
उद्धव ठाकरे (फाइल फोटो)
नई दिल्ली:
महाराष्ट्र और देश की सियासत में शिवसेना फिर अपने पुराने आक्रामक तेवर में है। पार्टी की दशहरा रैली में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपने रुख से जाहिर कर दिया है कि केंद्र और महाराष्ट्र में भाजपा के साथ सत्ता साझा करने के बावजूद वे टकराव का अपना रुख नही छोड़ेंगे। रैली में ठाकरे ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए दोटूक कहा कि दादरी जैसी घटनाओं से विदेशों में देश की छवि खराब होती है, स्याही फेंकने जैसी घटनाओं से नहीं।
यहीं नहीं, महंगाई और राम मंदिर के मसले पर भी वे सरकार पर तंज कसने से नहीं चूके। हाल में ऐसा कई बार हुआ है जब शिवसेना ने भाजपा पर 'धौस' जमाते हुए उसे चुनौती दी है। दरअसल, शिवसेना की यह रणनीति महाराष्ट्र में अपने को पुनर्स्थापित करने के कवायद के तौर पर ही मानी जा रही है। पार्टी का वोट बैंक धीरे-धीरे कम हो रहा है। पहले राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और अब भाजपा उसके परंपरागत वोट बैंक पर सेंध लगा रही है। राज्य के साथ-साथ स्थानीय निकायों में भी शिवसेना का असर कम हो रहा है, ऐसे में अपने खालिस मराठी वोट बैंक को अपने खेमे में लाने के लिए पार्टी को पूरे जोर-शोर से कट्टर हिंदूवाद की राजनीति पर आगे बढ़ना पड़ रहा है।
अंतर्मुखी राजनेता की छवि रही है उद्धव की
राज ठाकरे के मुकाबले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की छवि स्वभाव से ऐसे अंतर्मुखी राजनेता के रूप में रही है जिसे फोटोग्राफी से बेइंतहा शौक है। पार्टी में सक्रिय रहने के पहले वे बयानबाजी से दूर अपने काम में ही मशगूल रहते थे। पार्टी सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे के अवसान के बाद उद्धव को अपनी छवि से बाहर आने में भी वक्त लगा, लेकिन अब उन्होंने अपने पिता के तेवरों की ही बयानबाजी करके और सामना में लेख लिखकर पार्टी के उग्र तेवर को जारी रखने की मंशा जता दी है। हालांकि उन्होंने इसके साथ यह भी स्पष्ट कर दिया है कि महाराष्ट्र और केंद्र में गठबंधन सरकार से हटने की उसकी अभी कोई मंशा नहीं है।
भाजपा के साथ टकराव की बढ़ती राजनीति
विधानसभा चुनाव में पकड़ी अलग राह
भाजपा और शिवसेना की 'तूतू-मैंमैं' की शुरुआत महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों के साथ हुई जब सीटों के बंटवारे पर दोनों दलों के मतभेद सुलझ नहीं सके और 25 साल के गठबंधन को तोड़ते हुए इन्होंने अलग-अलग चुनाव लड़ा। चुनाव नतीजों में भाजपा के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने पर मजबूरी में ही सही शिवसेना सत्ता में शामिल हुई, लेकिन दोनों दलों के रिश्ते में तल्खी जब-तब सामने आती रही है। भाजपा और शिवसेना कोटे के मंत्रियों के बीच अधिकारों को लेकर भी टकराव के मामले सामने आए हैं।
मीट बैन पर आमने-सामने
इसी साल जैन धर्म के पर्यूषण पर्व पर महाराष्ट्र में मांस की बिक्री पर प्रतिबंध पर भी दोनों दल आमने-सामने दिखे। पर्यूषण पर्व पर जब मुंबई में मांस की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया तो शिवसेना ने सत्ता में अपनी सहयोगी पार्टी की जमकर आलोचना कर डाली। यही नहीं, फैसले के विरोध में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने विरोधस्वरूप मांस की बिक्री भी की।
मोदी पर संजय राउत का बयान
शिवसेना ने हाल ही में आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान के नरम रुख के खिलाफ गजल गायक गुलाम अली को महाराष्ट्र में कार्यक्रम के विरोध का फैसला किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब अपनी गठबंधन सहयोगी पार्टी के इस रुख पर अफसोस जताया तो शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत के बयान में 'आग में घी डालने' का काम कर दिया। उन्होंने कहा, मोदी यह न भूलें कि गोधरा के लिए ही उन्हें पूरी दुनिया ने जाना जाता है।
रिश्तों पर जमा होती कालिख
वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के खास सहयोगी सुधींद्र कुलकर्णी के चेहरे पर कालिख पोतने की घटना में भी दोनों दल आमने-सामने दिखे। कुलकर्णी ने पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की किताब का विमोचन समारोह आयोजित किया था। इसके पुरजोर विरोध करते हुए शिवसेना कार्यकर्ताओं ने न केवल कुलकर्णी के साथ धक्का-मुक्की की बल्कि उनके चेहरे पर कालिख पोत दी। महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस जब शिवसेना के इस रुख को गुंडागर्दी करार देत हुए इस पर सख्ती की बात कही तो शिवसेना ने मुख्यमंत्री की आलोचना भी कर डाली।
विवादों का पोस्टर
शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में जब-तब केंद्र की भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाया जाता रहा है। सरकार की नीतियों पर भी इसमें कई बार कड़ी और विवादित टिप्पणी की गईं। हाल ही में शिवसेना के कथित कार्यकर्ताओं ने मोदी का शिवसेना सुप्रीमो स्वर्गीय बाला साहब ठाकरे के साथ ऐसा पुराना फोटो जारी किया जिसमें मोदी को ठाकरे के आगे हाथ जोड़े दिखाया गया था। पोस्टर के नीचे लिखा गया था कि क्या भाजपा उन दिनों को भूल गई जब मोदी, बाला साहब के सामने सिर झुकाते थे। हालांकि विवाद बढ़ने के बाद इस पोस्टर को हटा लिया गया था।
यहीं नहीं, महंगाई और राम मंदिर के मसले पर भी वे सरकार पर तंज कसने से नहीं चूके। हाल में ऐसा कई बार हुआ है जब शिवसेना ने भाजपा पर 'धौस' जमाते हुए उसे चुनौती दी है। दरअसल, शिवसेना की यह रणनीति महाराष्ट्र में अपने को पुनर्स्थापित करने के कवायद के तौर पर ही मानी जा रही है। पार्टी का वोट बैंक धीरे-धीरे कम हो रहा है। पहले राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और अब भाजपा उसके परंपरागत वोट बैंक पर सेंध लगा रही है। राज्य के साथ-साथ स्थानीय निकायों में भी शिवसेना का असर कम हो रहा है, ऐसे में अपने खालिस मराठी वोट बैंक को अपने खेमे में लाने के लिए पार्टी को पूरे जोर-शोर से कट्टर हिंदूवाद की राजनीति पर आगे बढ़ना पड़ रहा है।
अंतर्मुखी राजनेता की छवि रही है उद्धव की
राज ठाकरे के मुकाबले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की छवि स्वभाव से ऐसे अंतर्मुखी राजनेता के रूप में रही है जिसे फोटोग्राफी से बेइंतहा शौक है। पार्टी में सक्रिय रहने के पहले वे बयानबाजी से दूर अपने काम में ही मशगूल रहते थे। पार्टी सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे के अवसान के बाद उद्धव को अपनी छवि से बाहर आने में भी वक्त लगा, लेकिन अब उन्होंने अपने पिता के तेवरों की ही बयानबाजी करके और सामना में लेख लिखकर पार्टी के उग्र तेवर को जारी रखने की मंशा जता दी है। हालांकि उन्होंने इसके साथ यह भी स्पष्ट कर दिया है कि महाराष्ट्र और केंद्र में गठबंधन सरकार से हटने की उसकी अभी कोई मंशा नहीं है।
भाजपा के साथ टकराव की बढ़ती राजनीति
विधानसभा चुनाव में पकड़ी अलग राह
भाजपा और शिवसेना की 'तूतू-मैंमैं' की शुरुआत महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों के साथ हुई जब सीटों के बंटवारे पर दोनों दलों के मतभेद सुलझ नहीं सके और 25 साल के गठबंधन को तोड़ते हुए इन्होंने अलग-अलग चुनाव लड़ा। चुनाव नतीजों में भाजपा के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने पर मजबूरी में ही सही शिवसेना सत्ता में शामिल हुई, लेकिन दोनों दलों के रिश्ते में तल्खी जब-तब सामने आती रही है। भाजपा और शिवसेना कोटे के मंत्रियों के बीच अधिकारों को लेकर भी टकराव के मामले सामने आए हैं।
मीट बैन पर आमने-सामने
इसी साल जैन धर्म के पर्यूषण पर्व पर महाराष्ट्र में मांस की बिक्री पर प्रतिबंध पर भी दोनों दल आमने-सामने दिखे। पर्यूषण पर्व पर जब मुंबई में मांस की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया तो शिवसेना ने सत्ता में अपनी सहयोगी पार्टी की जमकर आलोचना कर डाली। यही नहीं, फैसले के विरोध में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने विरोधस्वरूप मांस की बिक्री भी की।
मोदी पर संजय राउत का बयान
शिवसेना ने हाल ही में आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान के नरम रुख के खिलाफ गजल गायक गुलाम अली को महाराष्ट्र में कार्यक्रम के विरोध का फैसला किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब अपनी गठबंधन सहयोगी पार्टी के इस रुख पर अफसोस जताया तो शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत के बयान में 'आग में घी डालने' का काम कर दिया। उन्होंने कहा, मोदी यह न भूलें कि गोधरा के लिए ही उन्हें पूरी दुनिया ने जाना जाता है।
रिश्तों पर जमा होती कालिख
वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के खास सहयोगी सुधींद्र कुलकर्णी के चेहरे पर कालिख पोतने की घटना में भी दोनों दल आमने-सामने दिखे। कुलकर्णी ने पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की किताब का विमोचन समारोह आयोजित किया था। इसके पुरजोर विरोध करते हुए शिवसेना कार्यकर्ताओं ने न केवल कुलकर्णी के साथ धक्का-मुक्की की बल्कि उनके चेहरे पर कालिख पोत दी। महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस जब शिवसेना के इस रुख को गुंडागर्दी करार देत हुए इस पर सख्ती की बात कही तो शिवसेना ने मुख्यमंत्री की आलोचना भी कर डाली।
विवादों का पोस्टर
शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में जब-तब केंद्र की भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाया जाता रहा है। सरकार की नीतियों पर भी इसमें कई बार कड़ी और विवादित टिप्पणी की गईं। हाल ही में शिवसेना के कथित कार्यकर्ताओं ने मोदी का शिवसेना सुप्रीमो स्वर्गीय बाला साहब ठाकरे के साथ ऐसा पुराना फोटो जारी किया जिसमें मोदी को ठाकरे के आगे हाथ जोड़े दिखाया गया था। पोस्टर के नीचे लिखा गया था कि क्या भाजपा उन दिनों को भूल गई जब मोदी, बाला साहब के सामने सिर झुकाते थे। हालांकि विवाद बढ़ने के बाद इस पोस्टर को हटा लिया गया था।
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