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Sant Ki Seekh: व्यवसाय करूं या आश्रम चला जाऊं? आखिर क्या है इस समस्या का समाधान? 

Ashram life vs professional life: व्यक्ति के जीवन में कई बार ऐसा समय आता है, जब वह विचार करता है कि वह अपने सभी कामकाज से सन्यास लेकर किसी आश्रम में चला जाए, लेकिन क्या किसी भी समस्या का यही अंतिम समाधान है, इस सवाल का सही जवाब विस्तार से बता रहे हैं जाने-माने आध्यात्मिक गुरु, योगी, लेखक और विचारक सद्गुरु.

Sant Ki Seekh: व्यवसाय करूं या आश्रम चला जाऊं? आखिर क्या है इस समस्या का समाधान? 
Life Management: क्या सब कुछ छोड़कर सन्यास लेना ही समस्याओं का अंतिम समाधान होता है?
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How to deal with life problems: यदि आप हजारों लोगों के मन को संभालना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको अपने मन को संभालना आना चाहिए. यदि आपका अपना मन ही आपके नियंत्रण में नहीं है, तो बाकी सब बस संयोग बनकर रह जाएगा. और संयोग से मिली सफलता बहुत तनावपूर्ण होती है. शायद यही वजह है कि कई लोग सोचते हैं, "व्यवसाय करूं या सबकुछ छोड़कर आश्रम चला जाऊं?" आप किसी आश्रम में रहने की समस्याओं को नहीं जानते. 

आश्रम में चले जाना आसान चुनाव नहीं

यदि आप अपने परिवार या अपने कार्यस्थल पर, जहां गिने-चुने लोगों के साथ रहना होता है, सहज नहीं रह सकते, तो 3 हजार से 4 हजार लोगों के साथ रहना बिलकुल अलग बात होगी. एक ही स्थान पर चार हजार लोगों के साथ रहने के लिए परिपक्वता के बिल्कुल अलग स्तर की आवश्यकता होती है. यह कोई आसान चुनाव नहीं है - यह एक क्रांतिकारी चुनाव है जो आप कर रहे हैं. तो यह पीछे हटना नहीं है, बल्कि आगे बढ़ना है. 

तब जीवन के मायने बदल जाएंगे

इस सन्दर्भ में मत सोचिए कि आपको क्या करना चाहिए. आप जहाँ भी जाएँगे, आपको कुछ न कुछ गतिविधि करनी होगी. आपको वही करना चाहिए जिसमें आप माहिर हैं. आपको अपने जीवन के अवयवों को बदलने की ज़रूरत नहीं है; आपको सिर्फ जीवन का सन्दर्भ बदलना है. अगर आप ज़िंदगी का सन्दर्भ बदलते हैं, तो सब कुछ बदल जाता है. इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि आप क्या कर रहे हैं, किसी न किसी तरह वह किसी के लिए उपयोगी है. बस बात यह है कि आप उसका आनंद नहीं ले रहे हैं. 

फिर नहीं होगा आपको तनाव 

जब आप रोज़ ऑफ़िस जाते समय इस बात के प्रति सचेतन हैं कि आपके काम से कितने लोगों को फ़ायदा मिल रहा है, तो चौबीस घंटे काम करने पर भी आप तनाव से नहीं मरेंगे. हो सकता है कि आप थकान से मरें, लेकिन तनाव से नहीं. और यह एक ऐसी चीज़ है जिसका हर कोई हक़दार है.

Sant Ki Seekh: आध्यात्मिकता और भौतिकवाद एक ही सिक्के के दो पक्ष हैं

जब आप अपनी मर्ज़ी का काम कर रहे हों, और वही काम आपकी जान ले ले, तो उसका क्या तुक है? उद्यमी होने का मतलब है कि आप वही काम कर रहे हैं जो आप करना चाहते हैं. उसे आपकी जान नहीं लेनी चाहिए.

भारत के पचास सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तियों में गिने जाने वाले सद्गुरु एक योगी, रहस्यवादी, दूरदर्शी और 'न्यूयार्क टाइम्स' के बेस्टसेलिंग लेखक हैं. असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए भारत सरकार द्वारा उन्हें वर्ष 2017 में 'पद्म विभूषण' से अलंकृत किया गया था, जो कि सर्वोच्च वार्षिक नागरिक पुरस्कार है. वह विश्व के सबसे बड़े जन-अभियान, 'कॉन्शियस प्लैनेट – मिट्टी बचाओ' (Conscious Planet – Save Soil) के संस्थापक भी हैं, जिसने 4 अरब से अधिक लोगों के जीवन को स्पर्श किया है. 

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