तीन नवजातों की जान लेने वाली अमरावती अस्पताल त्रासदी में राज्य सरकार ने स्वास्थ्य विभाग के पांच अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की सिफारिश की है. इनमें अकोला के स्वास्थ्य उपनिदेशक और अस्पताल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट भी शामिल हैं. हालांकि जांच में अस्पताल की फायर सेफ्टी व्यवस्था पूरी तरह फेल मिलने और विद्युत सुरक्षा मानकों में गंभीर खामियां सामने आने के बावजूद लोक निर्माण विभाग (PWD) और विद्युत विभाग के अधिकारियों पर कोई कार्रवाई प्रस्तावित नहीं किए जाने से नए सवाल खड़े हो गए हैं.
सरकार की ओर से जारी निर्देशों के अनुसार, इस मामले में दो कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने की भी सिफारिश की गई है. जांच में पाया गया कि अस्पताल में आग लगने की स्थिति से निपटने के लिए लगाए गए फायर अलार्म और स्प्रिंकलर सिस्टम पूरी तरह निष्क्रिय थे. यानी आपात स्थिति में मरीजों और कर्मचारियों को चेतावनी देने और आग पर शुरुआती नियंत्रण की व्यवस्था काम ही नहीं कर रही थी.
सुरक्षा मानकों का पालन करने में कई स्तरों पर चूक
घटना के बाद गठित जांच में सामने आया कि सुरक्षा मानकों का पालन करने में कई स्तरों पर चूक हुई. इसी आधार पर राज्य सरकार ने पांच स्वास्थ्य अधिकारियों के खिलाफ निलंबन की सिफारिश की. लेकिन मामले का सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब फायर सेफ्टी सिस्टम काम नहीं कर रहा था और विद्युत ऑडिट समय पर नहीं हुए, तो इन व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभालने वाले PWD और विद्युत विभाग के अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई.
अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में फायर सेफ्टी और विद्युत सुरक्षा को सबसे अहम माना जाता है. ऐसे में तीन मासूमों की जान जाने के बाद जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल आने वाले दिनों में और तेज हो सकते हैं. फिलहाल सरकार ने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता चुना है, जबकि PWD और विद्युत विभाग की भूमिका पर निगाहें टिकी हुई हैं.
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