आज संसद में कुछ बड़े बिल पास हुए हैं. लोकसभा ने गुरुवार को भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 (Payment and Settlement Systems Act) में संशोधन करने वाले एक नए बिल को अपनी मंजूरी दे दी है. इस बिल के पास होने से सरकार को ये कानूनी अधिकार मिल गया है कि वो बैंकों और अन्य पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को यूपीआई (UPI) और दूसरे डिजिटल ट्रांजैक्शन पर चार्ज लगाने की अनुमति दे सके. बड़ी बात यह रही कि सदन में भारी शोर-शराब और हंगामे के बीच इस संशोधन बिल को बिना किसी लंबी चर्चा के ही पास कर दिया गया.
इसके साथ ही लोकसभा ने टैक्सेशन और अन्य विधियां संशोधन बिल, 2026 को भी बिना चर्चा के पारित कर दिया. इस बिल का उद्देश्य देश में ज्यादा विदेशी पूंजी लाना और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है. विपक्ष के हंगामे के कारण बिल पर चर्चा नहीं हो सकी. सदन ने इस संबंध में जून में लागू अध्यादेश को अस्वीकृत करने के RSP सांसद एनके प्रेमचंद्रन के सांविधिक संकल्प को खारिज कर दिया. साथ ही के राधाकृष्णन, राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव और प्रेमचंद्रन समेत कुछ विपक्षी सदस्यों के संशोधनों को भी खारिज कर दिया.
UPI से जुड़े बिल में क्या है?
अभी तक नियमों के मुताबिक, आरटीजीएस (RTGS) और एनईएफटी (NEFT) जैसे रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम के जरिए पैसे भेजने पर सर्विस चार्ज देना पड़ता था, लेकिन यूपीआई ट्रांजैक्शन को इन शुल्कों से पूरी तरह बाहर यानी मुफ्त रखा गया था.
पुराने कानूनों के तहत, पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट की धारा 10A बैंकों और पेमेंट कंपनियों को किसी भी इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट पर चार्ज या मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने से रोकती थी. अब इस नए संशोधन के बाद इस पुरानी कानूनी रुकावट को हटा दिया गया है, ताकि डिजिटल भुगतान प्रणाली से जुड़े बैंकों और कंपनियों के लिए एक टिकाऊ कमाई का मॉडल तैयार किया जा सके.
सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम को चलाने वाले बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने वाली कंपनियों को मजबूत करना है. हालांकि, इसे लेकर आम लोगों के मन में कई तरह के सवाल उठने लगे हैं कि क्या अब हर छोटी-मोटी UPI पेमेंट पर भी पैसा कटेगा.
UPI पेमेंट पर चार्ज? RBI गवर्नर ने क्या कहा?
इस पूरे मामले पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के गवर्नर संजय Malhotra ने बुधवार को एक बयान में कहा था कि डिजिटल पेमेंट पर एमडीआर (MDR) लगाने के बारे में अभी कोई भी बात करना बहुत जल्दबाजी होगी. उन्होंने साफ किया कि डिजिटल पेमेंट जैसे बड़े सार्वजनिक बुनियादी ढांचे पर भारी निवेश की जरूरत होती है और इसके खर्च का भुगतान किसी न किसी को तो करना ही होगा.
गवर्नर ने दो विकल्प सामने रखे: या तो इस व्यवस्था का खर्च आम जनता टैक्स के जरिए उठाए, या फिर 'यूजर पेज़' (उपयोगकर्ता भुगतान) के सिद्धांत के तहत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाया जाए. उन्होंने कहा कि देश में इस बुनियादी ढांचे को और अधिक मजबूत और बेहतर बनाने के लिए लगातार निवेश की आवश्यकता है.
आगे क्या हो सकता है?
देश में पिछले कुछ सालों से यूपीआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है और यह आम आदमी की जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया है. जानकारों का मानना है कि यदि सरकार MDR लागू करती भी है, तो यह आम आदमी के बीच होने वाले छोटे लेन-देन (P2P) पर न होकर, बड़े व्यापारियों और ग्राहकों के बीच होने वाले चुनिंदा ट्रांजैक्शन पर ही लागू हो सकता है. फिलहाल इस पर स्थिति आने वाले दिनों में और साफ होगी.
नए टैक्सेशन बिल में क्या है?
- इस बिल में 'फंड मैनेजरों' के भारत आने को आसान बनाने का प्रस्ताव किया गया है, जबकि विदेशी निवेश को भारत में कारोबार में लगा पैसा नहीं माना जाएगा.
- इसका उद्देश्य उन विदेशी कंपनियों को मिलने वाली टैक्स छूट को 2040-41 तक बढ़ाना भी है, जो किसी भारतीय फैक्टरी को मशीनरी और उपकरण उपलब्ध कराती हैं और वो फैक्टरी कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग के तहत उनकी ओर से खास इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स बनाती हैं.
- इन खास इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स में मोबाइल फोन, लैपटॉप, कंप्यूटर, टैबलेट, सर्वर और उनके मुख्य पार्ट्स और एक्सेसरीज शामिल हैं. यानी भारत में ये आइटम्स बनाने वाली कंपनियों को इस प्रावधा के तहत टैक्स छूट मिलेगी.
- इलेक्ट्रॉनिक्स फैक्टरी को पुर्जों की आपूर्ति में मदद करने के लिए, यह विधेयक उन विदेशी कंपनियों को 2040-41 तक 15 साल के लिए कर में छूट देने का प्रस्ताव करता है, जो भारत में अनुबंध विनिर्माता को आपूर्ति करने के लिए 'कस्टम्स वेयरहाउस' में पुर्जे रखती हैं.
- विधेयक में उन विदेशी 'क्लाउड' कंपनियों के लिए मंजूरी की जरूरत को भी खत्म किया गया है जो भारतीय डेटा सेंटर का इस्तेमाल करती हैं. इसमें यह भी प्रस्ताव किया गया है कि भारतीय डेटा सेंटर को सिर्फ सीधे मालिकाना हक के तहत संचालित करने के बजाय पट्टे के आधार पर संचालित किया जाए.
विधेयक में संदाय और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10ए और आयकर अधिनियम की धारा 269-SU में आवश्यक बदलाव करने का प्रस्ताव किया गया है. मौजूदा प्रावधान के तहत 50 करोड़ रुपये से अधिक के कारोबार वाले बड़े व्यवसायों के लिए 'रुपे' डेबिट कार्ड और भीम-यूपीआई क्यूआर कोड सहित कुछ निर्धारित इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भुगतान स्वीकार करना अनिवार्य है.
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