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This Article is From Mar 28, 2014

सुप्रीम कोर्ट में 'जुवेनाइल' शब्द की नए सिरे से व्याख्या की याचिकाएं खारिज

नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने किशोर न्याय कानून के तहत 'जुवेनाइल' शब्द की नए सिरे से व्याख्या के लिए दायर याचिकाएं आज खारिज कर दीं। इन याचिकाओं में कहा गया था कि जघन्य अपराधों के आरोपी के किशोर होने का निर्धारण किशोर न्याय बोर्ड की बजाय फौजदारी की अदालत को करना चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायूर्ति शिव कीर्ति सिंह की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी और 16 दिसंबर के सामूहिक बलात्कार की शिकार युवती के पिता की याचिकाएं खारिज कर दीं। इन याचिकाओं में किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) कानून, 2000 के तहत ‘किशोर’ शब्द के प्रावधान को चुनौती दी गई थी।

न्यायाधीशों ने 16 दिसंबर के सामूहिक बलात्कार मामले में दोषी जुवेनाइल का मामला नए सिरे से सुनवाई के लिए नियमित अदालत को भेजने हेतु पीड़िता के पिता की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि किशोर का मुकदमा नियमित सुनवाई के लिए फिर से भेजने का सवाल ही नहीं उठता।

न्यायालय ने किशोर न्याय कानून के तहत 18 साल की आयु के अपराधियों के मामलों की सुनवाई किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष करने का प्रावधान असंवैधानिक नहीं है। इस मामले की सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार ने दोनों याचिकाओं का विरोध किया था।

पीड़ित के पिता ने याचिका में कहा था कि 31 अगस्त, 2013 का किशोर न्याय बोर्ड का फैसला परिवार को स्वीकार्य नहीं है। इसीलिए वह इस कानून को चुनौती दे रहे हैं, क्योंकि राहत के लिये संपर्क करने हेतु कोई अन्य प्राधिकार उपलब्ध नहीं है।

उन्होंने किशोर न्याय कानून के उस अधिकार को असंवैधानिक और शून्य घोषित करने का अनुरोध किया था, जो एक किशोर द्वारा भारतीय दंड संहिता के दायरे में आने वाले अपराध के मामले की सुनवाई से फौजदारी अदालत को वंचित करता है।

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