
अखिलेश यादव का कहना है कि बिजली को लेकर कोई भेदभाव नहीं किया जाता
गोरखपुर:
उत्तर प्रदेश चुनाव में बिजली पर बयानबाज़ी जारी है. सीएम अखिलेश यादव कह रहे हैं कि योगी जी बिजली का तार पकड़ कर देखें कि बिजली आती है या नहीं, योगी कहते हैं कि अखिलेश सरेआम झूठ बोलते हैं. ऐसे में हमने गोरखपुर के गांवों में जाकर हकीकत जानने की कोशिश की. जवाब है चुनाव है तो बिजली है. हम बिजली की स्थिति पता करने के लिए गोरखपुर के कुछ गांवों में गए. सबसे पहले हमारी मुलाकात हुई गनपत कुमार से. गनपत गोरखपुर से 22 किलोमीटर दूर ताज पिपरा गांव में समोसे बनाते हैं. इस गांव में हर बिरादरी के लोग हैं. मुसलमान भी हैं, पर कम हैं, लेकिन इस गांव की बिजली की स्थिति के बारे में गनपत बताते हैं कि आजकल तो 20 घंटे बिजली आ रही है, लेकिन एक महीने पहले सिर्फ 6 से 7 घंटे ही बिजली आती थी. चुनाव है इसलिए बिजली आ रही है.
फिर हम गढ़वा गांव पहुंचे. हमने लोगों से पता किया कि आसपास कौन-सा सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला गांव है तो पता चला कि इस गांव में मुस्लिम आबादी ज्यादा है. यहां हमारी मुलाक़ात हुई सालिहा ख़ातून से. हमने इनसे एक और बयान "ईद में बिजली आती है और दिवाली में नहीं आती" का सच जानने की कोशिश की तो वह बताती हैं कि क्या दिवाली क्या ईद- बिजली दोनों में ही नहीं आती. बुरा हाल है, कहीं ट्रांसफार्मर खराब हो गया तो महीने भर की छुट्टी.
हम तकरीबन 6 गांवों में गए लेकिन जवाब एक ही मिला बिजली तो है, लेकिन चुनाव गुज़रने के बाद ये भी तारों से गुज़र जाती है. कुछ देर ढूंढने पर हमें मिला टोला गांव. इस गांव में तो अब तक बिजली ही नहीं पहुंची है. लोगों के पास मोबाइल है, लेकिन चार्ज करने दूसरे गांव जाते हैं. यहां के लोग नेताओं से गुहार लगा-लगाकर थक चुके हैं. हालत यह है कि सिर्फ एक लीटर मिट्टी का तेल मिलता है इसलिए बच्चे दिन में ही पढ़ाई कर लेते हैं ताकि रात में दीया जलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़े. बिजली पर सियासत होना ठीक तब है जब काम भी हो.
फिर हम गढ़वा गांव पहुंचे. हमने लोगों से पता किया कि आसपास कौन-सा सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला गांव है तो पता चला कि इस गांव में मुस्लिम आबादी ज्यादा है. यहां हमारी मुलाक़ात हुई सालिहा ख़ातून से. हमने इनसे एक और बयान "ईद में बिजली आती है और दिवाली में नहीं आती" का सच जानने की कोशिश की तो वह बताती हैं कि क्या दिवाली क्या ईद- बिजली दोनों में ही नहीं आती. बुरा हाल है, कहीं ट्रांसफार्मर खराब हो गया तो महीने भर की छुट्टी.
हम तकरीबन 6 गांवों में गए लेकिन जवाब एक ही मिला बिजली तो है, लेकिन चुनाव गुज़रने के बाद ये भी तारों से गुज़र जाती है. कुछ देर ढूंढने पर हमें मिला टोला गांव. इस गांव में तो अब तक बिजली ही नहीं पहुंची है. लोगों के पास मोबाइल है, लेकिन चार्ज करने दूसरे गांव जाते हैं. यहां के लोग नेताओं से गुहार लगा-लगाकर थक चुके हैं. हालत यह है कि सिर्फ एक लीटर मिट्टी का तेल मिलता है इसलिए बच्चे दिन में ही पढ़ाई कर लेते हैं ताकि रात में दीया जलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़े. बिजली पर सियासत होना ठीक तब है जब काम भी हो.
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