Oil and Gas Prices Challenges: ईरान और इजराइल के बीच मिसाइल युद्ध थमने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें जरूर थोड़ी नीचे आई हैं, लेकिन क्या इतने भर से आम जनता और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा ऊर्जा संकट टल गया है? जवाब है- शायद नहीं. कीमतों में मामूली गिरावट को फिलहाल एक तात्कालिक राहत के तौर पर देखा जा रहा है. मौजूदा हालात बताते हैं कि भीतर ही भीतर तेल और गैस का संकट अब भी गहराया हुआ है. भारत में इसका सीधा असर घरेलू बजट से लेकर देश की GDP तक पर दिखना शुरू हो गया है. आइए NDTV के इस विशेष विश्लेषण में बेहद आसान भाषा में समझते हैं कि कच्चे तेल के खेल के पीछे की पूरी कहानी क्या है.
हमले रुके तो दाम में मामूली गिरावट
ईरान और इजराइल द्वारा एक-दूसरे पर मिसाइल हमले रोकने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में मंगलवार को कच्चे तेल की कीमतों में मामूली गिरावट दर्ज हुई. 'ब्रेंट क्रूड ऑयल फ्यूचर्स' की कीमत करीब 0.8% घटकर 94 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ट्रेंड कर रही है. इससे ठीक एक दिन पहले (सोमवार को) युद्ध दोबारा भड़कने की आशंका के चलते यही कीमत 98 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई थी. इस भू-राजनीतिक तनाव का असर भारत समेत दुनिया भर के शेयर बाजारों पर दिखा.
सेंसेक्स (Sensex) सोमवार को 719 अंक से अधिक गिरकर 73,524 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50 करीब 244 अंक गिरकर 23,123 पर सिमट गया. सिर्फ एक दिन की गिरावट से BSE में लिस्टेड कंपनियों की मार्केट वैल्यू लगभग 7 लाख करोड़ रुपये घट गई. मंगलवार को थोड़ी राहत है कि बाजार बढ़त के साथ खुले हैं.
उज्ज्वला योजना: अब 9 नहीं, बस 4 सिलेंडर पर सब्सिडी
गहरे होते ऊर्जा संकट का सबसे पहला और सीधा असर देश के गरीब परिवारों पर पड़ा है. सोमवार को पेट्रोलियम मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला लेते हुए 'प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना' के लाभार्थियों को मिलने वाले सब्सिडी वाले गैस सिलेंडरों की संख्या सालाना 9 से घटाकर सीधे 4 कर दी है.

Photo Credit: ndtv
'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' बना हुआ है बड़ी मुसीबत
भले ही मिसाइलें चलना बंद हो गई हों, लेकिन अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच किसी 'पीस डील' पर बात नहीं बन पाई है. पूरे मध्य पूर्व (Middle East) में अनिश्चितता का माहौल है.
संकट की असली वजह: इस टकराव के कारण समुद्री मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले तेल और गैस टैंकरों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है. इस रूट के बाधित होने से ग्लोबल एनर्जी मार्केट में करीब 20% कच्चे तेल की सप्लाई रुक गई, जिसने कीमतों में लगी आग को हवा दी.
पेट्रोलियम मंत्रालय की पीपीएसी (PPAC) रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2026 में भारतीय बास्केट के लिए कच्चे तेल की औसत कीमत 114.48 डॉलर और मई 2026 में 106.23 डॉलर प्रति बैरल के ऊंचे स्तर पर थी. आज भी यह 94 डॉलर पर है. वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी (LPG) भी 46% से ज्यादा महंगी हो चुकी है.
इकोनॉमी की रफ्तार: RBI ने भी घटाया अनुमान
मध्य पूर्व में 28 फरवरी को शुरू हुए इस विवाद के बाद पिछले 102 दिनों से ऊर्जा उत्पाद बेहद महंगे बने हुए हैं. बढ़ती महंगाई को देखते हुए रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर ने भी चेतावनी जारी की है. RBI गवर्नर के अनुसार, लंबे समय तक सप्लाई चेन बाधित रहने से देश की विकास दर (Growth Rate) प्रभावित होगी. मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए भारत की वास्तविक जीडीपी (GDP) वृद्धि दर का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया गया है. पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी के कारण इस वर्ष खुदरा महंगाई दर (CPI Inflation) 5.1% रहने का अनुमान है, जो पुराने अनुमान से 50 बेसिस पॉइंट अधिक है.

भारत पर क्यों हो रहा है इतना बड़ा असर?
भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल और लगभग 60% एलपीजी (LPG) विदेशों से आयात करता है. सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि हमारे कुल आयात का 40% कच्चा तेल और 90% एलपीजी इसी 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के रास्ते भारत आता था.
इसी का नतीजा है कि भारत में 15 मई 2026 के बाद से अब तक चार बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए जा चुके हैं. इसके अलावा, बीते रविवार को ही सरकारी तेल कंपनियों ने घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतें भी 29 रुपये बढ़ा दी थीं.
रूट बदला तो बढ़ गया खर्च, तेल कंपनियों को भारी घाटा
संकट से निपटने के लिए भारत सरकार ने तेल कंपनियों के साथ मिलकर एलपीजी आयात के स्रोतों को 'डाइवर्सिफाई' (नए बाजारों की तलाश) किया है. अब दुनिया के नए देशों से एलपीजी मंगवाई जा रही है, लेकिन नए रूट की वजह से ट्रांसपोर्टेशन का खर्च काफी बढ़ गया है.
लागत में भारी अंतर: एलपीजी के लिए 'Saudi CP benchmark' में जनवरी से करीब 50% की वृद्धि हुई है. इसके चलते अब एक सिलेंडर की सप्लाई लागत बढ़कर 1,600 रुपये से 1,700 रुपये तक पहुंच गई है. रविवार को दाम बढ़ाने के बावजूद तेल कंपनियों को प्रति घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर 600 से 700 रुपये की अंडर-रिकवरी (घाटा) हो रही है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले एक साल में घरेलू एलपीजी पर कंपनियों का यह घाटा 41,338 करोड़ से बढ़कर 60,000 करोड़ होने का अनुमान है.

क्या 1970 के दशक के 'बड़े तेल संकट' से भी बदतर हैं हालात
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने अपनी 'ऑयल मार्केट रिपोर्ट - मई 2026' में एक चौंकाने वाला खुलासा किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस युद्ध के चलते मार्च 2026 में वैश्विक बाजारों में रोजाना तेल की सप्लाई में जो कमी आई, वह 1970 के दशक में दुनिया ने जो दो बड़े ऐतिहासिक तेल संकट देखे थे, उनसे भी कहीं अधिक भयानक है.
सरकार की अपील- 'पैनिक बाइंग' और अफवाहों से बचें
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पेट्रोलियम मंत्रालय ने आम उपभोक्ताओं और औद्योगिक घरानों से संयम बरतने की अपील की है. मंत्रालय का कहना है कि सरकार पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कदम उठा रही है. नागरिक अफवाहों में न आएं और पेट्रोल-डीजल की जल्दबाजी में खरीदारी (Panic Buying) या एलपीजी की अंधाधुंध बुकिंग करने से बचें. मौजूदा परिस्थितियों के बीच सरकार ने लोगों से अनुरोध किया है कि वे जहां तक हो सके, ऊर्जा संरक्षण यानी पेट्रोल, डीजल, गैस वगैरह बचाने का प्रयास करें.
ये भी पढ़ें: Zepto IPO: फाउंडर्स आदित पालिचा-कैवल्य को ED ने किया था तलब, UDRHP में खुलासा! आने वाला है 9,500 करोड़ का आईपीओ
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं