- आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों ने दो-तिहाई बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी में विलय कर लिया है.
- इस विलय के बाद आम आदमी पार्टी के सांसदों की संख्या 13 से घटकर केवल छह रह गई है.
- पार्टी राज्यसभा के सभापति से इन सात सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग करेगी और न्यायालय का रुख भी करेगी.
आम आदमी पार्टी के राजनीतिक सफर में अब तक का सबसे बड़ा झटका लगा है. पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों ने दावा किया है कि उन्होंने दो-तिहाई बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी में विलय कर लिया है. राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर घोषणा की कि सातों राज्यसभा सांसद बीजेपी में शामिल हो रहे हैं और इस संबंध में सांसदों के हस्ताक्षर वाला पत्र राज्यसभा के सभापति को सौंप दिया गया है. इस राजनीतिक टूट के बाद अब लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर आम आदमी पार्टी के सांसदों की संख्या 13 से घटकर सिर्फ 6 रह गई है.
इस घटनाक्रम के बाद पार्टी सूत्रों का कहना है कि राघव चड्ढा को लेकर पार्टी के भीतर पहले से चर्चाएं चल रही थीं, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में सांसदों के अलग होने की आशंका नहीं थी. 7 सांसदों में से 4 कारोबारी पृष्ठभूमि से थे, जबकि केवल तीन ही सक्रिय रूप से पार्टी की राजनीति से जुड़े नेता थे. स्वाति मालीवाल लंबे समय से पार्टी के भीतर रहते हुए पार्टी के खिलाफ बयान देती रही थीं. वहीं, लोकसभा चुनाव के बाद संदीप पाठक का पार्टी में कद लगातार घटता गया और वह धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए. संगठन की जिम्मेदारी संभालने के बावजूद उनकी सक्रियता काफी कम हो गई थी. वहीं, जिन सांसदों का संबंध व्यवसाय से था, उन्हें सांसद बनाए जाने के समय से ही उनके लंबे समय तक पार्टी में बने रहने को लेकर सवाल उठते रहे थे. ऐसे में उनका बीजेपी में जाना पूरी तरह से अप्रत्याशित नहीं माना जा रहा है.

'आप' अब आगे क्या करेगी
पार्टी के भविष्य को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं. आप नेता ने कहा कि कहा है कि पार्टी राज्यसभा के सभापति से इन सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग करेगी. उन्होंने यह भी साफ किया कि यदि इस मामले में देरी होती है तो पार्टी न्यायालय का रुख करेगी. हालांकि, राज्यसभा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सभापति सांसदों की ओर से सौंपे गए समर्थन पत्र को स्वीकार कर सकते हैं. ऐसी स्थिति में आम आदमी पार्टी के पास कानूनी रास्ता ही अंतिम विकल्प बचेगा.
विधायकों को एकजुट रखना बड़ी चुनौती
पार्टी के सामने चुनौती सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं है, बल्कि दिल्ली, गुजरात और गोवा के विधायकों को एकजुट रखना भी बड़ी चुनौती बन गया है. दिल्ली में पार्टी के विधायक आले इकबाल पहले ही अलग रुख अपनाते नजर आ चुके हैं. दिल्ली विधानसभा के हालिया सत्र में, जहां पूरी पार्टी ने कार्यवाही का बहिष्कार किया. वहीं, आले इकबाल न सिर्फ सदन में मौजूद रहे, बल्कि उन्होंने अपनी बात भी रखी. दूसरी ओर, गुजरात में बीजेपी पहले भी आम आदमी पार्टी के विधायकों में सेंध लगा चुकी है. उपचुनाव में भले ही पार्टी को जीत मिली हो, लेकिन निगम चुनावों के दौरान कई प्रत्याशी बीजेपी के प्रभाव में आ गए थे.
केजरीवाल के लिए गुजरात क्यों अहम?
दिल्ली और पंजाब के बाद अब आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी उम्मीद गुजरात पर टिकी है. इस साल अरविंद केजरीवाल अब तक करीब 5 बार गुजरात का दौरा कर चुके हैं और पार्टी वहां संगठन को मजबूत करने में जुटी हुई है. गुजरात में पार्टी के पास फिलहाल 5 विधायक हैं और यदि वहां भी कोई टूट होती है, तो इसका सीधा असर पार्टी की राजनीति पर पड़ेगा.

पंजाब चुनाव कितना अहम?
आम आदमी पार्टी का भविष्य काफी हद तक पंजाब चुनाव पर निर्भर माना जा रहा है. यदि पार्टी पंजाब में दोबारा सरकार बनाने में सफल रहती है, तो इससे न सिर्फ संगठन मजबूत होगा, बल्कि कार्यकर्ताओं का मनोबल भी बढ़ेगा. पंजाब सरकार में मंत्री बलबीर सिंह ने आरोप लगाया कि इन सांसदों ने पंजाब की जनता के साथ विश्वासघात किया है. उनका कहना है कि राज्य में सरकार अच्छा काम कर रही है और उसे कमजोर करने के लिए बीजेपी यह कदम उठा रही है. उन्होंने दावा किया कि पंजाब के सभी विधायक एकजुट हैं और मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में सरकार मजबूती से काम कर रही है.
हालांकि, पार्टी के भीतर हालात पूरी तरह सहज नहीं माने जा रहे हैं. राघव चड्ढा के उस दावे के बाद चिंताएं बढ़ गई हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके संपर्क में करीब 50 विधायक हैं. गौरतलब है कि संदीप पाठक और राघव चड्ढा ही पंजाब विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण की अहम भूमिका में थे, ऐसे में उनका विधायकों से संपर्क होना स्वाभाविक माना जा रहा है.

पंजाब में भी विधायकों के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी!
इसके अलावा, पार्टी सूत्रों का कहना है कि पंजाब में भी विधायकों के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी का दबाव है, जिससे निपटने के लिए आने वाले समय में कई विधायकों के टिकट काटे जा सकते हैं. मुख्यमंत्री भगवंत मान एक ओर राष्ट्रपति से मिलने का समय मांग रहे हैं, तो दूसरी ओर इन सांसदों को ‘गद्दार' करार देते हुए बीजेपी को खुली चुनौती भी दे रहे हैं. इन तमाम घटनाक्रमों के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में आम आदमी पार्टी इस संकट से कैसे उबरती है और क्या पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी या हालात संभल पाएंगे.
ये भी पढ़ें : AAP के वो 7 सांसद, जिन्होंने बगाबत कर छोड़ा आप पार्टी का साथ
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं