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This Article is From Sep 25, 2015

पढ़ें, गोवा में होने वाले विरोध प्रदर्शनों में ‘स्ट्रीट म्यूजिक’ की भूमिका क्यों है खास

पढ़ें, गोवा में होने वाले विरोध प्रदर्शनों में ‘स्ट्रीट म्यूजिक’ की भूमिका क्यों है खास
प्रतीकात्मक फोटो
पणजी: बड़ी परियोजनाओं के कारण होने वाले पर्यावरण संबंधी नुकसान के खिलाफ गोवा में कार्यकर्ताओं द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों में ‘स्ट्रीट म्यूजिक’ का खासा महत्व है और यह उनका प्रमुख हिस्सा बन गया है।

पुर्तगाली शासन से आजादी मिलने के बाद से ही है चलन में
संगीतकारों का एक समूह, जो कोंकणी, मराठी और कई बार अंग्रेजी में गाने बजाता है, इन संगीतमय विरोध-प्रदर्शनों की विरासत को संजोए हुए है। गौरतलब है कि ऐसे विरोध प्रदर्शन साल 1961 में पुर्तगाली शासन से आजादी मिलने के बाद से ही इस तटीय राज्य के समाज का एक हिस्सा रहे हैं और चलन में हैं।

गोल्फ कोर्स परियोजना का हो रहा विरोध
फिलहाल गोवा में तेरेखोल गांव में प्रस्तावित गोल्फ कोर्स परियोजना का विरोध किया जा रहा है और इसमें स्ट्रीट म्यूजिक अपनी अहम भूमिका निभा रहा है। यह परियोजना दक्षिणी गोवा के कारमोना गांव की एक बड़ी आवासीय परियोजना है।

'विरासत को बचाकर रखा है'
संगीतकार सिद्धार्थ बायाओ ने कहा, ‘‘संगीतकार हमेशा से ही गोवा के समाज का एक सक्रिय हिस्सा रहे हैं। जब भी कोई सामाजिक मुद्दा होता है, तो वे हमेशा अपने इस हुनर के साथ आवाज उठाते हैं। गोवा में ऐसा ओपिनियन पोल के समय से होता रहा है। हम बस इस विरासत को जारी रखे हुए हैं।’’

सिद्धार्थ मशहूर गायक और गीतकार दिवंगत उल्हास बायाओ के पुत्र हैं। उल्हास बायाओ ने वर्ष 1967 में गोवा के ‘ओपिनियन पोल’ के दौरान संगीत समूहों का नेतृत्व किया था।

'हम हमेशा ‘‘निराशा और गुस्से’’ से गाते हैं'
एक पादरी और सामाजिक कार्यकर्ता फादर बिस्मार्क डियास ने कहा, ‘‘संगीत दिल से आता है। हम प्रस्तुति देने वाले लोग नहीं हैं, बल्कि हम यहां लोगों के साथ हैं। हम गीत बनाते हैं और गाते हैं। स्थानीय लोग भी हमारे साथ मिल जाते हैं। कई बार, गाने वहीं बनाए जाते हैं।’’ कंधे पर गिटार लटकाए फादर बिस्मार्क ने कहा कि वह हमेशा ‘‘निराशा और गुस्से’’ से गाते हैं। उनके अनुसार, विरोध प्रदर्शनों में संगीत का इस्तेमाल गोवा के लिए नया नहीं है।

रेमो फर्नांडीज और हेमा सरदेसाई भी हो चुके हैं शामिल
इस राज्य में आंदोलनों का अपना ही इतिहास है, जिसमें वर्ष 2007 में सेज-विरोधी प्रदर्शन भी शामिल हैं। तब मशहूर गायक-संगीतकार रेमो फर्नांडीज और ‘आवारा भंवरे’ से चर्चा में आई हेमा सरदेसाई ने अपनी आवाज इस आंदोलन को दी थी।

'हम विरोध के लिए संगीत का सहारा लेते हैं'
फिल्म 'चक दे इंडिया' के ‘बादल पे पांव हैं’ और फिल्म 'जोश' के ‘अपुन बोला तू मेरी लैला’ जैसे कई गानों के जरिए पहचान बना चुकीं हेमा सरदेसाई ने कहा, ‘‘विरोध प्रदर्शन का संगीत सर्वश्रेष्ठ चीजों में से एक है। अपने आपको संगीत के जरिए अभिव्यक्त करने जैसा कुछ नहीं है। जब भी कुछ गोवा के खिलाफ होता है, हमने अपना विरोध जताने के लिए संगीत की मदद ली है और संदेश को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया है।’’

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