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Omkareshwar Jyotirlinga: पृथ्वी का चौथा ज्योतिर्लिंग, जहां माता पार्वती संग महादेव खेलते हैं चौसर

Omkareshwar Jyotirlinga Ki Katha: सनातन परंपरा में शिव 12 पावन धाम यानि द्वादश ज्योतिर्लिंग में ओंकारेश्वर का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. पृथ्वी के चौथे ज्योतिर्लिंग के बारे में मान्यता है कि यहां आज भी महादेव रात्रि में सोने के लिए आते हैं. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की रहस्मयी कथा और इसकी पूजा का धार्मिक महत्व जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख. 

Omkareshwar Jyotirlinga: पृथ्वी का चौथा ज्योतिर्लिंग, जहां माता पार्वती संग महादेव खेलते हैं चौसर
Omkareshwar Jyotirlinga: ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी
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Omkareshwar Temple History: हिंदू मान्यता के अनुसार पृथ्वी पर जिन-जिन स्थानों पर महादेव ने प्रकट होकर अपने भक्तों पर कृपा बरसाई आज वे सभी पावन ज्योतिर्लिंग के नाम से जाने जाते हैं. औढरदानी कहलाने वाले भगवान शिव चौथा ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश इंदौर शहर से 80 किमी दूर नर्मदा नदी के तट पर स्थित है. यहां शिव शक्ति संग ॐ (ओम) के आकार वाली पहाड़ी पर विराजमान हैं, इसीलिए इन्हें ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जता है. आइए महादेव के इस पावन धाम की कथा और धार्मिक महत्व आदि के बारे में विस्तार से जानते हैं. 

ओंकारेश्वर-ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा

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Photo Credit: Facebook@Shri Omkareshwar Jyotirling

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्राकट्य को लेकर दो कथाएं कही जाती हैं. जिनमें से एक कथा राजा मंधाता से जुड़ी हुई है. मान्यता है कि एक बार राजा मंधाता ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तप किया. जिससे प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने उन्हें दर्शन देकर दो वर मांगने कहा. तब शिव भक्त राजा मंधाता ने उनसे सबसे पहले वरदान मांगा कि आप वहीं विराजमान हो जाएं और दूसरा भगवान शिव के नाम के साथ उनका नाम जुड़ जाए. तब महादेव ने उन्हें ये दोनों वर देते हुए वहीं विराजमान हो गये. मान्यता है कि तभी से जिस जगह पर ज्योतिर्लिंग स्थापित है, उसे मंधाता पर्वत के नाम से जाना जाता है. 

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तब महादेव ने ज्योतिर्लिंग को दो भागों में बांट दिया 

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ओंकारेश्वर से जुड़ी दूसरी कथा के अनुसार एक बार विंध्याचल पर्वत ने खुद को सबसे ऊँचा और महान होने के लिए भगवान शिव का तप प्रारंभ किया, क्योंकि उस समय सुमेरु पर्वत सबसे ऊँचा और बड़ा माना जाता था. मान्यता है कि विंध्याचल के कठिन तप से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे वरदान दिया कि वह अपनी मर्जी से बढ़ सके, लेकिन साथ ही उसे अपनी शक्ति का दुरुपयोग न करने की शर्त भी रखी. 

मान्यता है कि उसी समय वहां मौजूद ऋषि-मुनियों के अनुरोध पर महादेव ने ओंकारेश्वर नामक लिंग को दो भाग में बांट दिया. जिसमें से एक ओंकारेश्वर और दूसरा ममलेश्वर कहलाया. दो अलग-अलग लिंग होने के बावजूद दोनों की सत्ता और स्वरूप एक ही माना गया है. इसमें से एक लिंग 'ओंकारेश्वर' यानि (विंध्याचल पर्वत पर) और दूसरा 'ममलेश्वर' या फिर कहें 'अमलेश्वर' (नर्मदा के दूसरे तट पर) स्थित है. 

महादेव माता पार्वती संग खेलते हैं चौसर 

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हिंदू मान्यता है कि इस पावन ज्योतिर्लिंग में महादेव माता पार्वती के साथ रात्रि को शयन के लिए आते हैं और हर रोज यहां पर उनके साथ चौसर खेलते हैं. यही कारण है ​यहां की शयन आरती का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. महादेव से जुड़ी इस मान्यता को देखते हुए मंदिर के गर्भगृह को बंद करने से पहले यहां पर चौसर सजाकर रख दी जाती है. मान्यता है कि अगले दिन चौसर बिखरी हुई मिलती है. 

श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा का महत्व 

पुराणों में महादेव श्री ओंकारेश्वर और श्री ममलेश्वर के दर्शन और पूजन का बहुत ज्यादा पुण्यफल बताया गया है. मान्यता है कि इस पावन ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से सारे दुख और दोष दूर हो जाते हैं. जिस टापू या फिर कहें इस द्वीप यह ज्योतिर्लिंग है, वह 'ॐ' के आकार सा प्रतीत होता है, जिसके कारण भक्तों की आस्था इस शिव धाम के प्रति और बढ़ जाती है. 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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