
मुंबई की लोकल ट्रेनों में ऑटोमॅटिक दरवाज़ों के साथ लोगों को सुरक्षित यात्रा देने की उम्मीद पश्चिम रेलवे को है, लेकिन इस उम्मीद के सामने 80 लाख लोगों की भीड़ की चुनौती है। लोकल ट्रेनों के मौजूदा डिज़ाइन पर यात्रियों की दशकों पुरानी आदतें बनी हैं।
आज तक खुले दरवाज़ों के चलते लोग दरवाज़े में खड़े हो कर सफ़र या चलती ट्रेन से चढ़ने-उतरने के आदी हैं। मुंबई में मध्य और पश्चिम रेलवे सुरक्षा आयुक्त का कहना है कि पश्चिम रेलवे ने इन दरवाज़ों को लगवाने से पहले उनसे राय-मशविरा नहीं किया।
मुंबई की लोकल हर हाल्ट पर क़रीब 30 सेकेंड रुकती है। ऑटोमॅटिक दरवाज़े खुलने में क़रीब ढाई सेकेंड लगते हैं, और उतना ही समय दरवाज़े बंद होने में लगता है। यानी हर स्टेशन पर 30 सेकेंड के हाल्ट में केवल 25 सेकेंड यात्रियों को चढ़ने-उतरने मिलते हैं। सुनने में छोटा लगता ये समय लोगों की भीड़, और हर तीसरे मिनट एक ट्रेन के लक्ष्य को प्रभावित कर सकता है।
मुंबई के रेलवे सुरक्षा आयुक्त ने एनडीटीवी को बताया है, कि इन दरवाज़ों को लगाने से पहले रेलवे ने उनसे मशविरा नहीं किया। पश्चिम रेलवे के प्रवक्ता शरत चंद्रायन ने एनडीटीवी से कहा, 'बात नई ट्रेन की नहीं है, हमने पुरानी ट्रेन में ही सुधार किया है। ऐसे में यह बात सुरक्षा आयोग के दायरे में नहीं आती।'
लेकिन रेलवे की दलील कमज़ोर इसलिए लगती है, क्योंकि सुरक्षा आयोग रेल डिब्बों के अलावा रेलवे के अनेक पहलुओं पर गंभीरतापूर्वक विचार करता है। इनमें पटरियों के ऊपर से गुज़रते पुल, प्लेटफ़ार्म की ऊंचाई जैसे मामले शामिल बताये जाते हैं। स्वचालित डिब्बों में एक बड़ी कमी है कि वे बंद होने से पहले वैसी ऑडियो चेतावनी नहीं देते, जैसी अगले स्टेशन के आने की दी जाती है। ऐसे में चार महीने तक जिन दरवाज़ों पर रेलवे ने काम किया, उन्हें सुरक्षा आयोग को न दिखाना, छोटी बात नहीं लगती।
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