
बिहार में बीजेपी की चुनाव अभियान में रथ की तस्वीर।
पटना:
बिहार में भारतीय जनता पार्टी की हार या जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। ये उनके विरोधियों का नहीं बल्कि खुद उनकी पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह का कहना है। पटना में गुरुवार को पार्टी की रैली में नेताओं के भाषण में जितना आत्मविश्वास नहीं झलक रहा था उससे ज्यादा चुनाव के परिणाम को लेकर बेचैनी दिख रही थी।
शुरुआत बिहार के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार सुशील मोदी के भाषण में दिखा, जब उन्होंने ये वादा किया कि नीतीश सरकार किसी कर्मचारी या सरकार से जुड़े लोगों को जितना वेतन बढ़ने का वादा कर रही है, उससे 25 प्रतिशत ज्यादा बढ़ा कर उनकी सरकर देगी। सुशील मोदी 8 वर्षों तक बिहार के वित्त मंत्री रहे हैं।
अगर यही दावा नीतीश कुमार या लालू यादव ने किया होता तो वो जरूर सवाल करते कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा। लेकिन, अपनी बारी आने पर वो इसका जवाब देना उसी प्रकार आवश्यक नहीं समझते की जैसे वो जनता दल यूनाइटेड के प्रचार पर हो रहे खर्च के बारे में प्रश्न तो जरूर उठाते हैं, लेकिन बीजेपी के प्रचार के लिए पैसे कहां से आ रहे हैं, उसके बारे में किसी को जानकरी देने की जरूरत नहीं समझते।
अमित शाह के भाषण से पहले जो बीजेपी के पोस्टर लगे थे, उससे साफ़ था कि बीजेपी को फिलहाल किसी मुस्लिम नेता की कोई जरूरत नहीं। भले शाहनवाज हुसैन पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में शॉर्ट सर्किट से लगने वाली आग के लिए नीतीश कुमार के खिलाफ बयानबाजी करें या गांव-गांव और विधानसभा क्षेत्रों में घूमकर प्रचार करें या पार्टी के हर नेता के इफ्तार पार्टी के लिए दिल्ली-पटना दौड़ लगाते रहें, लेकिन फ़िलहाल पार्टी के नए चुनाव के बाजीगरों को उनकी जरूरत नहीं।
इसका एक अर्थ लगाया जा रहा है कि लोकसभा चुनावों की तरह बिहार में भी बीजेपी की कोशिश होगी हिंदुत्व के मुद्दे पर चुनाव लड़ा जाए, जिसमें मुस्लिम मतदाताओं के नीतीश-लालू के प्रति ध्रुवीकरण की बात की जाए, जिसकी प्रतिक्रिया में हिन्दू समाज के मतदाता बीजेपी के पक्ष में गोलबंद हों। साथ ही बीजेपी ने बिहारी बाबू को अपने पोस्टर या स्टेज से जैसे दूर रखा उससे ये बात स्पष्ट हो गई है कि मोदी-साह की टीम को आडवाणी समर्थक या उनसे जुड़े लोगों की कोई जरूरत नहीं और अगर वो कोप भवन में हैं तो रहें।
अमित शाह के भाषण से स्पष्ट था कि भले बीजेपी के नेताओं को जातीय जनगणना की रिपोर्ट जारी ना करने के लिए हर दिन एक नया तर्क देना पड़ रहा हो, लेकिन अगर चुनाव बिहार में है तो प्रधानमंत्री मोदी पिछड़ा भी हैं और अति पिछड़ा वर्ग से भी आते हैं, इसलिए इस आधार पर भी बीजेपी वोट मांगेगी। भले बीजेपी के नेता कहें कि चुनाव विकास पर होगा, लेकिन विकास के मुद्दे पर बीजेपी के नेताओं का मानना है कि जितना वादा उन्होंने किया उसे पूरा नहीं कर पाए और जिन योजनाओं को वो अपनी उपलब्धि गिना रहे हैं, उनमें से अनेक यूपीए के शासन काल में शुरू किए गए।
हां, शाह के भाषण से स्पष्ट था कि उनके निशाने पर नीतीश से ज्यादा लालू यादव और राबड़ी देवी का शासनकाल खासकर जंगल राज रहेगा क्योंकि जितना जंगल राज की बात करेंगे उतना वोटर उनके पक्ष में लामबंद होगा। लेकिन, इसका दूसरा पक्ष यह है कि लालू के पक्ष में पासवान ने जितनी बार सफाई दी है, मीडिया के सामने उन्हें निर्दोष बताया है, उसका टेप जनता में चलने के बाद शयद जनता में इस आरोप की धार और कमजोर होगी।
साथ ही उनके गठबंधन में शामिल जीतन राम मांझी के खिलाफ बीजेपी नेताओं सुशील मोदी, नन्द किशोरी यादव और मंगल पाण्डेय ने जितने बयान दिए उसे पब्लिक में दिखाया जाने लगा तो शयद बीजेपी के लिए ये चाल उलटी पड़ सकती है। हां, अमित शाह ने अपने भाषण में ये संकेत दिया है कि अगले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब बिहार के मुजफ्फरपुर का दौरा करेंगे तब बिहार के लिए बड़ी बड़ी योजना की घोषणा करेंगे।
लेकिन, बकौल बीजेपी नेता सुशील मोदी, चुनावी वर्षा में चुनाव के ऐन मौके पर की गई घोषणाओं का जनता पर बहुत ज्यदा असर नहीं होता। बाकी यहां भी जनता दल यूनाइटेड के नेताओं की मानें तो वो तैयारी करके बैठे हैं कि मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले बिहार के कोशी क्षेत्र के पूर्णिया में ये घोषणा की थी कि बीजेपी सरकार आने पर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा, विशेष आर्थिक पैकेज और विशेष ध्यान दिया जाएगा तो उस वादे का क्या हुआ?
शुरुआत बिहार के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार सुशील मोदी के भाषण में दिखा, जब उन्होंने ये वादा किया कि नीतीश सरकार किसी कर्मचारी या सरकार से जुड़े लोगों को जितना वेतन बढ़ने का वादा कर रही है, उससे 25 प्रतिशत ज्यादा बढ़ा कर उनकी सरकर देगी। सुशील मोदी 8 वर्षों तक बिहार के वित्त मंत्री रहे हैं।
अगर यही दावा नीतीश कुमार या लालू यादव ने किया होता तो वो जरूर सवाल करते कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा। लेकिन, अपनी बारी आने पर वो इसका जवाब देना उसी प्रकार आवश्यक नहीं समझते की जैसे वो जनता दल यूनाइटेड के प्रचार पर हो रहे खर्च के बारे में प्रश्न तो जरूर उठाते हैं, लेकिन बीजेपी के प्रचार के लिए पैसे कहां से आ रहे हैं, उसके बारे में किसी को जानकरी देने की जरूरत नहीं समझते।
अमित शाह के भाषण से पहले जो बीजेपी के पोस्टर लगे थे, उससे साफ़ था कि बीजेपी को फिलहाल किसी मुस्लिम नेता की कोई जरूरत नहीं। भले शाहनवाज हुसैन पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में शॉर्ट सर्किट से लगने वाली आग के लिए नीतीश कुमार के खिलाफ बयानबाजी करें या गांव-गांव और विधानसभा क्षेत्रों में घूमकर प्रचार करें या पार्टी के हर नेता के इफ्तार पार्टी के लिए दिल्ली-पटना दौड़ लगाते रहें, लेकिन फ़िलहाल पार्टी के नए चुनाव के बाजीगरों को उनकी जरूरत नहीं।
इसका एक अर्थ लगाया जा रहा है कि लोकसभा चुनावों की तरह बिहार में भी बीजेपी की कोशिश होगी हिंदुत्व के मुद्दे पर चुनाव लड़ा जाए, जिसमें मुस्लिम मतदाताओं के नीतीश-लालू के प्रति ध्रुवीकरण की बात की जाए, जिसकी प्रतिक्रिया में हिन्दू समाज के मतदाता बीजेपी के पक्ष में गोलबंद हों। साथ ही बीजेपी ने बिहारी बाबू को अपने पोस्टर या स्टेज से जैसे दूर रखा उससे ये बात स्पष्ट हो गई है कि मोदी-साह की टीम को आडवाणी समर्थक या उनसे जुड़े लोगों की कोई जरूरत नहीं और अगर वो कोप भवन में हैं तो रहें।
अमित शाह के भाषण से स्पष्ट था कि भले बीजेपी के नेताओं को जातीय जनगणना की रिपोर्ट जारी ना करने के लिए हर दिन एक नया तर्क देना पड़ रहा हो, लेकिन अगर चुनाव बिहार में है तो प्रधानमंत्री मोदी पिछड़ा भी हैं और अति पिछड़ा वर्ग से भी आते हैं, इसलिए इस आधार पर भी बीजेपी वोट मांगेगी। भले बीजेपी के नेता कहें कि चुनाव विकास पर होगा, लेकिन विकास के मुद्दे पर बीजेपी के नेताओं का मानना है कि जितना वादा उन्होंने किया उसे पूरा नहीं कर पाए और जिन योजनाओं को वो अपनी उपलब्धि गिना रहे हैं, उनमें से अनेक यूपीए के शासन काल में शुरू किए गए।
हां, शाह के भाषण से स्पष्ट था कि उनके निशाने पर नीतीश से ज्यादा लालू यादव और राबड़ी देवी का शासनकाल खासकर जंगल राज रहेगा क्योंकि जितना जंगल राज की बात करेंगे उतना वोटर उनके पक्ष में लामबंद होगा। लेकिन, इसका दूसरा पक्ष यह है कि लालू के पक्ष में पासवान ने जितनी बार सफाई दी है, मीडिया के सामने उन्हें निर्दोष बताया है, उसका टेप जनता में चलने के बाद शयद जनता में इस आरोप की धार और कमजोर होगी।
साथ ही उनके गठबंधन में शामिल जीतन राम मांझी के खिलाफ बीजेपी नेताओं सुशील मोदी, नन्द किशोरी यादव और मंगल पाण्डेय ने जितने बयान दिए उसे पब्लिक में दिखाया जाने लगा तो शयद बीजेपी के लिए ये चाल उलटी पड़ सकती है। हां, अमित शाह ने अपने भाषण में ये संकेत दिया है कि अगले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब बिहार के मुजफ्फरपुर का दौरा करेंगे तब बिहार के लिए बड़ी बड़ी योजना की घोषणा करेंगे।
लेकिन, बकौल बीजेपी नेता सुशील मोदी, चुनावी वर्षा में चुनाव के ऐन मौके पर की गई घोषणाओं का जनता पर बहुत ज्यदा असर नहीं होता। बाकी यहां भी जनता दल यूनाइटेड के नेताओं की मानें तो वो तैयारी करके बैठे हैं कि मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले बिहार के कोशी क्षेत्र के पूर्णिया में ये घोषणा की थी कि बीजेपी सरकार आने पर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा, विशेष आर्थिक पैकेज और विशेष ध्यान दिया जाएगा तो उस वादे का क्या हुआ?
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