एक ओपिनियन पोल किसी को जीतता बता रहा है और दूसरा किसी और को, और हां, तीसरा कुछ और बता रहा है. यह फिर भी आश्चर्यजनक नहीं है. हैरत की बात तो यह है कि इन ओपिनियन पोलों में पहले और दूसरे नंबर पर आने वाली पार्टियों की अनुमानित सीटों की संख्या में ज़मीन-आसमान का अंतर है. इसे देखकर कोई भी कह सकता है कि कुछ ओपिनियन पोल ज़रूर किसी एक दल के चुनावी प्रचार करने का ज़रिया बन गए हैं. अगर यह माना जाए कि ओपिनियन पोल सांख्यिकीय विधि से मतदाताओं के रुख को भांपने का वैज्ञानिक तरीका हैं तो सवाल यह है कि एक ही वैज्ञानिक तरीके से किए जाने वाले सर्वेक्षणों में इतना अंतर कैसे हो सकता है. क्या बेहिचक यह दावा नहीं किया जा सकता कि या तो चुनावी सर्वेक्षण की विधि ही खोटी है या यह कवायद करने वाले कुछ लोगों की नीयत.
ऐसे सर्वेक्षणों का चक्कर है क्या...?
इस बारे में NDTVKhabar.com पर सवा साल पहले एक आलेख लिखा गया था. चुनावी सर्वेक्षण किस तरह चुनावी प्रचार का ज़रिया भी बन सकते हैं और इसके पीछे कौन-सी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया काम करती है, इसे भी बताया गया था. इस आधार पर बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आने से पहले ही अनुमान लगाया गया था - 'देखने लायक होंगी ओपिनियन पोल वालों की भाव-भंगिमाएं', और बिहार के नतीजों के बाद उनके चेहरे दिखाई तक नहीं दिए थे.
ओपिनियन पोलों पर एक अनुमान...
इतना तो साफ है कि उत्तर प्रदेश में मुकाबला चार-कोणीय होने की बजाय त्रिकोणीय हो गया है. यह सूरत अभी हाल ही में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन के कारण बनी है. बड़ी दिलचस्प बात है कि इस बारे में भी पिछले साल इसी स्तंभ में एक आलेख लिखा गया था. तब यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो रही थीं. खास बात यह हुई थी कि कांग्रेस ने प्रशांत किशोर को अपना चुनावी रणनीतिकार नियुक्त कर लिया था. उस समय की राजनीतिक परिस्थितियो का विश्लेषण करते हुए अनुमान लगाया गया था उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों में किसी एक सबसे बड़ी पार्टी की सीटों की संख्या सवा सौ सीटों के दायरे में रह सकती है. गौरतलब है कि तब समाजवादी पार्टी (एसपी) और कांग्रेस में गठबंधन की संभावना दूर-दूर तक नहीं थी. लिहाजा यूपी के चुनाव नतीजों को अगर उस पुराने अनुमान की कसौटी पर कसा जाए तो एसपी और कांग्रेस की सीटों को अलग-अलग करके ही देखा जाना चाहिए. महीने भर बाद जब यूपी के नतीजे आएंगे, तब इन ओपिनियन पोलों के अनुमानों और उस आलेख पर गौर किया जाना रोचक होगा.
कथित पूर्वानुमानों पर लीपापोती का भी मौका...
मतदान से पहले चुनाव सर्वेक्षणों के गोरखधंधे पर कई बार हो-हल्ला हो चुका है. कई बार इस पर नियंत्रण के उपाय करने की भी कोशिश हुई, लेकिन जिस तरह ये सर्वेक्षण अब भी प्रचारित किए जा रहे हैं, उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन सर्वेक्षणों के औचित्य-अनौचित्य पर सोच-विचार अब भी बाकी है. फिर भी रहस्य का अपना रोमांच तो होता ही है, सो, इस पर ज़्यादा क्या कहा जा सकता है. रही बात सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियों और उनके सर्वेक्षणों को धूम-धड़ाके से प्रचारित करने वाले मीडिया की साख की, तो उनके पास अपनी साख बचाने के कई उपाय हैं.
पहला उपाय एग्ज़िट पोल...
एग्ज़िट पोल, यानी वे सर्वेक्षण, जो मतदान करने के बाद बाहर निकल रहे मतदाताओं पर किया जाता है. यही एग्ज़िट पोल वह मौका है, जब ये सर्वेक्षण एजेंसियां भविष्य में अपनी साख बचाए रखने का इंतज़ाम कर लेने की कोशिश करती हैं. आमतौर पर देखा गया है कि जो भी सर्वेक्षण एजेंसी मतदान के दो-चार महीने पहले से किसी दल विशेष को जीतता हुई बता रही होती हैं, उसे एग्ज़िट पोल में उलट देती हैं. क्योंकि तब तक चुनाव प्रचार का काम निपट चुका होता है, यानी तब किसी दल को कोई नुकसान या फायदा नहीं हो सकता. यानी एग्ज़िट पोल इन सर्वेक्षण एजेंसियों को अपनी साख को गिरने से बचाने भर का उपक्रम होता है.
वोटों में बारीक अंतर का तर्क...
अपने पसंदीदा दल की सीटें अगर अनुमान से 50 फीसदी कम आएं, तो सर्वेक्षण एजेंसियों के पास एक रेडीमेड तर्क यह होता है कि दो-चार फीसदी वोट कम-ज़्यादा होने से सीटों पर 40 से 50 फीसदी सीटों का अंतर भी पड़ सकता है. यानी किसी दल की सीटे अनुमान से आधी भी रह सकती हैं या डेढ़ गुनी भी हो सकती हैं. क्या यह बात सर्वेक्षण में सीटों का अनुमान बताते समय ही बताई नहीं जानी चाहिए. वे भले छुपाते हों, लेकिन उनके दर्शकों या श्रोताओं को तो यह जानना चाहिए कि चुनावी सर्वेक्षण कितनी भी बारीकी से किए जाएं, उनमें दो-चार फीसदी वोटों का अंतर पड़ जाना मामूली बात है.
अगर ऐसा ही है तो कोई भी चुनावी भविष्यवाणी में 40 से 50 फीसदी सीटों तक की गलती हो जाने का जोखिम भी रहेगा. यह जोखिम तब और बढ़ जाता है, जब चुनाव में टक्कर त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय हो. इस तरह सिद्ध होता है कि चुनाव सर्वेक्षण अपनी संपूर्ण सतर्कता की स्थिति में भी अविश्वसनीय ही हैं. हालांकि ऐसे अनुमानों को तरह तरह से वैज्ञानिकता और सैम्पल के साइज़ का तर्क देकर विश्वसनीय दिखा दिया जाता है. इधर मीडिया को भी अपने रहस्य-रोमांचप्रिय ग्राहकों की प्रवृत्ति पता है. ऐसे में उनकी इस प्रवृत्ति का शोषण करना कितना आसान है.
सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्त्री हैं...
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This Article is From Jan 31, 2017
विधानसभा चुनाव 2017 : ओपिनियन या एग्ज़िट पोल पर ओपिनियन...
Sudhir Jain
- पोल ब्लॉग,
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Updated:फ़रवरी 07, 2017 14:12 pm IST
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Published On जनवरी 31, 2017 13:16 pm IST
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Last Updated On फ़रवरी 07, 2017 14:12 pm IST
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