भारत में क्रिकेटरों की कोई कमी नहीं है. हर सीजन में घरेलू क्रिकेट से कई खिलाड़ी अपनी दावेदारी पेश करते हैं, लेकिन सभी को टीम इंडिया में जगह नहीं मिल पाती. पूर्व विकेटकीपर बल्लेबाज पार्थिव पटेल भी उन खिलाड़ियों में रहे, जिन्हें अपने करियर में कई बार टीम से अंदर-बाहर होना पड़ा. महज 17 साल की उम्र में भारत के लिए डेब्यू करने वाले पार्थिव का करियर आसान नहीं रहा. एमएस धोनी के टीम में आने के बाद उनके लिए मौके और कम हो गए. हालांकि उन्होंने घरेलू क्रिकेट में लगातार रन बनाए, लेकिन फिर भी चयनकर्ताओं का भरोसा जीतना उनके लिए मुश्किल साबित हुआ.
आकाश चोपड़ा के यूट्यूब चैनल पर बातचीत में पार्थिव ने उस दौर को याद किया जब वह रणजी और फर्स्ट क्लास क्रिकेट में लगातार रन बना रहे थे. उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा आया जब उन्हें लगा कि वह चयनकर्ताओं का ध्यान खींचने के लिए इससे ज्यादा और क्या कर सकते हैं.
पार्थिव के मुताबिक, उन्होंने फर्स्ट क्लास क्रिकेट में लगातार पांच पारियों में 500 रन बनाए थे, जो अपने आप में एक भारतीय रिकॉर्ड है. उन्होंने कहा कि सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली और सुनील गावस्कर जैसे बड़े बल्लेबाज भी ऐसा नहीं कर पाए हैं. इसके बावजूद उन्हें टीम इंडिया में जगह नहीं मिली.
उन्होंने बताया कि ऑस्ट्रेलिया दौरे से पहले उन्होंने तत्कालीन मुख्य चयनकर्ता दिलीप वेंगसरकर से बात की थी. वेंगसरकर ने उन्हें मेहनत जारी रखने की सलाह दी. लेकिन बाद में जब नई चयन समिति आई और उन्होंने एक अन्य चयनकर्ता से अपने भविष्य को लेकर बात की, तो उन्हें ऐसा जवाब मिला जिसकी उम्मीद नहीं थी.
पार्थिव ने कहा, "मुझसे कहा गया कि आपकी उम्र 27-28 साल हो चुकी है, आप गुजराती हैं, इसलिए सोचिए कि कोई बिजनेस कर सकते हैं या नहीं." इस टिप्पणी ने उन्हें झकझोर जरूर दिया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. पार्थिव ने उसी समय चयनकर्ता से कहा कि अगर टीम में नहीं चुनना है तो मत चुनिए, लेकिन किसी खिलाड़ी का मनोबल इस तरह नहीं तोड़ना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि अगले दो साल में वह वापसी करके दिखाएंगे.
बाद में पार्थिव की भारतीय टीम में वापसी हुई, लेकिन उन्हें नियमित मौके नहीं मिले. पूर्व विकेटकीपर ने यह भी साफ किया कि वह कभी एमएस धोनी के साथ टक्कर में नहीं थे. उनके मुताबिक, धोनी उस समय भारतीय क्रिकेट में एक अलग स्तर पर थे और टीम में पहला विकेटकीपर कौन होगा, इस पर कोई बहस नहीं होती थी. मुकाबला सिर्फ दूसरे विकेटकीपर की जगह के लिए था.
पार्थिव ने कहा कि उन्होंने हमेशा हर मैच को उसी गंभीरता से लिया, चाहे वह भारत के लिए खेल रहे हों या फिर घरेलू क्रिकेट. उनका मानना था कि अगर रणजी ट्रॉफी में पूरी तैयारी के साथ नहीं खेलेंगे तो अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में मौका मिलने पर खुद को साबित करना मुश्किल होगा. इसी सोच ने उन्हें लगातार मेहनत करने और वापसी के लिए प्रेरित किया.
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