नमस्कार.. मैं रवीश कुमार। उत्तर प्रदेश चिंगारी की ढेर पर बैठा है, जिसके बारे में अभी इस वक्त यूपी के नागरिकों ने पहल नहीं की, तो बहुत देर हो जाएगी। इस मामले को आप राजनीतिक जमात के भरोसे नहीं छोड़ सकते हैं। सोशल मीडिया में झांक कर देखिये। अगर आपको नफरत की भाषा से चिंता नहीं होती तो यह और भयावह है। वहां एक किस्म की सनक सवार जो उकसा रही है कि शाम की टीवी की ये बहसबाज़ियां उसी तरह से भड़कें जैसे पहले के मामले में भड़कीं। कथित रूप से टीवी चुप है, इसलिए सनक जायज है। जबकि अखबार-टीवी सब रिपोर्ट कर रहे हैं। इस बहाने वह कई तरह से नफरत की बातों को यहां से वहां तक फैला रहा है।
नया मामला इस लड़की को लेकर है जो आज अदालत में पेश हुई और बयान दिया। 20 साल की इस लड़की का आरोप है कि एक मौलवी ने अगवा कर गैंगरेप किया और धर्मपरिवर्तन किया। लड़की का गांव मेरठ शहर से पंद्रह किमी दूर है, जहां उसका संपर्क पचास साल के मौलवी सनाउल्लाह से होता है। मौलवी और लड़की के परिवार के बीच ताल्लुकात रहे हैं। मौलवी के कारण ही उसे किसी मदरसे में पंद्रह सौ महीने पर पढ़ाने की नौकरी मिली। लड़की के पिता भूमिहीन हैं और कमाते नहीं हैं। बीए फाइनल की पढ़ाई कर रही इस लड़की के ऊपर पांच लोगों की जिम्मेदारी भी है। लड़की के दावों में कुछ कड़ियां ऐसी हैं, जो जुड़ नहीं रही हैं जिसकी अभी जांच हो रही है।
23 जुलाई को पहली बार लड़की सनाउल्लाह के साथ जाती है और चार दिनों बाद 27 जुलाई को लौट आती है। तब गैंगरेप का आरोप नहीं लगाती न थाने में शिकायत करती है। परिवार वालों का दावा है कि 23 जुलाई को ही शिकायत कराने गए थे, मगर पुलिस ने दर्ज नहीं की। हमारे सहयोगी ने जब परिवार से 23 जुलाई वाली शिकायत की कॉपी मांगी तो जवाब मिला कि कॉपी हमारे पास नहीं है।
परिवारवालों ने 27 तारीख को लड़की के लौटने के बाद पुलिस को जानकारी नहीं दी, तब भी जब उसके पेट में पट्टी बंधी थी। पिता का दावा है कि लड़की 27 से 29 तक सनाउल्लाह के घर में ही रही। मगर पुलिस का कहना है कि वह अपने घर वालों के साथ ही थी। 29 जुलाई को लड़की एक बार फिर से गायब हो जाती है।
29 जुलाई को पुलिस पिता की शिकायत दर्ज कर लेते हैं। पिता के अनुसार उसे दुबई भेजने की तैयारी थी। मां ने कहा है कि मौलवी गंडा ताबीज़ करता है, उसने बेटी को वशीभूत कर लिया था। यानी ऐसा जादू कर दिया कि लड़की उसके प्रभाव में चली गई। यह वह कड़ी है जिसका जुड़ना बाकी है।
परिवार के अनुसार 3 अगस्त को लड़की मुजफ्फरनगर के मदरसे से भागने में कामयाब होती है और मदरसे के पास ही एक बाइक सवार युवक से लड़की ने कहा कि ऑपरेशन हुआ है, परेशानी में है और उसे वह मेरठ जाने वाली बस में बिठा दे। युवक ने उसे बस में बिठा दिया। बस में किसी यात्री के फोन से घरवालों को फोन करती है। परिवारवालों के अनुसार लड़की को लेकर सीधा थाने पहुंचे। थाने में पुलिस ने कई बार शिकायत लिखाई और फाड़ी। जब एफआईआर नहीं कर रहा है, तब इन लोगों ने सांसद से संपर्क किया। सांसद और बीजेपी के नेता थाने पहुंचे और स्थानीय लोग भी आ गए। हंगामा किया जिसके बाद पुलिस ने पिता की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की। उसी दिन गांव के प्रधान नवाब खान सनाउल्लाह की पत्नी और लड़की की दोस्त को गिरफ्तार कर लिया। सनाउल्लाह फरार है।
पहले मेडिकल टेस्ट में बलात्कार और ऑपरेशन की वजह के नतीजे ठोस रूप से सामने नहीं आए हैं। इसीलिए पुलिस दोबारा मेडिकल जांच करवा रही है। एक आरोप यह भी है कि हापुड़ में एक मदरसे में धर्मपरिवर्तन कराया गया। लड़की के पास एक हलफनामा बरामद हुआ है, जिसमें यह लिखा हुआ है कि मर्ज़ी से धर्म बदल रही हूं। पुलिस इस पहलू की भी जांच कर रही है।
लड़की का आरोप था कि मुजफ्फरनगर के किसी मदरसे में कई हिन्दू लड़कियां बंद हैं, जिन्हें दुबई भेजने की तैयारी हो रही है। पुलिस ने रविवार की रात को ही छापा मारा। पुलिस के मुताबिक चार लड़कियां मिलीं, जो मुस्लिम थी और चारों ने कहा कि अपनी मर्जी से यहां रह रही हैं।
राजनीतिक दल और खासकर सोशल मीडिया ने इस गंभीर आपराधिक प्रकरण को दो मज़हबों का मामला बना दिया है। अभी से सारे निष्कर्ष निकाल लिए गए हैं और भड़काऊ भाषण दिए जा रहे हैं। हम इसका हश्र बदायूं रेपकांड के वक्त देख चुके हैं, जिसकी कहानी इस वक्त कोई और मोड़ ले चुकी है और इस्तीफे और राष्ट्रपति शासन की मांग करने वाले उसे भूलकर किसी और मामले की खोज में निकल पड़े हैं।
इंडियन एक्सप्रेस में आज अब्बू एस्थोज़ सुरेश की बेहतरीन रिपोर्ट छपी है। 16 मई के बाद से यूपी में जितने भी सांप्रदायिक धटना हुई है, उनमें से 60 प्रतिशत घटनाएं उन 12 विधानसभा क्षेत्रों में या आस-पास हुई हैं जहां उपचुनाव होने हैं। यूपी में 16 मई के बाद से 600 सांप्रदायिक तनाव की घटना दर्ज की गई है। पश्चिम उत्तर प्रदेश की पांच सीटों पर 259 सांप्रदायिक तनाव की घटना हुई है। सहारनपुर नगर, बिजनौर, कैराना, ठाकुरद्वारा और गौतमबुद्धनगर।
संवाददाता ने सांप्रदायिक घटनाओं के कारणों का भी विश्लेषण किया है। 120 घटनाएं लाउडस्पीकर लगाने-बजाने को लेकर हुई हैं। इतनी ही मस्जिद, मदरसा, क़ब्रिस्तान की दीवार बनाने गिराने को लेकर हुई हैं। 70 मामले ज़मीन विवाद को लेकर हुए हैं। गौ हत्या के कथित मामलों को लेकर 61 घटना। 50 मामले लड़की के भागने छेड़खानी को लेकर दर्ज हुए।
आज़ादी के पहले से मंदिर या मस्जिद में बजने वाला लाउडस्पीकर दंगों का कारण बनता रहा है, लेकिन ये तो आज भी हो रहा है। क्या ये लाउडस्पीकर इतना ज़रूरी है कि इसके लिए हम दो समुदायों के बीच नफरत की आग भड़का दें। कायदे से तो दोनों कौम के रहनुमाओं को अपनी अपनी छतों से लाउडस्पीकर को उतार कर नीचे रख देना चाहिए।
सोशल मीडिया पर जाकर आप दलीलों की आक्रमकता को देखिये। हमारी सरकार सिस्टम और समाज में नाइंसाफी के अनेक कारण हैं, क्या उन सभी को हम मज़हबी रूप देकर एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो जाएंगे। ये कौन सी राजनीति है जो इसके विरोध में नहीं खड़ी होती है। दरअसल नेता भी जानते हैं कि इस आग से उन्हीं को फायदा होता है। वह सामने वाले नेता पर हमला तो करते हैं, मगर समर्थक के नाम पर पीछे खड़ी भीड़ को शांत नहीं करते।
यूपी में दस हफ्ते में 600 से ज्यादा नफतर फैलाने वाली घटनाएं हो जाएं हम इसके खिलाफ आवाज़ उठाने की बजाए मोहब्बत की बात करने वालों में कमज़ोरियां तलाशने लगते हैं। मेरठ की घटना नफरत की नई खुराक बन रही है। यूपी के लोग चुप है। इतने नॉर्मल हो चुके हैं कि कहीं कोई पहल नहीं है इस हिंसा और अविश्वास के खिलाफ।
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