बिहार में नीतीश कुमार और BJP के बीच नूरा कुश्ती का असल कारण और राजनीतिक असर क्या?

भाजपा का कहना है कि सब कुछ नीतीश कुमार के इशारे पर किया जाए यह इसलिए असम्भव है क्योंकि नीतीश अब तीसरे नम्बर की पार्टी के नेता हैं और कुर्सी उनको नरेंद्र मोदी के कृपा से मिली है.

बिहार में नीतीश कुमार और BJP के बीच नूरा कुश्ती का असल कारण और राजनीतिक असर क्या?

नीतीश कुमार की पार्टी और बीजेपी के बीच अक्सर वाकयुद्ध चलता रहता है. (फाइल फोटो)

पटना:

बिहार (Bihar) में आजकल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) और सहयोगी दल बीजेपी (BJP) के बीच हर मुद्दे पर बिना समय गँवाए वाकयुद्ध शुरू हो जाता है. इसका एक उदाहरण पिछले 24 घंटे के दौरान नीतीश कुमार के गृह ज़िले नालंदा में ज़हरीली शराब पीने के बाद ग्यारह लोगों की कथित मौत के बाद भी देखने को मिला.

बीजेपी ने रविवार को ना केवल अपना प्रतिनिधिमंडल नालंदा भेजा बल्कि यहाँ तक बयान में कह डाला कि ऐसी घटना प्रशासनिक लचरता का परिणाम है. निश्चित रूप से बीजेपी का ये तेवर नीतीश कुमार और उनकी पार्टी को नागवार गुज़र रहा होगा लेकिन उनकी दिक्कत यह है कि शराबबंदी के मुद्दे पर अब राज्य में कोई भी राजनीतिक दल उनके साथ नहीं दिखना चाहता है.

रविवार सुबह तो बिहार भाजपा के अध्यक्ष संजय जायसवाल ने एक पोस्ट में सरकार की शराब नीति पर जमकर खरी खोटी सुना डाली और यहाँ तक कह दिया कि क्या मृतक के  परिवार वालों को भी जेल के अंदर डाला जाएगा?

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इससे पूर्व जेडीयू पिछले पाँच दिनों से सम्राट अशोक के बारे में लेखक दया प्रकाश सिन्हा के लिखे आपत्तिजनक अंशों को मुद्दा बनाकर भाजपा को घेरने का प्रयास कर रही थी. दबाव में भाजपा ने सिन्हा के ख़िलाफ़ पटना के कोतवाली थाने में एक प्राथमिकी भी दर्ज करायी लेकिन जनता दल यूनाइटेड इस माँग पर अड़ी है उन्हें दिया गया पद्म पुरस्कार और साहित्य अकादमी का अवार्ड केंद्र सरकार वापस ले.

भाजपा नेताओं का मानना है कि ये सब नीतीश के इशारे पर यूपी विधान सभा चुनावों में सीट लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा था लेकिन पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने इसका संज्ञान ना लेकर जेडीयू को अब अपने बलबूते उम्मीदवार खड़ा करने के लिए मजबूर कर दिया है.

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इधर, जेडीयू को इस बात का भी मलाल है कि जातिगत जनगणना के मुद्दे पर मुख्य मंत्री नीतीश कुमार सर्वदलीय बैठक करना चाहते हैं लेकिन भाजपा के कारण वह भी अधर में लटका है. वहीं भाजपा ने उल्टे नीतीश पर इसे बेवजह मुद्दा बनाने का आरोप लगाया है. भाजपा नेताओं का कहना है पार्टी पहले ही विधान सभा के अंदर दो दो बार प्रस्ताव का समर्थन कर चुकी है और प्रधान मंत्री से मिलने गए प्रतिनिधिमंडल का भी हिस्सा बन चुकी है. इसके अलावा झारखंड में जब इस मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री से मिलने की बारी आई तो वहाँ के राज्य इकाई के अध्यक्ष भी उसमें शामिल थे, जो इस बात को साफ़ करता है कि भाजपा नहीं चाहते हुए भी इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से विरोध नहीं कर सकती.

इसके अलावा जनता दल यूनाइटेड जब भी विशेष राज्य का दर्जा का मुद्दा उठाती है तो भाजपा के केंद्र से लेकर राज्य के नेता इसे कोई ना कोई तर्क देकर अप्रासंगिक बता देते हैं जो जेडीयू और नीतीश कुमार को पसंद नहीं है लेकिन इन सब घटना क्रम के बाद भी दोनो पार्टियों के नेता मानते हैं कि सरकार को कोई ख़तरा नहीं क्योंकि ना नीतीश विकल्प में अब राष्ट्रीय जनता दल के साथ जाना चाहते हैं और ना भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व फ़िलहाल नीतीश कुमार को कुर्सी से बेदख़ल करना चाहता है. 

भाजपा का कहना है कि सब कुछ नीतीश कुमार के इशारे पर किया जाए यह इसलिए असम्भव है क्योंकि नीतीश अब तीसरे नम्बर की पार्टी के नेता हैं और कुर्सी उनको नरेंद्र मोदी के कृपा से मिली है. अब सब मानते हैं कि हर मुद्दे पर जैसे जूतम-पैजार की नौबत आ जाती है वैसे में नीतीश कुमार की धाक अब पहले जैसी नहीं रही.

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