
बीते दिनों नवरात्रों के दौरान होने वाले गरबे को लेकर कुछ विवादित बयान सामने आए थे, लेकिन ऐसे माहौल में जब सूरत के इरशाद मंसूरी जैसे शख्स का नाम सामने आता है, तो हैरानी होती है। इरशाद बीते दो दशकों से भाइचारे की मिसाल बने हुए हैं।
गुरुवार से शुरू हो रही नवरात्रि के लिए अपने छात्रों की आखिरी तैयारी करा रहे आठवीं कक्षा तक पढ़े इरशाद मंशूरी करीब 14 साल की उम्र से गरबा खेल रहे थे और पिछले 27 साल से गरबा सीखा रहे हैं। कुछ कट्टर हिंदू संगठनों के मुस्लिमों के गरबा में आने पर आपत्ति के मुद्दे से इरशाद कुछ आहत हैं।
सूरत के इरशाद इतने लोकप्रिय हैं कि 300 से ज्यादा युवक और युवतियां उनसे गरबा सीख रहे हैं। यहां गरबा सीख रहीं ज्यादातर लड़कियां मानती हैं कि त्यौहारों को जबरन सांप्रदायिक रंग दिया जा रहाह ै।
गरबा सीख रहीं सिद्धि पटेल कहती हैं कि "हमारे सर मुस्लिम है, यहां पर काफी स्टूडेंट भी हैं जो अलग-अलग कम्युनिटी से हैं, कोई हिन्दू है, कोई क्रिश्चियन है, जैन है, तो यह डिफरेंस जो हो रहा है वो मुस्लिम के लिए ही क्यों कर रहे है। बाकि सभी तो खेल रहे हैं और यह लव जिहाद वाली बातें हैं इसमें मैं बिलीव नहीं करती। हमेशा से ऐसा होता है कि हम हर फेस्टिवल साथ में मनाते हैं। हर धर्म के लोग साथ मिलकर मनाते हैं। जब हम उनके फेस्टिवल में पार्टिसिपेंट करते हैं, तो इसमें भी उनको खेलने देना चाहिए।
वहीं, दर्शना गांधी, "मैं नहीं मानती कि कम्युनिटी बीच में आनी चाहिए। सभी कास्ट इसमें इन्वॉल्व है। सभी हैं हमारे साथ जैन, हिन्दू, मुस्लिम, खोजा सब साथ में मिलकर नवरात्रि खेलते हैं, फेस्टिवल सभी के लिए हैं।"
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