा हमला बोला है.

मुंबई में अब वड़ा पाव पर पॉलिटिक्स, फडणवीस के वार पर सामना में पलटवार
  • शिवसेना UBT के मुखपत्र सामना ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के वड़ा-पाव संबंधी बयान पर तीखा हमला बोला है
  • सामना ने वड़ा-पाव को मराठी स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताते हुए इसकी वैश्विक पहचान पर जोर दिया है
  • संपादकीय में मुंबई और महाराष्ट्र के उद्योग गुजरात जाने और मराठी युवाओं के रोजगार पर सवाल उठाए गए हैं
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मुंबई:

महाराष्ट्र में मुंबई समेत 29 महानगरपालिकाओं के चुनाव प्रचार के समाप्त होते ही राजनीतिक तापमान चरम पर पहुंच गया है. इसी पृष्ठभूमि में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के मुखपत्र ‘सामना' ने अपने संपादकीय ‘वड़ा-पाव जिंदाबाद!' के जरिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और महायुति सरकार पर तीखा हमला बोला है.

‘वड़ा-पाव' बयान पर बवाल

सामना का मुख्य निशाना मुख्यमंत्री फडणवीस का वह बयान है, जिसमें उन्होंने कहा था कि, “शिवसेना ने मराठी युवाओं को सिर्फ वड़ा-पाव के ठेले दिए, हम उद्योग और रोजगार देंगे.”

शिवसेना (UBT) ने इस बयान को मराठी श्रमिक वर्ग और संघर्ष के इतिहास का अपमान बताया है. संपादकीय में याद दिलाया गया है कि शिवसेना की स्थापना के समय मुंबई में मराठी युवाओं को नौकरियों से वंचित रखा जाता था, तब वड़ा-पाव जैसे छोटे व्यवसायों ने हजारों परिवारों का चूल्हा जलाया.

वड़ा-पाव: मजबूरी नहीं, स्वाभिमान

संपादकीय के अनुसार, वड़ा-पाव सिर्फ एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि मराठी स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है. सामना ने दावा किया कि आज वड़ा-पाव न्यूयॉर्क, इंग्लैंड और यूरोप तक पहुंच चुका है और लाखों लोगों को रोजगार दे रहा है.

फडणवीस पर कटाक्ष करते हुए सामना ने लिखा कि जो लोग इडली-सांभर, ढोकला-फाफड़ा और अन्य क्षेत्रीय व्यंजनों की प्रशंसा करते हैं, वही लोग मराठी वड़ा-पाव को हेय दृष्टि से देखते हैं.

गुजरात पलायन और रोजगार पर भी उठाए सवाल

संपादकीय में मुख्यमंत्री से सीधा सवाल पूछा गया है कि जब मुंबई और महाराष्ट्र के उद्योग गुजरात ले जाए जा रहे हैं, तो मराठी युवाओं को रोजगार कहां से मिलेगा?

सामना में याद दिलाया गया कि उद्योगों में 80 प्रतिशत भूमिपुत्रों को प्राथमिकता दिलाने की लड़ाई उसने लड़ी थी, लेकिन मौजूदा सरकार ने उसी नीति को कमजोर कर दिया है.

यह चुनाव मराठी अस्मिता की लड़ाई है

सामना के अनुसार, यह चुनाव सिर्फ सत्ता का नहीं बल्कि मराठी माणूस के अस्तित्व और आत्मसम्मान की लड़ाई है. संपादकीय बेहद आक्रामक अंदाज़ में कहता है कि इस बार मराठी समाज को अपने अधिकारों के खिलाफ खड़े लोगों को “उबलते तेल में तले वड़े की तरह बाहर निकाल देना चाहिए.”

संपादकीय में चुनावी माहौल को गुंडागर्दी, भीड़ और पैसे की राजनीति से जोड़ते हुए आरोप लगाया गया है कि यह चुनाव अब आम मतदाता का नहीं, बल्कि बाहुबल और धनबल का बनता जा रहा है.

 ‘गुंडाराज' का लगाया आरोप

सामना ने पुणे में चुनावी माहौल के बीच कुख्यात अपराधी गजा मारणे की रिहाई और मुंबई में “बाहरी तत्वों” को लाकर मराठी जनता को कथित रूप से डराने का मुद्दा उठाया है. संपादकीय में भाजपा पर आरोप लगाया गया है कि मराठी माणूस के पक्ष में एक भी नेता खुलकर सामने नहीं आया, बल्कि मुख्यमंत्री ने ऐसे तत्वों का समर्थन किया, जिन्होंने मराठी समाज को धमकाया.

संपादकीय का दावा है कि इसी नाराज़गी के चलते शिवाजी पार्क में मुख्यमंत्री फडणवीस और एकनाथ शिंदे की समापन सभा का मराठी जनता ने बहिष्कार किया, जबकि 11 तारीख को ठाकरे बंधुओं की सभा में भारी जनसैलाब उमड़ा.

कुर्सियां रह गयी खाली

सामना ने 12 तारीख की फडणवीस–शिंदे सभा को लेकर भी तीखे सवाल खड़े किए हैं. संपादकीय के मुताबिक, जहां 22 हजार कुर्सियां लगाई गई थीं, वहां मुश्किल से ढाई हजार लोग पहुंचे, और उनमें से कई के बारे में दावा किया गया कि उन्हें पैसे देकर लाया गया. संपादकीय में यह भी चेतावनी दी गई है कि प्रचार खत्म होने के बाद पैसे के दम पर वोट खरीदने की कोशिशें तेज होंगी, लेकिन मराठी जनता से अपील की गई है कि वह “हराम का पैसा लेकर महाराष्ट्र का सौदा न करे.”

‘वड़ा-पाव जिंदाबाद!' संपादकीय के जरिए शिवसेना (UBT) ने साफ संकेत दिया है कि वह इस चुनाव को मराठी अस्मिता बनाम सत्ता की राजनीति के रूप में पेश करेगी. मुख्यमंत्री फडणवीस के बयान को लेकर उठा विवाद आने वाले मतदान में कितना असर डालेगा,यह तो नतीजे बताएंगे, लेकिन इतना तय है कि वड़ा-पाव अब सिर्फ नाश्ता नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीक बन चुका है.

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