‘वेस्ट टू वेल्थ', आत्मनिर्भर भारत और हरित ऊर्जा के राष्ट्रीय विजन को साकार करते हुए गुजरात का ‘बनास BIOCNG' मॉडल एक प्रभावशाली उदाहरण बनकर उभरा है. मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल के नेतृत्व में विकसित इस पहल ने पारंपरिक अपशिष्ट खासतौर पर गोबर को स्वच्छ ईंधन और जैविक उर्वरक में बदलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है. केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय और सहकारिता विभाग के सहयोग से अब देश के करीब 15 राज्य इस मॉडल को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.
गुजरात सरकार ने BIOCNG परियोजनाओं की क्षमता को देखते हुए इसे अपनी बजटीय प्राथमिकताओं में शामिल किया है. राज्य बजट में ₹60 करोड़ का विशेष प्रावधान किया गया है, जिसका उद्देश्य सहकारी दुग्ध संघों के माध्यम से नए BIOCNG प्लांट स्थापित करना है. इस पहल का लक्ष्य डेयरी सेक्टर को केवल दूध उत्पादन तक सीमित न रखकर स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन का प्रमुख केंद्र बनाना है. सरकार चरणबद्ध तरीके से राज्य में लगभग 10 नए BIOCNG प्लांट स्थापित करने की योजना पर काम कर रही है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा.
बनास BIOCNG मॉडल: किसान, उद्योग और पर्यावरण के लिए ‘विनविन'
बनासकांठा जिले में स्थापित BIOCNG प्लांट इस मॉडल की सफलता का प्रमाण है. यह संयंत्र पिछले छह वर्षों से सुचारु रूप से संचालित हो रहा है और प्रतिदिन 40 मीट्रिक टन गोबर के प्रसंस्करण की क्षमता रखता है. इस सफलता को देखते हुए अब क्षेत्र में पांच नए बड़े BIOCNG प्लांट विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें से दो ने काम शुरू कर दिया है और एक अपने अंतिम चरण में है. प्रत्येक संयंत्र प्रतिदिन लगभग 100 मीट्रिक टन गोबर को प्रोसेस करता है. करीब ₹5055 करोड़ की लागत से तैयार ये प्लांट आधुनिक तकनीक और टिकाऊ इन्फ्रास्ट्रक्चर का उदाहरण हैं, जो पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास को साथसाथ आगे बढ़ाते हैं.
पशुपालक किसानों के लिए अतिरिक्त आय का मजबूत स्रोत
इस परियोजना का सबसे बड़ा लाभ ग्रामीण पशुपालक किसानों को मिल रहा है. BIOCNG प्लांट के आसपास के 2025 गांवों के करीब 400450 परिवार नियमित रूप से गोबर की आपूर्ति कर रहे हैं. किसानों को गोबर के बदले ₹1 प्रति किलोग्राम का भुगतान किया जाता है, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय का स्थायी स्रोत मिला है. गोबर के संग्रह और परिवहन के लिए ट्रैक्टरट्रॉली का उपयोग किया जा रहा है, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिली है.
बहुउत्पाद आधारित मॉडल से मजबूत राजस्व
यह BIOCNG संयंत्र केवल गैस उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि बहुउत्पाद आधारित आर्थिक मॉडल पर काम करता है.
- प्रतिदिन लगभग 1,800 किलोग्राम कंप्रेस्ड बायोगैस (CNG) का उत्पादन
- लगभग 25 मीट्रिक टन ठोस जैविक उर्वरक
- करीब 75 मीट्रिक टन तरल जैविक उर्वरक
इन उत्पादों की बाजार में बिक्री से प्रतिदिन करीब ₹3 लाख से अधिक का राजस्व उत्पन्न होता है, जो सालाना लगभग ₹12 करोड़ तक पहुंच सकता है. यह मॉडल ग्रामीण उद्योगों के लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य और टिकाऊ समाधान प्रस्तुत करता है.
‘ग्रीन गुजरात' के संकल्प को मिल रही मजबूती
बनास BIOCNG मॉडल पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है. यह परियोजना हर साल लगभग 6,750 टन कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की क्षमता रखती है. स्वच्छ ईंधन उत्पादन, रसायनमुक्त जैविक उर्वरकों की उपलब्धता और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन का यह समन्वय जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में एक ठोस कदम है. ‘ग्रीन बनासकांठा' से शुरू हुआ यह मॉडल अब पूरे राज्य में ‘ग्रीन गुजरात' के लक्ष्य को साकार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है.
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गुजरात का ‘बनास BIOCNG' मॉडल यह साबित करता है कि सही नीति, तकनीक और सामुदायिक भागीदारी के साथ कचरे को संसाधन में बदला जा सकता है. यह पहल न केवल ऊर्जा उत्पादन का नया विकल्प प्रस्तुत करती है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने, रोजगार सृजन और पर्यावरण संरक्षण के जरिए समग्र ग्रामीण विकास का मार्ग भी प्रशस्त करती है.
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