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CWG 2026: स्वर्ण से चूके ऋषिकांत सिंह, मुसीबत आई, तो कोच से सलाह कर आखिरी पलों में बदली रणनीति

दिहाड़ी पिता के बेटे ऋषिकांत सिंह स्वर्ण पदक जीतने की कगार पर थे, लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें पूरी रणनीति बदलने पर मजबूर होना पड़ा

CWG 2026: स्वर्ण से चूके ऋषिकांत सिंह, मुसीबत आई, तो कोच से सलाह कर आखिरी पलों में बदली रणनीति
CWG 2026: रविवार को रजत पदक जीतने वाले ऋषिकांत सिंह
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ग्लासगो में खेले जा रहे कॉमवेल्थ खेलों के चौथे दिन रविवार को वेटलिफ्टर भारत के लिए पदक लेकर आए. जहां 48 किग्रा भार वर्ग में भारत के लिए महाकुंभ में स्वर्णिम शुरुआत की तो वहीं पुरुष वर्ग में उनसे पहले ऋषिकांत सिंह ने 60 किग्रा भार वर्ग में रजत पदक के रूप में दिन का पहला पदक दिलाया. वास्तव में ऋषिकांत स्वर्ण पदक जीत सकते थे, लेकिन घुटने की चोट ने उन्हें स्वर्ण से वंचित कर दिया. इसके बावजूद ऋषिकांत ने  मणिपुर के खेल इतिहास में नया अध्याय जरूर लिख दिया. ग्लास्गो पहुंचते समय ऋषिकांत पर उस राज्य की उम्मीदों का भार था, जिसने भारतीय भारोत्तोलन को कई दिग्गज खिलाड़ी दिए हैं, लेकिन राष्ट्रमंडल खेलों में पुरुष वर्ग में कभी कोई भारोत्तोलक नहीं उतारा था. स्नैच स्पर्धा में 121 किलोग्राम वजन उठाकर ऋषिकांत ने राष्ट्रमंडल खेलों का नया रिकॉर्ड बनाया और बढ़त हासिल कर ली. लेकिन प्रतियोगिता से एक सप्ताह पहले लगी घुटने की चोट क्लीन एवं जर्क के दौरान फिर उभर आई. इसका नतीजा यह रहा कि चोट के कारण अंततः उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा.

ऋषिकांत ने 'क्लीन' तो पूरा कर लिया, लेकिन बारबेल को सिर के ऊपर धकेलने के लिए जरूरी ताकत नहीं लगा सके.  उनके 148 किलोग्राम और 151 किलोग्राम के दो प्रयास असफल रहे. बहरहाल, आखिर में उन्होंने इस चरण में 143 किलोग्राम का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और कुल 264 किलोग्राम वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया. ऋषिकांत के लिए हालांकि इस पदक का महत्व उसके रंग से कहीं अधिक था. वह राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने वाले मणिपुर के पहले पुरुष भारोत्तोलक बने.

ऋषिकांत के पिता थे दिहाड़ी मजदूर

मणिपुर ने विशेष रूप से महिला वर्ग में भारत को कई विश्वस्तरीय भारोत्तोलक दिए हैं और राज्य की महिला खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार सफलता हासिल की है. ऋषिकांत की उपलब्धि ने अब मणिपुर के पुरुष भारोत्तोलन को भी नई पहचान दिलाई है. मणिपुर के एक साधारण परिवार में पले-बढ़े ऋषिकांत ने बचपन से ही आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया. उनके पिता दिहाड़ी मजदूर थे और खेलों में करियर बनाने के लिए उन्हें प्रशिक्षण के साथ-साथ जीवन की तमाम चुनौतियों से भी जूझना पड़ा.

शुरुआत में हाथ से कई मौके निकले

उन्होंने इम्फाल स्थित राष्ट्रीय खेल अकादमी में प्रशिक्षण लिया और बाद में भारतीय सेना का प्रतिनिधित्व करते हुए देश के प्रमुख प्रशिक्षण केंद्रों में अपनी प्रतिभा को निखारा. ऋषिकांत का सफर लगातार सफलताओं से भरा नहीं था. प्रतिभा के बावजूद उन्हें शुरुआत में कई निराशाओं और छूटे हुए अवसरों का सामना करना पड़ा. बाद में उन्होंने सीनियर स्तर पर निरंतर अच्छा प्रदर्शन किया और राष्ट्रमंडल भारोत्तोलन चैंपियनशिप में रिकॉर्डतोड़ प्रदर्शन के दम पर ग्लास्गो के लिए भारत के प्रमुख पदक दावेदारों में जगह बनाई.

'मैं यहां स्वर्ण पदक जीतने आया था'

सबसे बड़े मंच पर उनका सबसे कठिन प्रतिद्वंद्वी कोई अन्य खिलाड़ी नहीं, बल्कि उनका घायल घुटना साबित हुआ.  ऋषिकांत ने कहा, ‘मैं यहां स्वर्ण पदक जीतने आया था. स्नैच के बाद मैं पहले स्थान पर था, लेकिन घुटने में परेशानी हो गई. मैं वजन को क्लीन तो कर पाया, लेकिन उसे ऊपर नहीं धकेल सका क्योंकि एक जांघ ठीक से काम नहीं कर रही थी. मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की.' उन्होंने बताया कि सीमित मूवमेंट को देखते हुए उन्होंने और उनके कोच ने पहले पदक पक्का करने की रणनीति बनाई.

'आखिर में कोच से विमर्श कर बदल दी रणनीति'

उन्होंने कहा, ‘मैंने गुरुजी से कहा कि पहले एक सफल प्रयास करके पदक सुनिश्चित कर लेते हैं, फिर बड़ा वजन उठाने की कोशिश करेंगे. मैं पदक गंवाना नहीं चाहता था.' ग्लास्गो में भले ही स्वर्ण पदक हाथ से निकल गया, लेकिन ऋषिकांत ने इतिहास रच दिया. मणिपुर के लिए यह एक नई शुरुआत थी और ऋषिकांत के लिए इस बात का प्रमाण कि कठिन संघर्ष से शुरू हुआ सफर भी राष्ट्रमंडल खेलों के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के बीच सम्मानजनक स्थान तक पहुंच सकता है.
 

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