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Ekadashi ki Katha: पापमोचनी एकादशी के दिन जरूर पढ़ें ये कथा, तभी पूरा माना जाता है व्रत

Ekadashi ki Katha: कहा जाता है कि यदि पापमोचनी एकादशी की कथा का श्रवण न किया जाए, तो व्रत अधूरा माना जाता है. यही कारण है कि भक्त पूजा के बाद इस कथा को अवश्य सुनते या पढ़ते हैं.

Ekadashi ki Katha: पापमोचनी एकादशी के दिन जरूर पढ़ें ये कथा, तभी पूरा माना जाता है व्रत
Ekadashi ki Katha: यहां पढ़ें पापमोचनी एकादशी की व्रत कथा

Ekadashi ki Katha: हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की पूजा के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. साल भर में आने वाली हर एकादशी का अपना अलग महत्व होता है. चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी कहा जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र कृष्ण एकादशी तिथि 14 मार्च की सुबह 8 बजकर 10 मिनट से शुरू होकर 15 मार्च की सुबह 9 बजकर 16 मिनट तक रहेगी. उदया तिथि के नियम के अनुसार इस बार पापमोचनी एकादशी का व्रत 15 मार्च, रविवार के दिन रखा जाएगा. मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियम से व्रत रखने से व्यक्ति के जाने-अनजाने में हुए पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति आती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत में पूजा-पाठ के साथ कथा सुनना या पढ़ना भी उतना ही जरूरी माना गया है. कहा जाता है कि यदि पापमोचनी एकादशी की कथा का श्रवण न किया जाए, तो व्रत अधूरा माना जाता है. यही कारण है कि भक्त पूजा के बाद इस कथा को अवश्य सुनते या पढ़ते हैं.

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यहां पढ़ें पापमोचनी एकादशी की व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने पापमोचनी एकादशी की कथा अर्जुन को सुनाई थी. यह कथा तपस्वी मेधावी ऋषि की है. प्राचीन समय में चैत्ररथ नाम का एक सुंदर वन था. उस वन में हमेशा वसंत ऋतु का आनंद रहता था और तरह-तरह के फूल खिले रहते थे. उसी वन में मेधावी नाम के एक ऋषि तपस्या किया करते थे. वे भगवान शिव के परम भक्त थे और गहरी साधना में लगे रहते थे. एक दिन गंधर्वों के राजा चित्ररथ अपनी अप्सराओं के साथ वहां आए. 

उन अप्सराओं में मंजुघोषा नाम की एक अप्सरा की नजर मेधावी ऋषि पर पड़ी. मंजुघोषा ने अपनी सुंदरता और मधुर संगीत से ऋषि को आकर्षित करने का निश्चय किया. वह कुछ दूरी पर बैठकर वीणा बजाने लगी और मधुर गीत गाने लगी. उसी समय कामदेव ने भी उसे ऋषि को मोहित करने में सहायता की. धीरे-धीरे मंजुघोषा के संगीत और रूप को देखकर ऋषि मेधावी का मन विचलित हो गया. वे अपनी तपस्या भूल गए और उसके साथ रहने लगे. समय बीतता गया और उन्हें इसका एहसास भी नहीं हुआ.

काफी समय बाद जब मंजुघोषा ने स्वर्ग लौटने की अनुमति मांगी, तब ऋषि को पता चला कि 57 वर्ष बीत चुके हैं. यह जानकर उन्हें बहुत क्रोध आया. उन्होंने गुस्से में आकर मंजुघोषा को श्राप दे दिया कि वह पिशाचिनी बन जाएगी. श्राप सुनकर मंजुघोषा बहुत दुखी हो गई और ऋषि से क्षमा मांगने लगी. उसने विनती की कि उसे इस श्राप से मुक्त होने का कोई उपाय बताएं. तब ऋषि मेधावी का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कहा कि यदि वह चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत रखेगी तो उसे इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी.

इसके बाद ऋषि मेधावी भी अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गए और अपने पाप का प्रायश्चित पूछा. उनके पिता ने भी उन्हें पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी. दोनों ने श्रद्धा और नियम के साथ इस एकादशी का व्रत किया. व्रत के प्रभाव से मंजुघोषा को पिशाचिनी योनि से मुक्ति मिल गई और वह फिर से अपने सुंदर रूप में स्वर्ग चली गई. वहीं ऋषि मेधावी के पाप भी नष्ट हो गए.

धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से यह व्रत करता है और इसकी कथा सुनता है, उसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के कष्ट दूर होने लगते हैं.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
 

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