एक दिन घर पर कुछ खास खाने का मन हुआ. बाहर से खाना मंगाने के बजाय मैंने सोचा कि क्यों न खुद ही दाल मखनी बनाई जाए. मैंने साबुत उड़द की दाल, साबुत मसूर की दाल और थोड़े से राजमा को रातभर पानी में भिगो दिया. अगले दिन दाल को अच्छी तरह धोकर कुकर में पकने के लिए रख दिया.
इसके बाद बारी आई मसाला तैयार करने की. मैंने टमाटर, अदरक, लहसुन और कुछ मसालों की मदद से तड़का तैयार किया. रसोई में फैलती खुशबू से लगने लगा था कि आज तो खाना बिल्कुल रेस्टोरेंट जैसा बनने वाला है. दाल पकने के बाद मैंने उसे तड़के में मिलाया और कुछ देर तक पकने दिया. आखिर में बटर और थोड़ी क्रीम भी डाल दी. देखने में दाल मखनी अच्छी लग रही थी, लेकिन पहली बार चखते ही महसूस हुआ कि स्वाद में कुछ तो कमी है, जो रेस्टोरेंट की दाल से नहीं मिल रहा है.
कहां और क्या की थी मैने गलती-
दाल थोड़ी पतली थी और मसालों का स्वाद भी अलग-अलग महसूस हो रहा था. मुझे लगा कि शायद कुछ कमी रह गई है. लेकिन दोबारा सोचने पर समझ आया कि मैंने जल्दबाजी कर दी थी. दाल को धीमी आंच पर पर्याप्त समय तक पकने ही नहीं दिया था.

जब मैने दूसरी बार बनाया तो इन बातों का रखा ध्यान-
पहली बार दाल में कमी होने के बाद जब मैंने दो दिन बाद फिर से दाल बनाई तो उसे अच्छी तरह गलाया और मसाले मिलाने के बाद धीमी आंच पर ज्यादा देर तक पकने दिया. बीच-बीच में चलाती रही, ताकि दाल बर्तन के तले में न लगे. मैंने यह भी ध्यान रखा कि बटर और क्रीम का इस्तेमाल बैलेंस मात्रा में हो. आखिर में कसूरी मेथी डालने से खुशबू और स्वाद दोनों बेहतर लगे. इस बार दाल पहले से ज्यादा गाढ़ी और स्वादिष्ट बनी. हालांकि, रेस्टोरेंट जैसा स्वाद हर बार बिल्कुल एक जैसा आए, यह जरूरी नहीं है, लेकिन पिछली बार के मुकाबले दाल काफी स्वादिष्ट बनी थी.
इससे क्या सीखा मैंने-
पहली बार दाल मखनी बनाते हुए मुझे एहसास हुआ कि अच्छी डिश बनाने के लिए सिर्फ रेसिपी पढ़ लेना काफी नहीं है. सामग्री का सही चुनाव, पकाने का समय और धीमी आंच पर दाल को अच्छी तरह पकाना भी उतना ही जरूरी है.
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