शेयर मार्केट में घरेलू निवेशकों का निवेश पिछले कुछ समय से लगातार बढ़ा है. पुराने निवेशकों के साथ अब युवा पीढ़ी भी मार्केट में पैसा लगा रहे हैं. शेयर मार्केट कोई जादू नहीं है कि पैसा लगाया और वो पांच दिन के अंदर ही दोगुना हो जाए. यहां जानकारी के साथ संयम की जरूरत होती है. साथ ही कुछ ऐसे तकनीक वाले शब्द होते हैं, जिनके बारे में नए निवेशकों को पता होना ही चाहिए. इसलिए आज ये खबर उन युवा निवेशकों के लिए है जो अभी मार्केट में आए हैं या फिर आने की तैयारी में हैं.
सबसे पहला सवाल सेंसेक्स, निफ्टी क्या है?
आपने अमूमन सुना ही होगा कि आज सेंसेक्स इतने अंक चढ़ गया या निफ्टी में इतनी गिरावट आई. तो आपको बता दें कि सेंसेक्स बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का एक इंडेक्स है. इसमें देश की 30 सबसे बड़ी कंपनियां शामिल होती हैं. इन 30 कंपनियों के शेयरों में उतार-चढ़ाव से ही सेंसेक्स की चाल तय होती है. दूसरी तरफ निफ्टी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का इंडेक्स है, जिसमें देश की 50 बड़ी कंपनियां शामिल होती हैं. इसके लिए इसे निफ्टी 50 भी बोला जाता है.
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बुल और बियर में क्या अंतर?
जब बाजार में लगातार तेजी है या शेयर के दाम ऊपर जा रहे हों तो इसके बुल मार्केट कहते हैं. वहीं इसके उलट जब बाजार में लगातार गिरावच हो, निवेशक शेयर बेच रहे हों, तो इसे बियर मार्केट कहते हैं.
शेयर या इक्विटी, फेस वैल्यू, मार्केट कैप का क्या है मामला?
इक्विटी का मतलब हिस्सा है. जब किसी कंपनी के शेयर खरीदे जाते हैं तो खरीदने वाला उस कंपनी में उतने हिस्से का मालिक बन जाता है. वहीं फेस वैल्यू किसी शेयर की रियल कीमत होती है, जो कंपनी अपने सर्टिफिकेट में बताती है. मार्केट कैपिटलाइजेशन से किसी कंपनी की कुल वैल्यू के बारे में पता चलता है. इसे निकालने का सीधा फॉर्मूला है. कंपनी के कुल शेयरों का गुणा एक शेयर की कीमत से कर देने पर कंपनी की मार्केट वैल्यू निकलकर आ जाएगी.
आईपीओ, डिविडेंड, पोर्टफोलियो का मतलब?
जब कोई कंपनी पहली बार आम नागरिक के लिए शेयर बेचने के लिए शेयर मार्केट में आती है, तो वो आईपीओ लेकर आती है. इसे कम कीमत पर शेयर खरीदने का एस सुनहरा अवसर कह सकते हैं. अगर बात डिविडेंड की करें तो ये कंपनी को मुनाफा होने पर निवेशकों को दिया जाता है. जब किसी कंपनी को अच्छा प्रॉफिट होता है तो वो उस मुनाफे का एक हिस्सा अपने शेयरहोल्डर्स में बांटती है. दूसरी तरफ किसी निवेशक ने जितने भी अलग-अलग कंपनियों के शेयर, म्यूचुअल फंड या गोल्ड खरीदे हैं तो उन सभी के टोटल कलेक्शन को पोर्टफोलियो कहते हैं.
स्टॉप लॉस, लिक्विडिटी और वोलैटिलिटी में अंतर?
पहले बात स्टॉप लॉस की करते हैं. ये एक ऐसा ऑटोमैटिक टूल है जो किसी निवेशक को बड़े नुकसान होने से बचाता है. मान लीजिए आपने कोई शेयर 100 रुपये में खरीदा. आप चाहते हैं कि इस शेयर पर 5 रुपये से ज्यादा का नुकसान ना हो. उसके लिए आप 95 रुपये पर स्टॉप लॉस लगा देंगे. जैसे ही शेयर गिरकर 95 रुपये पर आएगा, वैसे ही ये खुद व खुद सेल हो जाएगा.
लिक्विडिटी का मतलब है कि किसी शेयर को कितनी आसानी से उसे कैश में बदला जा सकता है. जिस शेयर के खरीदार और बेचने वाले मार्केट में ज्यादा होते हैं, उसमें उतनी ही लिक्विडिटी हाई होती है. वोलैटिलिटी का मतलब शेयर की कीमत का बहुत तेजी से ऊपर-नीचे होने से है. जब किसी शेयर की कीमत बहुत जल्दी-जल्दी बढ़ती और घटती है तो उसे हाई वोलैटिलिटी कहा जाता है. अमूमन ऐसे शेयरों से नए निवेशकों को दूर रहने की सलाह दी जाती है.
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