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This Article is From Jan 04, 2015

सौ साल बाद मिला चूल्हा टैक्स देने वालों को मालिकाना हक

नई दिल्ली:

टोडापुर, दसघरा, मोचीबाग, झिलमिल और ताहिरपुर रजा गांव में रहने वाले लाखों लोगों को अपने घरों का मालिकाना हक सौ साल बाद मिल रहा है। इन पांच गांव की जमीन दिल्ली में नई दिल्ली यानि लुटियन जोन बनाने के लिए 1911 में अधिग्रहित कर ली गई थी।

रायसीना और मालचा गांव की तरह इन गांवों को भी दूसरी जगह बसाना था, पर अंग्रेजों को जमीन की जरूरत नहीं पड़ी और ये पांच गांव बच गए। लेकिन यहां रहने के लिए इन्हें अंग्रेजों के बनाए गए नजूल विभाग को एक आना प्रति चूल्हा टैक्स देना पड़ता था। इसके चलते इसका नाम ही चूल्हा टैक्स पड़ गया।

हालांकि आजादी के बाद 1984 तक इस टैक्स को वसूला जाता था, इसके बाद टैक्स बहुत कम होने के चलते निगम ने इन्हें वसूला जाना बंद कर दिया। तब से चूल्हा टैक्स देने वाले गांव अपने घरों के मालिकाना हक के लिए लड़ रहे हैं।

टोडापुर के नंबरदार परिवार से ताल्लुक रखने वाले ब्रहम यादव बताते हैं कि उनके दादा को चूल्हा टैक्स वसूल कर अंग्रेजों के खजाने में जमा करवाना होता था। ज़मीन अंग्रेज हमसे छीन चुके थे इस टैक्स को देने के लिए मजदूरी तक करनी पड़ती थी। अगर उनके नंबरदार दादा इस टैक्स को वसूलने में नाकाम रहते तो उनकी तहसील में पिटाई तक करवाई जाती थी।

हालांकि डीडीए चूल्हा टैक्स देने वालों को मालिकाना हक देने के लिए फीस चार्ज कर रहा है। जिन लोगों के नाम पर चूल्हा टैक्स की पर्चियां है उन्हें 575 रुपये मीटर के हिसाब से पैसा डीडीए वसूलेगा, जबकि जिन्होंने चूल्हा टैक्स वालों से घर खरीदा है उन्हें 3500 रुपये मीटर के हिसाब से फीस देनी पड़ेगी।

इस फीस से दसघरा गांव में रहने वाले कुलबीर नाराज हैं। वह कहते हैं कि जिनके पास 200 गज या उससे ज्यादा बड़ा मकान है, उन्हें लाखों रुपये फीस भरनी पड़ेगी। पहले हमारे गांव की 1300 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर ली गई। अब मकान के मालिकाना हक के बदले पैसे लिए जा रहे हैं।

टोडापुर और कसघरा गांव राष्ट्रपति भवन से महज पांच किमी दूर है। लेकिन इन गांव के एक तरफ सेना का सिगनल कोर है, तो दूसरी तरफ पूसा एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट। गांव में जमीन बची नहीं है ऐसे में मालिकाना हक मिलने से इन गांवों के घरों की कीमत तो बढ़ जाएगी, लेकिन नए घर बनाना बेहद मुश्किल है।

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