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This Article is From Jan 31, 2019

गुजरात नरसंहार: बाबू बजरंगी मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार से मांगा जवाब

2002 का गुजरात नरोदा पाटिया नरसंहार  मामले में दोषी बजरंग दल के बाबू बजरंगी ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की थी.

गुजरात नरसंहार: बाबू बजरंगी मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
नई दिल्ली:

2002 का गुजरात नरोदा पाटिया नरसंहार  मामले में दोषी बजरंग दल के बाबू बजरंगी ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की थी. याचिका में कहा गया है कि वो शारीरिक रूप से ठीक नहीं है और कुछ वक्त पहले उसकी बाईपास सर्जरी भी हुई है. बाबू बजरंगी ने हाईकोर्ट के फैसले को भी चुनौती दी है. सुप्रीम कोर्ट ने बाबू बजरंगी की याचिका पर गुजरात सरकार से जवाब मांगा है. कोर्ट ने एक हफ्ते के भीतर गुजरात सरकार से जवाब दाखिल करने के लिए कहा है.  

इस दौरान गुजरात सरकार ने जमानत देने का समर्थन किया और कहा कि स्वास्थ्य आधार पर जमानत दी जा सकती है. लेकिन पीठ ने कहा कि इस पर हलफनामा दाखिल करें.

दरअसल विशेष अदालत ने बाबू बजरंगी को जिंदगी की आखिरी सांस तक कारावास की सजा सुनाई गई थी. गुजरात  हाईकोर्ट ने भी बाबू बजरंगी को दोषी करार दिया था लेकिन हाईकोर्ट ने इसे घटाकर 21 साल की सजा कर दी थी.

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इससे पहले 21 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने 4 दोषियों को जमानत दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनकी सजा पर संदेह है. चारों दोषियों को आगजनी, दंगा करने के लिए 10 साल की जेल की सजा सुनाई गई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सजा का आदेश बहस का मुद्दा है. कोर्ट ने उमेशभाई भारवाड़, राजकुमार, हर्षद और प्रकाशभाई राठौड़ को जमानत दे दी. सभी को गुजरात हाइकोर्ट ने दोषी ठहराया था. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी और अन्य की अपील भी स्वीकार कर ली. 28 फरवरी, 2002 को सांप्रदायिक दंगों के दौरान अहमदाबाद के नरोदा पाटिया क्षेत्र में कम से कम 97 मुस्लिम मारे गए थे.  

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कोडनानी को 28 साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी. एक अन्य बहुचर्चित आरोपी बजरंग दल के पूर्व नेता बाबू बजरंगी को मृत्यु पर्यंत आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. सात अन्य को 21 साल के आजीवन कारावास और शेष अन्य को 14 साल के साधारण आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. निचली अदालत ने सबूतों के अभाव में 29 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया था. जहां दोषियों ने निचली अदालत के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी, वहीं विशेष जांच दल ने 29 लोगों को बरी किया था. 

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