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वॉर का वार: हवा, जमीन और पानी हो रहे प्रदूषित, कैसे आने वाली पुश्तों पर पड़ेगा असर

गोला बारूद से निकलने वाले केमिकल, दूसरे पॉल्यूटेंट से नदियों व समुद्री ढांचे को हुआ नुकसान लंबे समय तक असर डाल सकता है. इससे इंसानों की सेहत और इकोसिस्टम की बायोडायवर्सिटी पर खतरा बढ़ सकता है, खासकर ब्लैक सी और सी ऑफ अजोव के आसपास.

वॉर का वार: हवा, जमीन और पानी हो रहे प्रदूषित, कैसे आने वाली पुश्तों पर पड़ेगा असर
जंग ने यूक्रेन के पर्यावरण को भी झकझोरा, जंगल, मिट्टी और समुद्र पर गहरा असर.

यूक्रेन में चल रही जंग का असर अब सिर्फ शहरों और इमारतों तक सीमित नहीं रहा. इसके निशान हवा, जमीन और समुद्र तक पहुंचने लगे हैं. यूरोपीय कमीशन के जॉइंट रिसर्च सेंटर यानी JRC की रिपोर्ट बताती है कि युद्ध के कारण कई तरह के केमिकल और पॉल्यूटेंट नेचर सिस्टम में फैल रहे हैं. इसका असर अभी तो दिख ही रहा है, लेकिन इसका बड़ा खतरा आने वाले सालों और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी हो सकता है.

जंग के दौरान बमबारी, आग और सैन्य ऑपरेशन के कारण हवा, मिट्टी और पानी तीनों प्रभावित हुए हैं. गोला-बारूद से निकलने वाले केमिकल, फ्यूल जलने से बनने वाले धुएं और तबाह हुई इंडस्ट्री के मलबे से कई इलाकों में पॉल्यूशन बढ़ा है. हालांकि युद्ध के दौरान कई फैक्ट्रियां और एनर्जी फैसिलिटी बंद या नष्ट हो जाने से कुछ समय के लिए ग्रीनहाउस गैस इमिशन कम हुआ. लेकिन सैन्य ऑपरेशन खुद भी बड़े स्तर पर इमिशन और पॉल्यूशन पैदा कर रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक जंग के पहले 18 महीनों में ही सैन्य गतिविधियों से करीब 77 मिलियन टन CO2 इक्विवेलेंट इमिशन दर्ज किया गया.

हवा पर असर

रिपोर्ट बताती है कि यूक्रेन के कई शहरों में हवा की हालत पहले से ही पूरी तरह सुरक्षित नहीं थी. कुछ प्रदूषक तय स्टैंडर्ड के भीतर रहे, लेकिन कई गैस और महीन कण सीमा से ज्यादा दर्ज हुए. राजधानी कीव में भी हवा में मौजूद महीन कण विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय सख्त स्टैंडर्ड से ऊपर पाए गए. जंग के बाद तो कई इलाकों में पॉल्यूशन का पैटर्न और जटिल हो गया है क्योंकि बमबारी, आग और धुएं का असर भी इसमें जुड़ गया है. 

जमीन और जंगल भी प्रभावित

यूक्रेन के कुल इलाके का लगभग पांचवां हिस्सा जंगलों से ढका है. लेकिन जंग ने इन इलाकों को भी नहीं छोड़ा. रिपोर्ट के मुताबिक करीब 17 लाख हेक्टेयर जंगल युद्ध से प्रभावित हुए हैं. जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ी हैं और कई जगह जंग में इस्तेमाल हुए बम-गोले के बचे हिस्से भी जमीन में पड़े हैं. इसके अलावा लेड, मर्करी और आर्सेनिक जैसे जहरीले तत्व मिट्टी में पहुंचने का खतरा भी बढ़ गया है. ये धीरे-धीरे फूड चेन में पहुंचकर इंसानों की सेहत को प्रभावित कर सकते हैं.

मिट्टी का मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि यूक्रेन की इकोनॉमी में खेती की बड़ी भूमिका है. देश के एक्सपोर्ट का बड़ा हिस्सा कृषि से जुड़ा है. अगर मिट्टी की हालत खराब होती है तो इसका असर लंबे समय तक खेती और फूड सप्लाई पर पड़ सकता है.

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समुद्र और पानी पर भी खतरा

ब्लैक सी पहले से ही कई तरह के दबाव झेल रहा था, लेकिन जंग के बाद खतरे और बढ़ गए हैं. सैन्य ऑपरेशन के कारण केमिकल फैलने और समुद्री ढांचे को नुकसान पहुंचने की आशंका बढ़ी है. इससे समुद्री जीवन और पूरे इकोसिस्टम पर असर पड़ सकता है. जंग के कारण कई तटीय इलाकों तक पहुंचना मुश्किल हो गया है. इसी वजह से समुद्री इलाकों की नियमित मॉनिटरिंग भी नहीं हो पा रही. इससे असली नुकसान का पूरा आकलन करना भी कठिन हो गया है.

आने वाली पीढ़ियों के लिए चुनौती

रिपोर्ट के मुताबिक जंग का असर सिर्फ मौजूदा समय तक सीमित नहीं रहेगा. मिट्टी में घुलने वाले जहरीले तत्व, जंगलों का नुकसान और समुद्री इकोसिस्टम में बदलाव आने वाले कई वर्षों तक असर डाल सकते हैं. इसी वजह से विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन के रीकंस्ट्रक्शन के दौरान हवा, जमीन और पानी को सुरक्षित रखने पर खास ध्यान देना होगा. तभी जंग से हुए इस पर्यावरणीय नुकसान के असर को आने वाली पीढ़ियों तक फैलने से रोका जा सकेगा.

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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