How Heatwave is Rising Unemployment: नोएडा के लेबर चौक पर रविवार की सुबह मजदूरों की भीड़ नहीं दिखी. छिटपुट मजदूर दिखे भी तो धूप के चलते इधर-उधर ओट लिए खड़े थे. उनमें से एक से पूछने पर पता चला कि बहुत सारे मजदूर गांव चले गए हैं. वजह- गर्मी की वजह से कंस्ट्रक्शन वर्क्स यानी निर्माण कार्यों की रफ्तार पर ब्रेक लगने के चलते दिल्ली-एनसीआर में काम कम हो गया है. वो बताते हैं कि खुद भी वो पंजाब निकलने की सोच रहे थे, लेकिन वहां भी खेती-बारी प्रभावित है, सो काम मिलना तय नहीं है.
ये तो एक तस्वीर हो गई, दूसरी तस्वीर आपको बाजारों में दिखेगी.
आज-कल में आप दिल्ली के करोलबाग गए हैं क्या? सदर बाजार या लाजपत नगर? या फिर आप जिस भी इलाके में रहते हों, वहां के चर्चित बाजार से गुजरें हों तो आपने गौर किया होगा कि खासकर सुबह 10 से दोपहर 4 बजे के बीच वहां लगभग सन्नाटा पसरा होगा, या फिर अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत कम भीड़ दिख रही होगी. रेहड़ी-पटरी पर दुकानें लगानेवाले भी अपेक्षाकृत कम हो गए हैं.
गर्मी इतनी बढ़ गई है कि इसका व्यापक असर रोजी-रोजगार और आमदनी पर भी पड़ रहा है. देश में गर्मी केवल स्वास्थ्य पर असर नहीं डाल रही, बल्कि इकोनॉमी को भी बुरी तरह प्रभावित कर रही है. देश के कई हिस्सों में तापमान 40°C से 45°C के बीच झूल रहा है, जो स्वास्थ्य के साथ-साथ सीधे तौर पर रोजगार और यहां तक कि देश की GDP पर भी बुरा असर डाल रहा है.
हम 4 प्वाइंट में समझने की कोशिश करेंगे कि कैसे बढ़ती गर्मी, बेरोजगारी भी बढ़ा रही है.
1. कमाई पर सीधा हमला: दिहाड़ी में 40% कमी
गर्मी का बढ़ना सीधे तौर पर लेबर प्रोडक्टिविटी और आय के नुकसान से जुड़ा है. स्माइल फाउंडेशन की हेल्थ डायरेक्टर डॉ रश्मि अर्देय सावधान करती हैं कि महज 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी दैनिक मजदूरी को लगभग 16% तक कम कर सकती है.
गंभीर परिस्थितियों में, जब लू के थपेड़े असहनीय हो जाते हैं, तब मजदूरों की कमाई में 40% या उससे अधिक की गिरावट आ सकती है. यह उन करोड़ों परिवारों के लिए बड़ा झटका है जो अपनी दैनिक मजदूरी पर निर्भर हैं.

दिल्ली जैसे महानगरों में किए गए सर्वेक्षण बताते हैं कि अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector) में काम करने वाले लोग अत्यधिक गर्मी के कारण रात में ठीक से सो नहीं पाते और दिन में काम करने की क्षमता खो देते हैं, जिससे उनकी शुद्ध आय 40% तक गिर जाती है.
2. हीट स्ट्रेस से 3.4 करोड़ नौकरियों पर मंडराता खतरा
विश्व बैंक और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़े डराने वाले हैं. उनका अनुमान है कि 2030 तक दुनिया भर में गर्मी के कारण लगभग 8 करोड़ फुल-टाइम नौकरियां खत्म हो सकती हैं. चिंता की बात यह है कि इन 8 करोड़ में से अकेले 3.4 करोड़ नौकरियां भारत की हो सकती हैं.
भारत की लगभग 75% वर्कफोर्स (करीब 38 करोड़ लोग) ऐसे कामों में लगी है जहां उन्हें सीधे धूप और गर्मी का सामना करना पड़ता है. इसमें निर्माण कार्य (Construction), खेती, रेहड़ी-पटरी और डिलीवरी पार्टनर शामिल हैं. ILO यानी अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, 2030 तक भारत गर्मी के कारण अपने टोटल वर्क आवर्स यानी कुल कार्य घंटों का 5.8% हिस्सा खो सकता है.

3. भारत की GDP को झटका लगने की आशंका
गर्मी केवल व्यक्तिगत कमाई ही नहीं, बल्कि देश की कुल उत्पादकता को भी लील रही है. जोटा हेल्थकेयर के डॉ सुजीत पॉल के अनुसार, अत्यधिक गर्मी के कारण पहले ही उत्पादकता में लगभग 159 बिलियन डॉलर (करीब 13 लाख करोड़ रुपये) का नुकसान हो चुका है.
- RBI की चेतावनी: यदि ग्लोबल वार्मिंग इसी तरह बढ़ती रही, तो 2050 तक भारत की GDPको 2.8% का स्थायी नुकसान हो सकता है.
- काम के घंटों का नुकसान: गर्मी और उमस के कारण 2030 तक भारत की GDPका 4.5% हिस्सा जोखिम में है क्योंकि लोग काम करने की स्थिति में नहीं होंगे.
- उत्पादन में गिरावट: एक अध्ययन के अनुसार, तापमान में हर 1°C की वृद्धि मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट (उत्पादन) को 2% तक कम कर देती है.

4. खेती के अलावा छोटे-मध्यम उद्योगों पर दोहरी मार
गर्मी का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है. छोटे व्यवसायों और सूक्ष्म उद्योगों पर इसका प्रभाव सबसे ज्यादा है.
- कृषि और पशुपालन: हालांकि यह मुख्य फसलों का सीजन नहीं है, लेकिन सब्जियों और बागवानी फसलों पर इसका बुरा असर पड़ रहा है. पशुओं में 'हीट स्ट्रेस' के कारण दूध उत्पादन घट रहा है, जिससे डेयरी सेक्टर प्रभावित हो रहा है.
- महंगाई का बोझ: गर्मी के कारण बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर है और सब्जियों की फसल बर्बाद होने से खाद्य महंगाई (Food Inflation) बढ़ रही है. बैंक ऑफ बड़ौदा और बार्कलेज की रिपोर्टें बताती हैं कि आने वाले दिनों में सब्जियों की कीमतें आसमान छू सकती हैं.

क्या हो सकता है बचाव और समाधान का रास्ता?
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) की रिपोर्ट कहती है कि देश के 57% जिले 'हाई हीट रिस्क' पर हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि अब केवल 'हीट एक्शन प्लान' कागजों पर रखने से काम नहीं चलेगा. इसके लिए ठोस कदम उठाने होंगे.
- काम के घंटों में बदलाव: दोपहर 12 से 3 बजे के बीच अनिवार्य ब्रेक और वेतन सुरक्षा.
- इंफ्रास्ट्रक्चर: कार्यस्थलों पर रिफ्लेक्टिव रूफिंग (सफेद छतें) और बेहतर वेंटिलेशन.
- बीमा और सुरक्षा: गर्मी से होने वाले आय के नुकसान के लिए अनौपचारिक मजदूरों के लिए विशेष सामाजिक सुरक्षा योजनाएं.
बढ़ते बिल्डिंग्स, कंक्रीट और बढ़ती गाड़ियों के कारण शहर दिन की गर्मी को सोख लेते हैं और रात में उसे छोड़ते हैं. इसे 'अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट' कहते हैं, जिसका परिणाम ये है कि टायर-2 और टायर-3 शहरों में भी रातें ठंडी नहीं हो रही हैं. मजदूरों और कम आय वाले लोगों को रात में भी पर्याप्त आराम नहीं मिल पा रहा और उनकी कार्यक्षमता (Productivity) प्रभावित हो रही है.
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