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भारत में हेल्थ पर खर्च क्यों इतना कम? वन नेशन वन मेडिकल ट्रीटमेंट की मांग करते हुए राघव चड्ढा का सवाल

AAP सांसद राघव चड्ढा ने बजट 2026 में कम स्वास्थ्य आवंटन पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश को ‘वन नेशन, वन मेडिकल ट्रीटमेंट’ मॉडल अपनाने की जरूरत है.

भारत में हेल्थ पर खर्च क्यों इतना कम? वन नेशन वन मेडिकल ट्रीटमेंट की मांग करते हुए राघव चड्ढा का सवाल
आप सांसद राघव का केंद्र से सवाल
  • AAP के सांसद राघव चड्ढा ने केंद्र सरकार के 2026 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के कम आवंटन पर सवाल उठाए
  • आप सांसद ने बताया कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार स्वास्थ्य पर GDP का ढाई प्रतिशत खर्च करना लक्ष्य था
  • विकसित देशों में स्वास्थ्य क्षेत्र पर GDP का दस से 18% खर्च होता है, जिससे उनका स्वास्थ्य स्तर मजबूत रहता है
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नई दिल्ली:

आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसद राघव चड्ढा ने केंद्र सरकार के 2026 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए की गई कम आवंटन पर सवाल उठाते हुए इसे देश की स्वास्थ्य नीतियों के लक्ष्य के विपरीत बताया है. उन्होंने कहा कि भारत को “वन नेशन, वन मेडिकल ट्रीटमेंट” की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, इससे आय या पहचान की परवाह किए बिना हर नागरिक को एक समान गुणवत्ता वाली चिकित्सा सुविधा मिल सके.

स्वास्थ्य बजट केवल 2% खर्च, लक्ष्य से बहुत पीछे

राघव चड्ढा ने एक्स पर लिखा कि इस साल बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र को सरकार के कुल खर्च का लगभग यानी करीब 1 लाख करोड़ रुपये दिया गया है, जो असल जरूरतों की तुलना में बहुत कम है. उन्होंने याद दिलाया कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के तहत भारत ने सार्वजनिक स्वास्थ्य पर देश की GDP का 2.5% खर्च करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन 2026 में भी यह आंकड़ा सिर्फ 0.5% GDP के आसपास है.

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दूसरे देश समझते हैं स्वास्थ्य निवेश की कीमत

राघव चड्ढा ने विकसित देशों के स्वास्थ्य खर्च का हवाला देते हुए कहा कि जब देश जीवन को प्राथमिकता देते हैं, तो वे स्वास्थ्य क्षेत्र में मजबूत निवेश करते हैं. उनके अनुसार अमेरिका 18%, ब्रिटेन 12%, जर्मनी 13%  स्वीडन, नीदरलैंड, डेनमार्क, जापान और स्पेन लगभग 10% GDP का स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि “क्योंकि जान है तो जहान है.”

सरकारी अस्पतालों की हालत पर चिंता

AAP नेता ने सरकारी अस्पतालों में मौजूद चुनौतियों को भी उजागर किया. जैसे कि अस्पतालों में स्टाफ की भारी कमी और डॉक्टरों पर अत्यधिक काम का बोझ होना. अस्पतालों में सीमित बेड और मशीनों की कमी भी बड़ी समस्या है. दवाओं की कमी और लंबी वेटिंग लिस्ट के कारण इलाज में देरी भी परेशानी का सबब है. उन्होंने कहा कि जब परिवार सरकारी अस्पतालों में देरी झेल नहीं पाते, तो मजबूरी में उन्हें महंगे प्राइवेट अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जो एक स्वास्थ्य संकट को संकट में तब्दील कर देता है.

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चड्ढा ने संसद में भी उठाया मुद्दा

राघव चड्ढा ने बताया कि उन्होंने संसद में भी इस मुद्दे को उठाया और स्वास्थ्य बजट पर दोबारा विचार करने की मांग की. उनके अनुसार, स्वस्थ भारत तभी बन सकता है जब हर नागरिक को गुणवत्तापूर्ण और सस्ती चिकित्सा सुविधा मिले.

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