जब जिद पे आ गई पार्वती भजन माता पार्वती और भगवान शिव के विवाह से जुड़ी कथा को बेहद सरल और भक्तिमय अंदाज में सामने रखता है. भजन में बताया गया है कि माता पार्वती भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या करती हैं. उनकी तपस्या देखकर सप्तऋषि उन्हें समझाने पहुंचते हैं और शिवजी के रहन-सहन तथा स्वरूप का वर्णन करते हुए उनसे अपना निर्णय बदलने को कहते हैं. हालांकि, माता पार्वती अपने संकल्प पर अडिग रहती हैं.
शिवजी को लेकर सप्तऋषियों ने क्या कहा?
भजन की पंक्तियों में सप्तऋषि माता पार्वती को समझाते हुए कहते हैं कि जिन शिवजी को वह पति के रूप में पाना चाहती हैं, उनके सिर पर गंगा विराजमान हैं और गले में सांप लिपटा रहता है. वह सामान्य राजसी जीवन जीने के बजाय एक तपस्वी की तरह रहते हैं. इसी वजह से ऋषि माता पार्वती को उनके बारे में सोचने की सलाह देते हैं.
भोलेनाथ के रहन-सहन का किया वर्णन
भजन में भगवान शिव के साधु स्वरूप का भी सुंदर वर्णन मिलता है. इसमें उनके साधारण जीवन, जटाओं, शरीर पर भस्म और गले में सर्प का उल्लेख किया गया है. सप्तऋषि यह भी बताते हैं कि शिवजी सांसारिक सुख-सुविधाओं से दूर रहने वााले हैं और उनका जीवन तप तथा साधना में बीतताा है.
ओम शंभू, शिव शंभू, भोलेनाथ।
जब जिद पे आ गई पार्वती,
पार्वती, पार्वती।
समझाने पहुंचे सप्तऋषि
सप्तऋषि, सप्तऋषि।
काय जिद कर-रही
काय को हुमर-रही,
काय जिद कर-रही
काय को हुमर-रही,
ऐसे वर के लाने,
ऐसे वर के लाने।
जाके सीस पे गंगा और गले में
डाले फिर रहे सांप,
जाके सीस पे गंगा और गले में
डाले फिर रहे सांप।
इतने सीधे-सादे हैं सब कहते
भोलेनाथ, भोलेनाथ
सब कहते, भोलेनाथ।
जाके सीस पे गंगा और गले में
डाले फिर रहे सांप,
जाके सीस पे गंगा और गले में
डाले फिर रहे सांप।
इतने सीधे-सादे हैं सब कहते
भोलेनाथ, भोलेनाथ।
ना खपरा ना छपरा
ना फूस की धरे मड़ैया,
का खावे को धरो वहां
बस रोवत रहत लड़ैया।
ना खपरा ना छपरा
ना फूस की धरे मड़ैया,
का खावे को धरो वहा
बस रोवत रहत लड़ैया।
भेष धरे अवधूत फिरे
अब तुमसे का का कहे बिन्नूं,
डोरा डांगर ले घूमे
वे बिनकें कछुऐनैयां
वे बिनकें कछुऐनैयां।
काय जिद कर-रही
काय को हुमर-रही,
काय जिद कर-रही
काय को हुमर-रही,
ऐसे वर के लाने
ऐसे वर के लाने।
जाके सीस पे गंगा और गले में
डाले फिर रहे सांप,
जाके सीस पे गंगा और गले में
डाले फिर रहे सांप।
इतने सीधे-सादे हैं सब कहते
भोलेनाथ, भोलेनाथ
सब कहते, भोलेनाथ।
जाके सीस पे गंगा और गले में
डाले फिर रहे सांप,
जाके सीस पे गंगा और गले में
डाले फिर रहे सांप।
इतने सीधे-सादे हैं सब कहते
भोलेनाथ, भोलेनाथ।
शंभू, शिव शंभू भोलेनाथ।
जटा लटा ना कबहूं संबारे
दीसत महा भयंकर,
मुड़ें पे आधी चंदा और
बेला पे घूमत शंकर।
जटा लटा ना कबहूं संबारे
दीसत महा भयंकर,
मुड़ें पे आधी चंदा और
बेला पे घूमत शंकर।
राम नाम के रसिया हैं वे
और उन्हें क्या चाहने,
कामदेव के मर्दनहारी
घर-गुहस्थी क्या जानें,
वे घर-गुहस्थी क्या जानें।
काय जिद कर-रही
काय को हुमर-रही,
काय जिद कर-रही
काय को हुमर-रही,
ऐसे वर के लाने
ऐसे वर के लाने।
जाके सीस पे गंगा और गले में
डाले फिर रहे सांप,
जाके सीस पे गंगा और गले में
डाले फिर रहे सांप।
इतने सीधे-सादे हैं सब कहते
भोलेनाथ, भोलेनाथ
सब कहते, भोलेनाथ।
जाके सीस पे गंगा और गले में
डाले फिर रहे सांप,
जाके सीस पे गंगा और गले में
डाले फिर रहे सांप।
इतने सीधे-सादे हैं सब कहते
भोलेनाथ, भोलेनाथ।
भोले बमभोले, भोले बमभोले।
भोले बमभोले, भोले बमभोले।
भोले बमभोले, भोले बमभोले।
ये भी पढ़ें- Aaj Ka Rashifal: मेष से मीन तक कई राशि को मिलेगा लाभ, जानिए आज का राशिफल
पार्वती अपने संकल्प पर रहीं अडिग
धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी. भजन इसी प्रसंग को भावनात्मक रूप से प्रस्तुत करता है. सप्तऋषियों की बातों के बावजूद माता पार्वती अपने निर्णय से पीछे नहीं हटतीं. उनकाा यह अटूट संकल्प भक्ति और समर्पण का प्रतीक मानाा जाता है.
भजन में मिलता है शिव-पार्वती के प्रेम का संदेश
धर्माचार्यों के अनुसार, शिव-पार्वती की कथा में केवल विवाह का प्रसंग ही नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और साधना का भाव भी जुड़ा है. 'जब जिद पे आ गई पार्वती' भजन इसी भाावना को लोकभाषा और सरल शब्दों में साामने लाता है. यही वजह है कि यह भजन शिव-पार्वती भक्तों के बीच लोकप्रिय है.
ये भी पढ़ें- 28 सितंबर का पंचांग: पूर्वजों का तर्पण और पिंडदान का दूसरा दिन, जानें अभिजीत मुहूर्त और राहुकाल का समय
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं