PM Modi WFH Appeal: मिडिल ईस्ट में जारी ईरान-अमेरिका संघर्ष का दुनियाभर की इकोनॉमी पर बुरा असर पड़ा है. दुनियाभर के देश तेल और गैस का संकट झेल रहे हैं, जबकि भारत में पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम स्थिर हैं. एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) के चीफ इकोनॉमिस्ट ने लंबे समय तक क्रूड ऑयल के दाम ऊंचे बने रहने की आशंका जताई है. इस बीच रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्क फ्रॉम होम को तवज्जो देने की अपील की है. उन्होंने कहा, 'हमें कर्तव्य को सर्वोपरि रखते हुए एक संकल्प लेना होगा. एक बड़ा संकल्प पेट्रोल और डीजल का कम से कम उपयोग करना है.'
प्रधानमंत्री ने ईंधन बचाने के एक राष्ट्रीय उपाय के रूप में ये सुझाव दिया है कि हमें वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन कॉन्फ्रेंस और वर्चुअल मीटिंग्स को फिर से प्राथमिकता देनी चाहिए. PM मोदी के इस आह्वान ने देश के कॉर्पोरेट जगत में एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या भारत, कोविड काल की तरह वर्क फ्रॉम होम के लिए तैयार है.
वर्क फ्रॉम होम को लाग किए जाने की मांग
प्रधानमंत्री की इस अपील को लागू किए जाने की भी मांग हो रही है. आईटी कर्मचारियों के संगठन NITES (Nascent Information Technology Employees Senate) ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर मांग की है कि आईटी और आईटीईएस (ITeS) कंपनियों के लिए 'वर्क फ्रॉम होम' की एडवाइजरी अनिवार्य रूप से जारी की जाए, ताकि ईंधन संरक्षण और शहरी बुनियादी ढांचे पर दबाव कम करने के राष्ट्रीय प्रयास को समर्थन मिल सके.
क्या देश 'कोविड-युग' की तरह WFH के लिए तैयार है?
प्रधानमंत्री का संदेश स्पष्ट है, अनावश्यक यात्रा में कटौती करें, ईंधन का कम उपयोग करें और जहां तक संभव हो वर्चुअल मीटिंग्स की ओर लौटें. लेकिन सवाल यह है कि क्या भारतीय कंपनियां फिर से उसी कोविड जैसे वर्क पैटर्न को अपना सकती हैं?
आईटी सेक्टर का मानना है कि उनके पास इसके लिए बुनियादी ढांचा और क्षमता दोनों मौजूद हैं. NITES के अध्यक्ष हरप्रीत सिंह सलूजा कहते हैं, 'भारतीय आईटी क्षेत्र ने पहले ही कोविड-19 महामारी के दौरान उत्पादकता या व्यावसायिक निरंतरता में व्यवधान के बिना बड़े पैमाने पर वर्क फ्रॉम होम को सफलतापूर्वक लागू किया था. आईटी/आईटीईएस क्षेत्र में रिमोट वर्किंग के माध्यम से राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का फिर से समर्थन करने के लिए बुनियादी ढांचा और क्षमता दोनों हैं.'

कर्मचारियों और कंपनियों का नजरिया क्या है?
कोविड के दौरान कंपनियों ने रिमोट इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लाउड ऑपरेशंस और डिजिटल सहयोग उपकरणों में भारी निवेश किया था. कर्मचारियों के लिए भी अब यह केवल सुविधा का मामला नहीं रह गया है. मुंबई की कम्युनिकेशंस प्रोफेशनल श्रुति पाल कहती हैं, 'प्रधानमंत्री की अपील ने लचीलेपन (Flexibility), उत्पादकता और कल्याण के इर्द-गिर्द एक बहुत जरूरी चर्चा छेड़ दी है. यदि संगठन व्यावसायिक प्राथमिकताओं के साथ कर्मचारियों की जरूरतों को संतुलित कर सकते हैं, तो हाइब्रिड और रिमोट वर्क सार्थक बना रह सकता है.'
वहीं, गुरुग्राम में एक टेलीकॉम कंपनी में काम करने वाले अभिषेक का मानना है कि समय बिल्कुल सही है. वे कहते हैं, 'रिमोट और हाइब्रिड वर्क पहले से ही अधिक स्वीकार्य हो रहे हैं. परिचालन के दृष्टिकोण से, मेरा मानना है कि हमारा कार्यालय अनुकूलन के लिए काफी हद तक तैयार है. व्यक्तिगत रूप से, मुझे विश्वास है कि मैं उत्पादकता बनाए रखते हुए रिमोटली काम कर सकता हूं.'
कंपनियों की राय: काम को परिणाम से आंका जाए
कुछ कंपनियां भी अब इसे केवल एक अस्थाई व्यवस्था के रूप में नहीं देख रहे हैं. सराफ फर्नीचर के फाउंडर और CEO रघुनंदन सराफ का कहना है, 'यह अब सुविधा के बारे में नहीं है. यह एक लचीला और उत्पादक कार्यबल बनाने के बारे में है. रिमोट वर्क और हाइब्रिड मॉडल मानसिक कल्याण में सुधार करते हैं और जवाबदेही बढ़ाते हैं.'
मेंटोरिया और BOTS.AI के CEO निखर अरोड़ा इस बात पर जोर देते हैं कि काम को डेस्क पर बिताए गए समय से नहीं, बल्कि परिणामों से मापा जाना चाहिए.
वहीं, HR एनेक्सी के CEO योगेश अरोड़ा का मानना है, 'WFH समय प्रबंधन में सुधार करता है, दैनिक तनाव कम करता है और कर्मचारियों को ऊर्जावान बनाता है. भविष्य के कार्यस्थल मॉडल विश्वास और लचीलेपन पर केंद्रित होंगे.'
वर्क फ्रॉम होम के पीछे दिए जा रहे हैं ये तर्क
- ईंधन संरक्षण: पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने के लिए रिमोट वर्क को बढ़ावा.
- राष्ट्रीय प्राथमिकता: WFH को आर्थिक और राष्ट्रीय हित के उपाय के रूप में अपनाना.
- इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारी: क्लाउड, साइबर सुरक्षा और डिजिटल टूल्स का उपयोग.
- हाइब्रिड मॉडल: कार्यालय और घर से काम के बीच भूमिका-आधारित संतुलन.
- मानसिक स्वास्थ्य: यात्रा के तनाव में कमी और वर्क-लाइफ बैलेंस में सुधार.
- उत्पादकता: समय के बजाय परिणाम आधारित (Outcome-based) प्रदर्शन का आकलन.
- शहरी दबाव: ट्रैफिक जाम और सार्वजनिक परिवहन पर निर्भरता कम करना.
- वर्चुअल मीटिंग्स: यात्रा के विकल्प के रूप में ऑनलाइन कॉन्फ्रेंसिंग को बढ़ावा.
क्या यह सब पर लागू हो सकता है?
तकनीकी फर्में भले ही जल्दी बदलाव करने की स्थिति में हों, लेकिन सभी सेक्टर्स के लिए ये आसान नहीं है. इनक्रूटर (InCruiter) के फाउंडर अनिल अग्रवाल चेतावनी देते हैं, 'तैयारी अलग-अलग क्षेत्रों में काफी भिन्न है. रिमोट वर्क के लिए विश्वास, तकनीक और प्रक्रिया अनुशासन की आवश्यकता होती है. कई नियोक्ताओं के पास अभी भी इस बुनियादी ढांचे की कमी है.'
रेडू-क्यू (RedoQ) के CEO दीपल दत्ता इसे एक रणनीतिक अवसर मानते हैं. वे इसे 'हाइब्रिड 2.0' मॉडल कहते हैं जो राष्ट्रीय ऊर्जा रणनीति का हिस्सा बन सकता है. टीमलीज सर्विसेज के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट बालसुब्रमण्यन ए. का कहना है कि यह एक 'संरचित, भूमिका-आधारित दृष्टिकोण' में विकसित होगा.
राष्ट्रीय हित और सामूहिक जिम्मेदारी
NITES के अनुसार, डिजिटल विकल्प उपलब्ध होने के बावजूद लाखों कर्मचारियों को प्रतिदिन यात्रा करने के लिए मजबूर करना ईंधन की खपत, ट्रैफिक जाम और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर पर अनावश्यक दबाव डालता है. प्रधानमंत्री की यह अपील अब एक आर्थिक और राष्ट्रीय हित का पैमाना बन चुकी है. अब गेंद कॉर्पोरेट इंडिया के पाले में है कि वह इस 'संकल्प' को कितनी दूर तक ले जा सकता है.
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