
प्रतीकात्मक फोटो
नई दिल्ली:
1000 और 500 की नोटबंदी के बाद उसका असर उद्योग धंधे से लेकर हर जगह दिखाई पड़ रहा है, पर खेती पर इसका व्यापक असर नजर आने लगा है. रबी की बुआई के लिए खेत तैयार हैं और किसान बीज और खाद का इंतज़ार कर रहे हैं. पुराने नोट बंद होने की वजह से किसान लाचार हो गया है. उसके पास नए नोट नहीं हैं, लिहाजा वह खाद और बीज नहीं ला पा रहा, जिससे खेत खाली पड़े हैं.
किसानों की इस परेशानी की पड़ताल करने के लिए जब हम बनारस पहुंचे तो धान की फसल बाद रबी की बुआई के लिए तैयार कर चुके अपने खेत में निकल आई घास को किसान ज्वाला प्रसाद भारी मन से निकालते दिखे. ज्वाला प्रसाद ने रबी की फसल की बुआई के लिए पांच दफा खेत की जुताई के बाद पानी लगाया. उसके सूख जाने के बाद फिर तीन बार खेत को जोत कर जब बुआई की तैयारी करने के लिए बीज और खाद लाने के जुगाड़ में लगे तो अचानक नोट बंदी की खबर आ गई. लिहाजा घर में पुराने नोट होने के बावजूद भी बीज खाद नहीं ला पाए और खेत खाली रह गया.
ज्वाला प्रसाद से जब हमने पूछा कि खेत खाली क्यों हैं तो छूटते ही बोले 'न तो खाद बा न तो बीज बा, कहीं नया नोट नहीं है, कहीं कोई दे नहीं रहा, हम 2 बीघा खेत जोत कर तैयार हैं, बीज नहीं है क्या करें, बड़ी परेशानी है.
पुराने नोट बंद होने से रबी की फसल की बुआई का असर सिर्फ किसानों पर ही नहीं खेतिहर मजदूरों पर भी पड़ रहा है. ज्वाला प्रसाद के घर के बगल राम धनि के यहां धान पीट रही चनरमा देवी नजर आईं. चनरमा और उनका परिवार खेतिहर मजदूर हैं. इस समय उनका रबी की फसल से आमदनी का समय है, लेकिन कहीं खेतों में बुआई नहीं हो रही है तो धान पीटने का काम मिला उसी को कर रही हैं, पर दुःख इस बात का है अगर ऐसे ही बुआई रुकी रही तो असर उनके अपने चूल्हे पर पड़ सकता है.
चनरमा देवी से पूछने पर कहा कि यही हम लोगों की मजदूरी है. यही काम नहीं होगा तो क्या होगा. नोट के बंद होने से तो परेशानी तो है ही और जो नए नोट मिलने की लिमिट है उससे भी किसानों को परेशानी हो रही है. 40 बीघा के कास्तकार ज्वाला प्रसाद बताते हैं कि एक बीघे में गेंहू की बुआई के लिए 1 बोरी डीएपी 1 हज़ार 50 की, 1 बोरी पोटास 800 रुपये की 1 बोरी यूरिया 350 की यानी टोटल 2200 रुपये खाद का खर्च, फिर गेहूं का बीज 1 बीघे में 40 किलो लगता है, जो 32 रुपये किलो है यानी 32 x 40 : 1280 रुपये. खेत तैयारी से लेकर बुआई तक 8 दफे 4000 रुपये. इसके साथ ही मजदूरी और दवा पर 1500 का खर्च आता है, यानी 1 बीघे खेत में तक़रीबन 9000 रुपये का खर्च आता है. अगर 5 बीघा खेत में हम गेहूं लगा रहे हैं तो हमें 45000 हज़ार रुपये चाहिए जबकि हम 4500 सौ रुपये ही निकाल सकते है.और वे भी मिल नहीं पा रहे.
रबी की फसल में मुख्यतः गेहूं, मटर, सरसों, जौ, चना, मसूरी, आलू होता है. इसके बीज के वितरण के लिए सरकार ने व्यवस्था की है. बनारस के विद्यापीठ ब्लाक में लगभग 9700 हेक्टेयर खेत में खेती होती, लिहाजा उसके हिसाब से बीज मंगाया गया. केंद्र के गोदाम में बीज की बोरी भरी हुई है पर खरीददार किसान नहीं है. इस केंद्र में 500 क्विंटल गेहूं का बीज आया. नोट बंदी से पहले 276 क्विंटल बिक गया था, लेकिन उसके बाद माल नहीं बिका. ये लोग भी बीज भी नहीं मंगा पा रहे हैं क्योंकि ट्रेजरी पुराने नोट नहीं ले रहा है.
किसानों की इस परेशानी की पड़ताल करने के लिए जब हम बनारस पहुंचे तो धान की फसल बाद रबी की बुआई के लिए तैयार कर चुके अपने खेत में निकल आई घास को किसान ज्वाला प्रसाद भारी मन से निकालते दिखे. ज्वाला प्रसाद ने रबी की फसल की बुआई के लिए पांच दफा खेत की जुताई के बाद पानी लगाया. उसके सूख जाने के बाद फिर तीन बार खेत को जोत कर जब बुआई की तैयारी करने के लिए बीज और खाद लाने के जुगाड़ में लगे तो अचानक नोट बंदी की खबर आ गई. लिहाजा घर में पुराने नोट होने के बावजूद भी बीज खाद नहीं ला पाए और खेत खाली रह गया.
ज्वाला प्रसाद से जब हमने पूछा कि खेत खाली क्यों हैं तो छूटते ही बोले 'न तो खाद बा न तो बीज बा, कहीं नया नोट नहीं है, कहीं कोई दे नहीं रहा, हम 2 बीघा खेत जोत कर तैयार हैं, बीज नहीं है क्या करें, बड़ी परेशानी है.
पुराने नोट बंद होने से रबी की फसल की बुआई का असर सिर्फ किसानों पर ही नहीं खेतिहर मजदूरों पर भी पड़ रहा है. ज्वाला प्रसाद के घर के बगल राम धनि के यहां धान पीट रही चनरमा देवी नजर आईं. चनरमा और उनका परिवार खेतिहर मजदूर हैं. इस समय उनका रबी की फसल से आमदनी का समय है, लेकिन कहीं खेतों में बुआई नहीं हो रही है तो धान पीटने का काम मिला उसी को कर रही हैं, पर दुःख इस बात का है अगर ऐसे ही बुआई रुकी रही तो असर उनके अपने चूल्हे पर पड़ सकता है.
चनरमा देवी से पूछने पर कहा कि यही हम लोगों की मजदूरी है. यही काम नहीं होगा तो क्या होगा. नोट के बंद होने से तो परेशानी तो है ही और जो नए नोट मिलने की लिमिट है उससे भी किसानों को परेशानी हो रही है. 40 बीघा के कास्तकार ज्वाला प्रसाद बताते हैं कि एक बीघे में गेंहू की बुआई के लिए 1 बोरी डीएपी 1 हज़ार 50 की, 1 बोरी पोटास 800 रुपये की 1 बोरी यूरिया 350 की यानी टोटल 2200 रुपये खाद का खर्च, फिर गेहूं का बीज 1 बीघे में 40 किलो लगता है, जो 32 रुपये किलो है यानी 32 x 40 : 1280 रुपये. खेत तैयारी से लेकर बुआई तक 8 दफे 4000 रुपये. इसके साथ ही मजदूरी और दवा पर 1500 का खर्च आता है, यानी 1 बीघे खेत में तक़रीबन 9000 रुपये का खर्च आता है. अगर 5 बीघा खेत में हम गेहूं लगा रहे हैं तो हमें 45000 हज़ार रुपये चाहिए जबकि हम 4500 सौ रुपये ही निकाल सकते है.और वे भी मिल नहीं पा रहे.
रबी की फसल में मुख्यतः गेहूं, मटर, सरसों, जौ, चना, मसूरी, आलू होता है. इसके बीज के वितरण के लिए सरकार ने व्यवस्था की है. बनारस के विद्यापीठ ब्लाक में लगभग 9700 हेक्टेयर खेत में खेती होती, लिहाजा उसके हिसाब से बीज मंगाया गया. केंद्र के गोदाम में बीज की बोरी भरी हुई है पर खरीददार किसान नहीं है. इस केंद्र में 500 क्विंटल गेहूं का बीज आया. नोट बंदी से पहले 276 क्विंटल बिक गया था, लेकिन उसके बाद माल नहीं बिका. ये लोग भी बीज भी नहीं मंगा पा रहे हैं क्योंकि ट्रेजरी पुराने नोट नहीं ले रहा है.