दिल्ली की एक प्राइवेट कंपनी में जॉब कर रहे विनय इस बार छठ में अपने घर समस्तीपुर नहीं जा पा रहे हैं. बस 5 दिन की छुट्टी मांगी थी, लेकिन बॉस ने मना कर दिया. ऐसे में विनय याद करने लगे कि कभी बाबा ने कहा था कि दिल्ली बड़ी दूर बा बउवा, पास के शहर में ही नौकरी करते तो घर आना-जाना आसान रहता. विनय करते भी तो क्या करते. पटना वाली नौकरी से ज्यादा सैलरी की चाहत उन्हें दिल्ली खींच लाई. हालांकि पटना में कम सैलरी में भी जितनी बचत कर पाते थे, दिल्ली में ज्यादा सैलरी के बावजूद नहीं कर पाते. विनय जैसे सैकड़ों और भी होंगे, जिन्हें ये सालता होगा.
मुंबई, दिल्ली या बेंगलुरु में नौकरी मिलना कई युवाओं के लिए बेहतर करियर और जिंदगी का सपना होता है. फ्रेशर का ही उदाहरण लेते हैं. छोटे शहर में 3 लाख रुपये सालाना की नौकरी छोड़कर मेट्रो में 5 लाख रुपये का पैकेज आकर्षक लग सकता है, लेकिन किराया, खाना, आने-जाने और दूसरे खर्च जोड़ने के बाद क्या वाकई ज्यादा पैसे बचते हैं?
पहली नजर में बड़े शहर का विकल्प बेहतर दिखता है. मान लीजिए किसी युवा को मेट्रो शहर में सालाना 5 लाख रुपये का पैकेज मिलता है. उसकी ग्रॉस मंथली सैलरी करीब 41,600 रुपये होगी. वहीं, अपने टियर-2 शहर में उसे सालाना 3 लाख रुपये यानी हर महीने करीब 25,000 रुपये मिलते हैं.
दोनों नौकरियों के बीच हर महीने करीब 16,600 रुपये का अंतर है लेकिन ये अंतर पूरी तरह आपकी बचत नहीं है. बड़े शहर में रहने का खर्च इस अतिरिक्त कमाई का बड़ा हिस्सा खा सकता है.
ज्यादा सैलरी का बड़ा हिस्सा किराये में खर्च
अपने शहर में माता-पिता के साथ रहने वाले युवा का घर पर खर्च काफी कम हो सकता है लेकिन मुंबई, दिल्ली या बेंगलुरु में नौकरी करने पर उसे रहने के लिए पीजी या किराये का कमरा लेना पड़ेगा
RentOk के 2023 के आंकड़ों के मुताबिक, मुंबई में तीन लोगों के साथ शेयरिंग वाले पीजी का औसत किराया करीब 12,000 रुपये महीने था. दिल्ली में भी किराये का स्तर इसी के आसपास था.
यानी 5 लाख रुपये सालाना पैकेज वाली नौकरी में मिलने वाले अतिरिक्त 16,600 रुपये में से 12,000 रुपये सिर्फ रहने पर खर्च हो सकते हैं इसके बाद खाना, ट्रांसपोर्ट, बिजली, इंटरनेट और दूसरे जरूरी खर्च भी हैं.
नौकरी के लिए दूसरे शहर में शिफ्ट होने का शुरुआती खर्च भी कम नहीं होता मकान का डिपॉजिट, सामान की शिफ्टिंग और नए शहर में शुरुआती जरूरतों पर अलग से पैसे खर्च करने पड़ते हैं
इसलिए मेट्रो में नौकरी करना करियर के लिहाज से फायदेमंद हो सकता है, लेकिन इसे हमेशा आर्थिक फायदे का सौदा नहीं कहा जा सकता.

जब बारी आती है पीजी से अपने घर में शिफ्ट होने की
शुरुआत में पीजी या शेयरिंग रूम में रहना आसान लग सकता है लेकिन कुछ साल बाद जब कोई युवा शादी करता है, परिवार के साथ रहने लगता है या उसे वर्क फ्रॉम होम के लिए अलग जगह चाहिए होती है, तो खर्च तेजी से बढ़ सकता है
इसका एक उदाहरण बेंगलुरु और लखनऊ के किराये की तुलना से समझ सकते हैं.
2024 में बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड इलाके में करीब 1,000 वर्ग फुट के 2BHK फ्लैट का किराया लगभग 35,000 रुपये महीने था. वहीं, लखनऊ के इंदिरा नगर में इसी तरह के 2BHK फ्लैट का किराया करीब 14,000 से 15,000 रुपये महीने था.
दोनों के किराये में करीब 20,000 रुपये महीने का अंतर है यानी साल भर में बेंगलुरु में रहने वाला व्यक्ति सिर्फ मकान के किराये पर लखनऊ के मुकाबले करीब 2.4 लाख रुपये ज्यादा खर्च कर सकता है.
ये दबाव सिर्फ इन दो शहरों तक सीमित नहीं है. भारत के सात बड़े शहरों के प्रमुख रियल एस्टेट इलाकों में 2021 के अंत से 2024 की पहली छमाही के बीच किराये में 72% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
ऐसे में घर का किराया उन परिवारों के बजट पर भी भारी पड़ता है, जिन्हें होम लोन की EMI, बच्चों की फीस और रोजमर्रा के खर्च भी संभालने होते हैं.
शादी और बच्चे की प्लानिंग पर भी पड़ रहा असर
बड़े शहरों में रहने का खर्च अब सिर्फ नौकरी और घर तक सीमित नहीं है. इसका असर युवाओं के निजी फैसलों पर भी दिख रहा है. शादी कब करनी है, बच्चे कब प्लान करने हैं और परिवार का खर्च कैसे संभालना है- इन सवालों पर आर्थिक स्थिति का असर पड़ता है.
40 साल या उससे अधिक उम्र की उन महिलाओं का अनुपात जिनके बच्चे नहीं हैं, 2015-16 में करीब 7% था. 2019-21 में ये बढ़कर 12% हो गया.
हालांकि, इसके पीछे सिर्फ आर्थिक वजह नहीं है बेहतर शिक्षा, शादी में देरी और व्यक्तिगत पसंद जैसे कई कारण भी हैं.
एक अनुमान के मुताबिक, बच्चे के जन्म से लेकर कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने तक उसे पालने-पढ़ाने का खर्च 38 से 45 लाख रुपये तक हो सकता है.
ऐसे में दो कमाने वाले और बच्चे नहीं रखने वाले कपल यानी DINK (Double Income, No Kids) की चर्चा बढ़ रही है. ये लाइफस्टाइल कुछ लोगों के लिए व्यक्तिगत पसंद है, तो कुछ के लिए आर्थिक योजना का हिस्सा भी हो सकती है हालांकि, परिवार बढ़ाने या न बढ़ाने का फैसला सिर्फ पैसों के आधार पर नहीं होता करियर, निजी प्राथमिकताएं और बच्चों की देखभाल की सुविधा भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं
साइड बिजनेस शुरू करना है तो जगह की भी कीमत चुकानी होगी
बड़े शहरों में रहने का एक फायदा ये है कि यहां ग्राहकों तक पहुंचना आसान हो सकता है. ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म ने छोटे कारोबारियों के लिए भी देशभर में सामान बेचने के रास्ते खोले हैं.
नौकरी के साथ ऑनलाइन कारोबार शुरू करने वाले युवा के लिए ये बड़ा मौका हो सकता है, लेकिन इसके साथ एक व्यावहारिक समस्या भी आती है- सामान रखेंगे कहां?
शेयरिंग फ्लैट में रहने वाले व्यक्ति के पास बिस्तर, अलमारी और काम करने की मेज के लिए ही सीमित जगह होती है. ऐसे में कारोबार का स्टॉक, पैकिंग का सामान और दूसरे उत्पाद रखना मुश्किल हो सकता है.
अलग से दुकान या गोदाम किराये पर लेना शुरुआती कारोबार के लिए महंगा पड़ सकता है. यानी जिस बड़े शहर में ग्राहकों और लॉजिस्टिक्स की सुविधा मिलती है, वहीं जगह की ऊंची कीमत कारोबार बढ़ाने में बाधा बन सकती है.
छोटे शहरों में लौटना अब करियर में पीछे जाना नहीं
अब छोटे शहरों में लौटकर काम करने यानी रिवर्स माइग्रेशन का विकल्प भी चर्चा में है इसकी एक वजह है- कम खर्च में बेहतर जीवन और बचत की संभावना.
टियर-2 शहरों में सीनियर लेवल के प्रोफेशनल्स का औसत वेतन करीब 28.38 लाख रुपये है कुछ शहरों में ये वेतन टियर-1 शहरों के बराबर भी पहुंच रहा है.
अहमदाबाद में सैलरी ग्रोथ 9.5% रहने का अनुमान है, जो बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों से भी ज्यादा हो सकता है. जयपुर, इंदौर, अहमदाबाद और कोच्चि जैसे शहर भी कुशल पेशेवरों के लिए नए विकल्प बन रहे हैं.
अनुभवी पेशेवरों के लिए अपने शहर लौटने का मतलब कम किराया, परिवार के करीब रहना और ज्यादा बचत हो सकता है.
हालांकि, छोटे शहरों में हर तरह की नौकरी और करियर ग्रोथ के मौके उपलब्ध नहीं हैं. बड़ी कंपनियों, विशेष भूमिकाओं और प्रोफेशनल नेटवर्क के मामले में मेट्रो शहरों की अपनी अहमियत है. खासकर करियर के शुरुआती वर्षों में बड़े शहरों का अनुभव भविष्य की कमाई बढ़ाने में मदद कर सकता है.
इसलिए फैसला सिर्फ शहर के खर्च या शुरुआती सैलरी के आधार पर नहीं होना चाहिए. ये भी देखना जरूरी है कि नौकरी से कौन-सी स्किल मिल रही है और आगे करियर में कितनी तरक्की की संभावना है.
दो शहरों में घर रखने का खर्च भी समझिए
हाइब्रिड वर्क और दूसरे शहरों में प्रोजेक्ट के चलते कई पेशेवरों को दो जगहों पर रहना पड़ता है. कुछ लोग अपने होमटाउन में परिवार का घर बनाए रखते हैं और नौकरी के लिए दूसरे शहर में फ्लैट किराये पर लेते हैं.
ऐसे में व्यक्ति महीने के कुछ दिन ही ऑफिस वाले शहर में रहता है, लेकिन पूरे महीने का किराया देना पड़ता है. घर में रखे फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक सामान और दूसरे घरेलू सामान के कारण उस घर को पूरी तरह खाली करना भी आसान नहीं होता.
इस तरह दो घरों का खर्च बचत पर सीधा असर डाल सकता है. यही पैसा इमरजेंसी फंड, निवेश या भविष्य में घर खरीदने के डाउन पेमेंट के लिए इस्तेमाल हो सकता था.

क्या स्टोरेज की सुविधा घटा सकती है घर का खर्च?
शहरों में घर की बढ़ती कीमतों के बीच ऑर्गनाइज्ड स्टोरेज एक विकल्प के तौर पर उभर रहा है. इसका मतलब है कि फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक सामान, सीजनल चीजें या ऐसा सामान, जिसकी रोज जरूरत नहीं होती, उसे घर से बाहर किसी व्यवस्थित स्टोरेज फैसिलिटी में रखा जा सकता है.
इससे छोटे घर में रहने वाले लोगों को हर सामान के लिए ज्यादा जगह वाला फ्लैट लेने की जरूरत कम हो सकती है. दो शहरों में रहने वाले पेशेवर भी एक घर को पूरी तरह फर्निश करने के बजाय कुछ सामान स्टोरेज में रख सकते हैं. इसी तरह छोटे कारोबारी अपना स्टॉक रखने के लिए महंगी कमर्शियल जगह किराये पर लेने के बजाय स्टोरेज का विकल्प देख सकते हैं.
स्टोरमायगुड्स के फाउंडर सुदीप गुप्ता का मानना है कि शहरों में घर के खर्च का बदलता गणित फ्लेक्सिबल स्टोरेज की जरूरत बढ़ा रहा है.
सवाल ये है कि क्या लोगों को अपने सामान के लिए घर या दुकान का हर अतिरिक्त वर्ग फुट किराये पर लेना जरूरी है? स्टोरेज की सुविधा घर का किराया खत्म नहीं करती, लेकिन जरूरत के मुताबिक कम जगह किराये पर लेने में मदद कर सकती है.
नौकरी की सैलरी नहीं, महीने के आखिर में बचने वाला पैसा देखिए
बड़े शहर में नौकरी करना गलत फैसला नहीं है. बेहतर अवसर, बड़ी कंपनियों में काम करने का अनुभव, प्रोफेशनल नेटवर्क और ज्यादा कमाई की संभावना मेट्रो शहरों को आकर्षक बनाती है.
लेकिन सिर्फ पैकेज देखकर नौकरी चुनना भी सही नहीं है. 5 लाख रुपये सालाना की मेट्रो नौकरी और अपने शहर में 3 लाख रुपये की नौकरी के बीच असली अंतर तभी समझ आएगा, जब दोनों जगह रहने, खाने, आने-जाने और दूसरे खर्चों का हिसाब लगाया जाए.
परिवार, बच्चों, साइड बिजनेस और दो घरों का खर्च जुड़ने पर ये गणित और बदल जाता है.
इसलिए नौकरी चुनते समय सिर्फ ये देखना काफी नहीं कि सालाना पैकेज कितना है, ये भी देखना जरूरी है कि महीने के आखिर में कितना पैसा बच रहा है, कितनी जगह के लिए किराया दे रहे हैं और उस शहर में मिलने वाले करियर के अवसर आपके अतिरिक्त खर्च को कितना सही ठहराते हैं.
क्योंकि ज्यादा सैलरी वाला पैकेज जरूरी नहीं कि आपको ज्यादा अमीर बनाए. असली फायदा उस नौकरी में है, जिससे खर्च निकालने के बाद आपके पास बचत और निवेश के लिए ज्यादा पैसा बचे.
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