
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को अपने कैबिनेट के विस्तार में भले ही बिहार और उत्तर प्रदेश पर ज्यादा ध्यान दिया हो, लेकिन इस विस्तार में एक नाम 'गिरिराज सिंह' के शामिल होने से सरकार की आलोचना हो रही है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि गिरिराज सिंह को शामिल कर नरेंद्र मोदी ने अपने ही बयान 'न खाएंगे ना खाने देंगे' को कमजोर किया है। दरअसल गिरिराज सिंह को शामिल कर मोदी ने उन पर एहसान नहीं किया है, बल्कि पिछले चार वर्षों से गिरिराज द्वारा मोदी फैंस क्लब चलाने के लिए उनके कर्ज को उतारा है। जब मोदी के नाम लेने से सब डरते थे, तब गिरिराज मजबूती से ना केवल इस बात को दोहराते थे कि मोदी पर प्रचार के लिए पाबंदी खत्म की जानी चाहिए। बल्कि बाद के दिनों में मोदी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार हो उसकी वकालत बिना उसके परिणाम की चिंता किए हुए चमकर किया करते थे।
और शायद प्रधानमंत्री बनने के बाद जब मोदी ने कैबिनेट में 75 वर्ष से ज्यादा उम्र के नेताओं को शामिल नहीं करने की घोषणा की तो चौंकिये मत, वह दरअसल कैबिनेट में गिरिराज के प्रवेश का मार्ग आसान करने के लिए किया गया प्रतित होता है। गिरिराज बिहार के भूमिहार जाति से आते हैं और उस जाति से दो और दिग्गज डॉ. सीपी ठाकुर और भोला सिंह भी कतार में थे, लेकिन दोनों की उम्र 75 साल से अधिक थी। तो ऐसे में प्रधानमंत्री के इस घोषणा के बाद गिरिराज के प्रवेश को चुनौती देने वाला कोई नहीं बचा।
लेकिन गिरिराज के घर से एक करोड़ 14 लाख की चोरी और बाद में उसकी बरामदगी उनके गले का फंदा था। इस मामले की जांच फिलहाल पटना पुलिस और आयकर विभाग कर रही हैं। इस मामले में तब गिरिराज के एक भाई ने दावा किया था कि यह पैसा उनका है, लेकिन आयकर विभाग के अधिकारियों का मानना है कि इस दावे के समर्थन में जितने तर्क दिए गए सबमें काफी अंतर्विरोध हैं।
लेकिन प्रधानमंत्री तो प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सोमवार को जब ये कहा कि गिरिराज के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता, उससे शायद उन्हें अंदाजा हो या नहीं, लेकिन राजनीतिक के चक्कर में इनकम टैक्स अधिकारियों के नजर में उनकी छवि पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। क्योंकि जब जांच चल रही है तब जेटली का क्लीन चिट देना एक तरह से जांच को प्रभावित करने जैसा है। उनके बयान ने आयकर विभाग के मनोबल को और भी कम किया है।
इसलिए गिरिराज के कैबिनेट में प्रवेश ने एक बात साफ कर दिया कि बीजेपी अन्य पार्टियों से अलग नहीं उनकी तरह ही है, बस डिग्री का अंतर है। सरकार के इस कदम अब हिंदी क्षेत्रों में बीजेपी के भ्रष्टाचार का मुद्दा निश्चित रूप से कमजोर पड़ेगा।
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