लोकसभा में अखिलेश यादव ने कहा कि मुसलमानों में कोई बंटवारा नहीं है, लेकिन PDA ही बीजेपी की हार की वजह बनेगी. यूपी में बीजेपी और समाजवादी पार्टी में जबरदस्त लड़ाई जारी है. बीजेपी की कोशिश हिंदुओं को एकजुट करने की है जबकि समाजवादी पार्टी का पूरा जोर पीडीए मतलब पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक पर है. सारा खेल जाति बिरादरी के वोटरों के गुना गणित का है. पिछले कुछ महीनों से योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व पर अपने बयानों को लेकर खूब चर्चा में हैं. सड़क पर नमाज न पढ़ने के उनके आदेश पर विपक्ष ने उनका विरोध किया पर, वे अपने फैसले पर डटे रहे. संभल के डीएसपी अनुज चौधरी ने कहा कि जिन्हें होली के रंग से दिक्कत है, वे बाहर न निकलें. लोगों ने समझा ऐसा कहने वाले पर एक्शन होगा. पर योगी आदित्यनाथ ने उनका पक्ष लेते हुए कहा इसमें गलत क्या है. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि मस्जिदों में शिवालय ढूंढने की ज़रूरत नहीं है. उसी समय संभल के मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में सालों से बंद पड़े मंदिर खुलवाए जा रहे थे. देशभर में संदेश गया कि योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व की पिच पर खुल कर बैटिंग कर रहे हैं. राजनैतिक जानकारों ने कहा कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खराब प्रदर्शन के बाद सीएम योगी हिंदू मुसलमान वाले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की पॉलिटिक्स कर रहे हैं.
पहले हिंदुत्व और फिर सोशल इंजीनियरिंग. सीएम योगी आदित्यनाथ का फोकस यूपी में इसी डबल डोज वाली रणनीति पर है. इस रणनीति से वे अखिलेश यादव के PDA वाले फार्मूले को तोड़ने में जुटे हैं. आज प्रयागराज में निषादराज को उन्होंने सनातन का सम्मान बताया. पीएम नरेन्द्र मोदी ने पिछले साल 13 दिसंबर को वहां भगवान राम और निषादराज के गले लगते हुए वाली प्रतिमा का उद्घाटन किया था. कोशिश बस इतनी है कि अति पिछड़ी जाति निषाद को अपना बनाया जाए. वैसे इसी वोट के लिए बीजेपी ने यूपी में निषाद पार्टी से गठबंधन किया है. पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद को योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया है. पर पार्टी निषाद वोटों को लेकर आत्मनिर्भर होना चाहती है.
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पिछले लोकसभा चुनावों में OBC समाज के एक हिस्से ने बीजेपी का साथ छोड़ दिया. सबसे चौंकाने वाला ट्रेंड कुर्मी बिरादरी का रहा. इसी वोट बैंक के लिए बीजेपी ने अपना दल से गठबंधन कर रखा है. ये तालमेल 2014 के लोकसभा चुनाव से हैं. इसके बावजूद कुर्मी वोटरों के एक बड़े तबके ने बीजेपी के बदले समाजवादी पार्टी के लिए वोट किया. ये खतरे की घंटी है. कुर्मी, मौर्य से लेकर लोध वोटों तक में बंटवारा हुआ. यूपी के सीएम रहे कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह तक चुनाव हार गए.
बीजेपी में मोदी शाह युग में पार्टी ने यूपी में हिंदुत्व के साथ-साथ सामाजिक समीकरण का जबरदस्त तालमेल बनाया था. यूपी में दशकों से कमंडल बनाम मंडल की लड़ाई रही है. साल 1993 में कल्याण सिंह जैसे मजबूत OBC नेता होने के बावजूद बीजेपी यूपी में सरकार नहीं बना पाई थी, जबकि अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद हिंदुत्व का आंदोलन अपने शिखर पर था, लेकिन नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गैर यादव पिछड़ों और गैर जाटव दलितों के दम पर बीजेपी लगातार चुनाव जीतती रही, पर पिछले लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव के PDA ने बीजेपी की जड़ें हिला दी हैं इसीलिए अब इसे फिर से दुरुस्त करने का काम शुरू हो गया है.
बीजेपी की रणनीति समाजवादी पार्टी को मुस्लिम परस्त पार्टी साबित करने की है. कोशिश ये है कि मुसलमानों बनाम OBC की लड़ाई हो जाए इसीलिए जानबूझकर वैसे ही मुद्दे उठाए जाते हैं. यूपी में आठ साल से योगी आदित्यनाथ की सरकार है, पर इसी साल गाजी सालार मसूद के नाम पर लगने वाले नेजा मेले पर विवाद शुरू हुआ, क्योंकि इस मुद्दे में वे ताक़त है जो राजभर के साथ साथ पासी वोटरों को भी बीजेपी से जोड़ सकती है. बदलते राजनैतिक हालात में पासी दलित वोटर समाजवादी पार्टी के साथ हैं. अयोध्या वाली फैजाबाद सीट पर अवधेश प्रसाद की जीत बीजेपी आज भी नहीं पचा पाई है. पिछले साल राम मन्दिर के उद्घाटन के बाद भी समाजवादी पार्टी जीत गई थी. नारे लगे थे अयोध्या न काशी, इस बार अवधेश पासी.
महमूद गजनी के कमांडर गाजी सालार मसूद को सुहेलदेव राजभर ने युद्ध में हराया था. सुहेलदेव को पासी और राजभर बिरादरी के लोग अपना भगवान मानते हैं पर यूपी के बीस जिलों में गाजी सालार के सम्मान में मेले लगते रहे हैं. पर इस बार क़ानून व्यवस्था के नाम पर कई ज़िलों में इस पर रोक लग गई. योगी आदित्यनाथ एक साथ हिंदुत्व और सामाजिक समीकरण पर काम कर रहे हैं. डबल डोज वाली इसी रणनीति से ही 2027 के यूपी चुनाव में जीत का रास्ता खुल सकता है.
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