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दिल्ली में पुलिसकर्मियों को ब्लैकमेल करती थी राजू मीणा की गैंग, 3000 पन्नों की चार्जशीट ने खोले कई राज

दिल्ली पुलिस ने पुलिसवालों को ब्लैकमेल कर करोड़ों वसूलने वाले राजू मीणा गैंग पर मकोका के तहत 3000 पन्नों की चार्जशीट की दाखिल. जानें गिरोह की कार्यप्रणाली और 10 करोड़ की अवैध संपत्ति का पूरा सच.

दिल्ली में पुलिसकर्मियों को ब्लैकमेल करती थी राजू मीणा की गैंग, 3000 पन्नों की चार्जशीट ने खोले कई राज

दिल्ली में कानून के रखवालों को ही निशाना बनाकर करोड़ों रुपये की उगाही करने वाले एक संगठित आपराधिक गिरोह के खिलाफ दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की एंटी रॉबरी एंड स्नैचिंग सेल ने  3000 से अधिक पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है, जिसमें गिरोह के काम करने के तरीके, उसकी अवैध कमाई, संपत्तियों, बैंक खातों, सहयोगियों और पीड़ितों से जुड़ी कई अहम जानकारियां शामिल हैं.

क्राइम ब्रांच के डीसीपी संजीव यादव के मुताबिक  यह गिरोह केवल उगाही ही नहीं करता था, बल्कि बेहद सुनियोजित तरीके से सरकारी अधिकारियों और खासतौर पर ट्रैफिक पुलिसकर्मियों को अपने जाल में फंसाकर उनसे लाखों रुपये वसूलता था. जांच में सामने आया है कि गिरोह का नेटवर्क कई वर्षों से सक्रिय था और लगातार अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा था.

पूरे सिंडिकेट का मास्टरमाइंड कौन?

द‍िल्‍ली पुलिस जांच के मुताबिक इस पूरे सिंडिकेट का सरगना राजकुमार उर्फ राजू मीणा है. राजू मीणा लंबे समय से आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहा है और साल 2015 से उसके खिलाफ कई मामलों की जानकारी सामने आई है. पुलिस का दावा है कि उसने अपने आसपास ऐसे लोगों का एक नेटवर्क तैयार किया था जो अलग-अलग भूमिकाओं में काम करते थे.

कोई लोगों की रेकी करता था, कोई वीडियो रिकॉर्डिंग करता था, कोई शिकायतें तैयार करता था तो कोई वसूली की रकम इकट्ठा करने का काम संभालता था. इस तरह पूरा गिरोह एक संगठित अपराध सिंडिकेट की तरह काम करता था. मकोका के तहत दर्ज इस मामले में अब तक कुल पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें राजकुमार उर्फ राजू मीणा, मुकेश कुमार उर्फ पकौड़ी, संजय गुप्ता, जीशान अली और सुरेखा रानी शामिल हैं.

कैसे फंसाए जाते थे ट्रैफिक पुलिसकर्मी?

जांच में सामने आया है कि गिरोह विशेष रूप से ड्यूटी पर तैनात ट्रैफिक पुलिसकर्मियों को निशाना बनाता था. आरोपियों द्वारा पहले पुलिसकर्मियों के संपर्क में आने की कोशिश की जाती थी. कई मामलों में उन्हें छोटी रकम लेने या किसी तरह के समझौते के लिए उकसाया जाता था.

इसके बाद छिपे हुए कैमरों, मोबाइल फोन और अन्य उपकरणों की मदद से पूरी घटना रिकॉर्ड कर ली जाती थी. रिकॉर्डिंग के बाद वीडियो को एडिट किया जाता था और उसे इस तरह पेश किया जाता था मानो संबंधित पुलिसकर्मी भ्रष्टाचार या गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल हो. इसके बाद शुरू होता था ब्लैकमेलिंग का खेल.

द‍िल्‍ली पुलिसकर्मियों को फोन कर बताया जाता था कि उनके खिलाफ वीडियो मौजूद हैं. उन्हें धमकी दी जाती थी कि वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिए जाएंगे. विभागीय जांच बैठ जाएगी. विजिलेंस कार्रवाई होगी या उनके खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करा दी जाएगी. इन धमकियों से बचने के लिए कई पीड़ितों से मोटी रकम वसूली जाती थी.

सरकारी अधिकारी भी थे निशाने पर

द‍िल्‍ली पुल‍िस की क्राइम ब्रांच की जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह का निशाना केवल ट्रैफिक पुलिसकर्मी नहीं थे. अन्य सरकारी विभागों के कर्मचारी और अधिकारी भी इस गिरोह की ब्लैकमेलिंग और उगाही का शिकार बने. गिरोह लोगों की कमजोरियों का फायदा उठाता था और फिर उनके खिलाफ झूठी शिकायतें, वीडियो और अन्य सामग्री का इस्तेमाल कर आर्थिक लाभ हासिल करता था. पुलिस का कहना है कि यह गतिविधियां कोई एक-दो घटनाएं नहीं थीं, बल्कि एक सुनियोजित आपराधिक कारोबार का हिस्सा थीं.

सेटलमेंट के नाम पर होती थी लाखों की वसूली

जांच में सामने आया है कि आरोपी अपने शिकार को डराने के बाद मामले को सेटल करने का प्रस्ताव देते थे. पीड़ितों को बताया जाता था कि यदि वे निश्चित रकम दे दें तो वीडियो सार्वजनिक नहीं किए जाएंगे और शिकायतें वापस ले ली जाएंगी.  यही तथाकथित सेटलमेंट इस गिरोह की कमाई का सबसे बड़ा जरिया था. क्राइम ब्रांच का मानना है कि इसी तरीके से गिरोह ने पिछले कई सालों के दौरान करोड़ों रुपये की उगाही की.

अवैध स्टिकर-मार्का नेटवर्क का भी खुलासा

मामले की जांच के दौरान पुलिस को एक और संगठित अवैध नेटवर्क की जानकारी मिली. आरोप है कि गिरोह के सदस्य व्यावसायिक वाहनों के चालकों और ट्रांसपोर्ट कारोबार से जुड़े लोगों से नियमित रूप से पैसे वसूलते थे.

इसके बदले उन्हें एक विशेष 'स्टिकर' या मार्का दिया जाता था. दावा किया जाता था कि इस स्टिकर की वजह से उन्हें विभिन्न प्रकार की कार्रवाई से बचाया जाएगा. पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है और इससे जुड़े अन्य लोगों की पहचान की जा रही है.

10 करोड़ से ज्यादा की संपत्तियां

क्राइम ब्रांच की वित्तीय जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं. जांचकर्ताओं ने बैंक खातों, संपत्तियों की खरीद-फरोख्त, आयकर रिकॉर्ड, निवेश और वित्तीय दस्तावेजों की बारीकी से जांच की. पुलिस के अनुसार आरोपियों और उनके परिवार से जुड़े लोगों के नाम पर 10 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की चल और अचल संपत्तियों का पता चला है.

इनमें मकान, दुकानें, प्लॉट, बैंक जमा राशि, वाहन और अन्य निवेश शामिल हैं. जांच अधिकारियों को आरोपियों की घोषित आय और उनके पास मौजूद संपत्तियों के बीच भारी अंतर मिला है. इसी वजह से पुलिस का मानना है कि ये संपत्तियां अपराध से अर्जित धन से बनाई गई हैं.

वकील पत्नी की भूमिका भी आई सामने

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण खुलासों में से एक गैंग सरगना राजू मीणा की पत्नी सुरेखा रानी की कथित भूमिका है. सुरेखा रानी पेशे से अधिवक्ता हैं और कड़कड़डूमा कोर्ट में प्रैक्टिस करती हैं. जांच के दौरान पुलिस को ऐसे दस्तावेज मिले जिनसे संकेत मिला कि अपराध से अर्जित कई संपत्तियां उनके नाम पर खरीदी गई थीं. पुलिस का आरोप है कि वह इन संपत्तियों की लाभार्थी होने के साथ-साथ उन्हें सुरक्षित रखने का काम भी कर रही थीं. इसी आधार पर उन्हें मकोका के तहत गिरफ्तार किया गया.

गवाहों और डिजिटल सबूतों से मजबूत हुआ मामला

इस मामले की जांच केवल आरोपों तक सीमित नहीं रही. पुलिस ने बड़ी संख्या में डिजिटल और तकनीकी साक्ष्य जुटाए हैं. मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, वीडियो रिकॉर्डिंग, बैंकिंग ट्रांजैक्शन, कॉल रिकॉर्ड, वित्तीय दस्तावेज और अन्य डिजिटल सामग्री को जांच का हिस्सा बनाया गया है. इसके अलावा कई पीड़ितों और गवाहों ने भी पुलिस को विस्तृत बयान दिए हैं. इन बयानों में गिरोह की कार्यप्रणाली, उगाही के तरीके और धमकियों का विस्तार से जिक्र किया गया है.

क्राइम ब्रांच का कहना है कि जांच अभी जारी है और यह संभावना है कि आने वाले दिनों में कुछ और लोगों की भूमिका भी सामने आ सकती है. अधिकारियों के अनुसार अपराध से अर्जित संपत्तियों का पता लगाने, धन के प्रवाह को ट्रैक करने और सिंडिकेट से जुड़े अन्य लोगों की पहचान करने का काम जारी है. जांच में सामने आने वाले नए तथ्यों और सबूतों के आधार पर अदालत में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की जाएगी.

दिल्ली पुलिस का मानना है कि इस चार्जशीट के दाखिल होने के साथ ही राजधानी में सक्रिय एक बड़े उगाही नेटवर्क पर बड़ा प्रहार किया गया है. पुलिस अधिकारियों के मुताबिक यह मामला इस बात का उदाहरण है कि किस तरह कुछ लोग कानून व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों को ही निशाना बनाकर संगठित अपराध का कारोबार चला रहे थे. अब पुलिस की कोशिश है कि इस पूरे नेटवर्क से जुड़े हर व्यक्ति की पहचान कर उसे कानून के कटघरे तक पहुंचाया जाए ताकि भविष्य में इस तरह के संगठित अपराधों पर पूरी तरह अंकुश लगाया जा सके. 

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