अदाणीकॉनेक्स की ओर से गूगल के साथ साझेदारी में विशाखापत्तनम में विकसित किए जा रहे प्रस्तावित डेटा सेंटर परिसरों में एयर-कूलिंग प्रणाली का इस्तेमाल किया जाएगा. इसका उद्देश्य पानी आधारित वाष्पीकरण शीतलन प्रणाली की जरूरत को खत्म करना और तीनों स्थलों पर ताजा पानी की कुल खपत को एक ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल में समाने वाले पानी से भी कम रखना है. परियोजना से जुड़े सूत्रों ने यह जानकारी दी. मुदासरलोवा और तारलुवाड़ा में प्रस्तावित ये परिसर लगभग एक गीगावाट क्षमता वाली डेटा सेंटर परियोजना का हिस्सा हैं. आंध्र प्रदेश का विशाखापत्तनम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और डिजिटल बुनियादी ढांचे के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. परंपरागत डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाली इवेपोरेशन बेस्ड कूलिंग सिस्टम और कूलिंग टावर के बजाय प्रस्तावित परिसरों में हवा आधारित कूलिंग टेक्नोलॉजी अपनाई जाएगी. इससे ऐसी पारंपरिक प्रणालियों में इस्तेमाल होने वाले पानी की बड़ी मात्रा की जरूरत नहीं पड़ेगी.
सूत्रों के मुताबिक, तीनों स्थल पर सीमित मात्रा में आवश्यक ताजा पानी का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा बागवानी, रसोई और कर्मचारियों की सुविधाओं के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. परिसर के भीतर पानी का शोधन कर उसका पुनः उपयोग भी किया जाएगा.परियोजना के तहत नगर निगम की जलापूर्ति व्यवस्था से पानी लेने के बजाय औद्योगिक जलापूर्ति के लिए अलग कनेक्शन उपलब्ध कराए जाएंगे. इसका उद्देश्य घरेलू उपभोक्ताओं के लिए पेयजल आपूर्ति पर अतिरिक्त दबाव पड़ने से रोकना है.
परिसरों में डोमेस्टिक वेस्ट वाटर के लिए जीरो डिस्चार्ज पॉलिसी अपनाई जाएगी. इसके तहत परिसर में स्थापित सीवेज ट्रीटमेंट प्लान में वेस्ट वाटर को ट्रीट किया जाएगा और उसका इस्तेमाल बागवानी व शौचालयों में किया जाएगा. सूत्रों ने कहा कि ट्रीटेड वेस्ट वाटर मुदासरलोवा जलाशय में नहीं छोड़ा जाएगा.इन उपायों का उद्देश्य मुदासरलोवा जलाशय और उससे सटे कंबालकोंडा वन्यजीव अभयारण्य सहित स्थानीय जल संसाधनों पर परियोजना के प्रभाव को कम करना है.
डेटा सेंटर ऐसे परिसर होते हैं, जहां डिजिटल सूचनाओं के भंडारण, प्रसंस्करण और संचार के लिए कंप्यूटिंग उपकरण रखे जाते हैं. इन उपकरणों को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में ऊर्जा और बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है. पानी की कमी वाले क्षेत्रों में इनकी शीतलन प्रणालियां स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव डाल सकती हैं.
आंध्र प्रदेश में बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर निवेश आकर्षित करने की कोशिशों के बीच पानी की खपत एक प्रमुख मुद्दा बनकर उभरी है.पारंपरिक वाष्पीकरण आधारित कूलिंग प्रणालियां काफी मात्रा में ताजा पानी की खपत कर सकती हैं. इससे स्थानीय जलापूर्ति पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सवाल उठे हैं, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां पहले से पानी की कमी है. इसी वजह से सरकारों के सामने डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश और स्थानीय समुदायों की जल जरूरतों तथा पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है.आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा विशाखापत्तनम में गूगल की प्रस्तावित कृत्रिम मेधा डेटा सेंटर परियोजना को मंजूरी दिए जाने के बाद विवाद तेज हो गया था. यह परियोजना अदाणीकॉनेक्स के साथ मिलकर विकसित की जा रही है.
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने मुदासरलोवा जलाशय के निकट परियोजना की स्थिति पर चिंता जताई है. यह जलाशय शहर के लिए पेयजल का एक स्रोत है. इसके अलावा, परियोजना के पास स्थित कंबालकोंडा वन्यजीव अभयारण्य को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं.राज्य सरकार के अनुसार, प्रस्तावित डेटा सेंटर पारिस्थितिकी तंत्र के 6.5 गीगावाट तक विस्तार की स्थिति में सालाना करीब तीन टीएमसी पानी की जरूरत हो सकती है. वहीं, गूगल ने कहा है कि वह उन्नत एयर-कूलिंग प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने की योजना बना रही है.अदाणीकॉनेक्स, अदाणी एंटरप्राइजेज और अमेरिका की कंपनी एजकॉनेक्स के बीच एक संयुक्त उद्यम है. कंपनी क्लाउड कंप्यूटिंग, कृत्रिम मेधा और डिजिटल सेवाओं की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए देशभर में बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर का नेटवर्क विकसित कर रही है.
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