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खसरे के सालों बाद सामने आई जानलेवा न्यूरोलॉजिकल बीमारी, 9 साल के बच्चे की कहानी झकझोर देगी

मुंबई का 9 साल का बच्चा SSPE नाम की दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल बीमारी से जूझ रहा है, जिसका संबंध खसरे से है. जानें क्या है SSPE, इसके लक्षण, कारण और खतरे.

खसरे के सालों बाद सामने आई जानलेवा न्यूरोलॉजिकल बीमारी, 9 साल के बच्चे की कहानी झकझोर देगी
SSPE Disease: खसरे से जुड़ी दुर्लभ बीमारी ने 9 साल के बच्चे को किया बेबस, जानें लक्षण और खतरे
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मुंबई का 9 साल का शौर्य भोसले कुछ साल पहले तक बिल्कुल सामान्य बच्चा था. स्कूल जाना, खेलना और दोस्तों के साथ वक्त बिताना उसकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था. फिर अचानक उसके पैर लड़खड़ाने लगे, वह बार-बार गिरने लगा, उसकी याददाश्त कमजोर होने लगी और व्यवहार में भी बदलाव आने लगा. जांच के बाद पता चला कि वह SSPE यानी Subacute Sclerosing Panencephalitis नाम की दुर्लभ और गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी से जूझ रहा है, जिसका संबंध खसरे के संक्रमण से है.

म‍िड डे में छपी एक र‍िपोर्ट के अनुसार हालत ये है कि शौर्य अब बिस्तर से उठ भी नहीं सकता है.  परिवार उसकी चौबीसों घंटे देखभाल कर रहा है और इलाज के खर्च के साथ सरकारी मदद का इंतजार भी कर रहा है.

खसरे के संक्रमण से कैसे जुड़ी है यह बीमारी?

SSPE (Subacute Sclerosing Panencephalitis) खसरे (Measles) की एक दुर्लभ लेकिन बेहद गंभीर जटिलता है. विशेषज्ञों के अनुसार कुछ मामलों में खसरे का वायरस शरीर, खासकर मस्तिष्क में निष्क्रिय अवस्था में बना रह सकता है. वर्षों बाद यही वायरस दिमाग में धीरे-धीरे सूजन और क्षति पैदा करता है, जिससे SSPE विकसित होती है. यह बीमारी अक्सर खसरे के संक्रमण के कई साल बाद सामने आती है.

SSPE के शुरुआती लक्षण क्या हैं?

SSPE की शुरुआत अक्सर बहुत सामान्य और सूक्ष्म लक्षणों से होती है, जिसके कारण बीमारी का पता लगाना आसान नहीं होता। शुरुआती संकेतों में शामिल हो सकते हैं:

  • याददाश्त कमजोर होना
  • पढ़ाई में प्रदर्शन गिरना
  • व्यवहार में बदलाव
  • चिड़चिड़ापन या मूड स्विंग्स
  • ध्यान लगाने में कठिनाई
  • बोलने या समझने में परेशानी
  • बार-बार गिरना या संतुलन बिगड़ना

बाद में मरीज में झटके (Seizures), मांसपेशियों में अनियंत्रित हरकतें और देखने की क्षमता प्रभावित होने जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं.

इस बीमारी से बच्चे के शरीर और दिमाग पर क्या असर होता है?

SSPE एक प्रोग्रेसिव न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, यानी समय के साथ इसकी गंभीरता बढ़ती जाती है। यह बीमारी मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है, जिससे:

  • सोचने और याद रखने की क्षमता प्रभावित होती है
  • चलने-फिरने और संतुलन बनाने में मुश्किल आती है
  • मांसपेशियों में अकड़न और झटके आने लगते हैं
  • बोलने और निगलने में दिक्कत हो सकती है
  • दृष्टि (Vision) कमजोर हो सकती है
  • मरीज धीरे-धीरे दैनिक कामों के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है

गंभीर मामलों में बीमारी कोमा और मृत्यु तक का कारण बन सकती है.

क्या SSPE का इलाज संभव है?

फिलहाल SSPE का कोई निश्चित या पूर्ण इलाज उपलब्ध नहीं है। डॉक्टर आमतौर पर लक्षणों को नियंत्रित करने और बीमारी की प्रगति को धीमा करने की कोशिश करते हैं. कुछ एंटीवायरल और इम्यून सिस्टम को प्रभावित करने वाली दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन अधिकांश मामलों में उपचार सहायक (supportive) देखभाल तक सीमित रहता है. यही वजह है कि इस बीमारी को रोकने में खसरा टीकाकरण (MMR Vaccine) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है.

शौर्य की मां कल्पना जगताप-भोसले के मुताबिक, बीमारी का पता चलने से पहले उनका बेटा जूनियर केजी में पढ़ता था और पूरी तरह स्वस्थ था. इसके बाद उसकी हालत तेजी से बिगड़ती गई. अब वह अपने दम पर चल-फिर भई नहीं सकता है. उसे रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है. परिवार का कहना है कि लगातार दवाओं, मेडिकल उपकरणों, फिजियोथेरेपी और देखभाल का खर्च उठाना मुश्किल होता जा रहा है.

सरकार से मदद की मांग

शौर्य की मां ने अब महाराष्ट्र राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण से मदद मांगी है. उनकी मांग सिर्फ अपने बेटे के इलाज तक सीमित नहीं है. वह चाहती हैं कि SSPE से जूझ रहे सभी बच्चों के परिवारों को भी इलाज और देखभाल के लिए सरकारी सहायता मिले. उन्हें हर महीने आर्थिक मदद, मुफ्त या सब्सिडी वाली दवाएं, मेडिकल उपकरण, फिजियोथेरेपी, रिहैबिलिटेशन और नर्सिंग जैसी सुविधाएं दी जाएं.

SSPE  के लिए अलग पॉलिसी की मांग

SSPE से जूझ रहे बच्चों के परिवार अब सरकारी मदद के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं. इस मामले में 17 अप्रैल 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट में सुनवाई हुई थी. अदालत के सामने बताया गया कि महाराष्ट्र में SSPE मरीजों के लिए फिलहाल कोई अलग हेल्थ और वेलफेयर पॉलिसी नहीं है.

वहीं, केंद्र ने कहा कि SSPE को National Policy for Rare Diseases के तहत शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि इस बीमारी का इलाज नहीं है. अप्रैल की उस सुनवाई के बाद से मामला अब तक दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुआ है.

महाराष्ट्र में कितने बच्चे प्रभावित?

परिवारों की ओर से दिए गए आंकड़े के मुताबिक महाराष्ट्र में SSPE से प्रभावित बच्चों की संख्या 60 से 62 के बीच है. वहीं जुलाई 2025 में महाराष्ट्र के सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश अबितकर की ओर से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को भेजी गई चिट्ठी में राज्य में 67 डायग्नोज मामलों का जिक्र किया गया था.

परिवारों का कहना है कि एसएसपीई से जूझ रहे बच्चों की देखभाल का खर्च लंबे समय तक चलता है. ऐसे में उन्हें सिर्फ इलाज ही नहीं, बल्कि दवाओं, मेडिकल उपकरणों, फिजियोथेरेपी, नर्सिंग और रोजमर्रा की देखभाल के लिए भी लगातार सरकारी मदद की जरूरत है. परिवार चाहते हैं कि सरकार ऐसी स्थायी व्यवस्था बनाए, ताकि इस बीमारी से जूझ रहे बच्चों की देखभाल का पूरा बोझ उनके परिवारों पर न रहे.

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Subacute Sclerosing Panencephalitis, SSPE
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