क्या होगा अगर कोई सुबह उठते ही मोबाइल फोन को हाथ न लगाए और बाकी कामों में लग जाय? 32 साल के आईटी प्रोफेशनल कपिल शर्मा ने कुछ ऐसा ही किया. वे पिछले 9 साल से आईटी सेक्टर में काम कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि मेरी जिंदगी बिल्कुल वही थी जो आजकल ज्यादातर लोगों की है, रात देर तक लैपटॉप, सुबह उठते ही मोबाइल और दिनभर स्क्रीन के बीच फंसी हुई जिंदगी. सुबह अलार्म बजते ही मेरा हाथ सबसे पहले मोबाइल पर जाता था. व्हाट्सऐप, मेल, LinkedIn, न्यूज सब कुछ चेक किए बिना मुझे लगता था कि दिन शुरू ही नहीं हुआ. लेकिन सच कहूं तो, दिन शुरू होने से पहले ही मेरी एनर्जी खत्म हो जाती थी. ऐसा लगता था जैसे मैं अपनी सुबह किसी और को दे चुका हूं, उन मैसेजेस को, उन नोटिफिकेशन्स को, जिनका मेरे असली जीवन से कोई खास लेना-देना नहीं था.
वो पल जिसने मुझे झकझोर दिया
कपिल ने बताया कि एक दिन वे ऑफिस में बैठे थे, स्क्रीन के सामने… लेकिन दिमाग कहीं और था. काम था, लेकिन फोकस नहीं था. ऊपर से चिड़चिड़ापन, थकान और अजीब सी बेचैनी. उन्होंने कहा कि मैं मीटिंग में बैठा था, पर ध्यान मोबाइल की तरफ जा रहा था. हर 10-15 मिनट में नोटिफिकेशन चेक करने की आदत बन चुकी थी और उस दिन मुझे पहली बार महसूस हुआ कि मैं अपने काम में नहीं, बल्कि डिस्ट्रैक्शन में जी रहा हूं.
तभी मैंने खुद से एक सवाल पूछा -

शुरुआत आसान नहीं थी...
कपिल ने बताया कि, पहले 2-3 दिन तो ऐसा लग रहा था जैसे कुछ छूट गया हो. बार-बार मन करता था कि नोटिफिकेशन देख लूं. ऐसा लगता था जैसे दुनिया में कुछ बड़ा हो गया होगा और मुझे पता नहीं. मैं बार-बार घड़ी देखता, फिर मोबाइल उठाने का मन करता, लेकिन खुद को रोकता. ये एक तरह की मेंटल फाइट थी, मेरे पुराने हैबिट्स और नए फैसले के बीच.
उन्होंने कहा कि,

फिर धीरे-धीरे बदलाव शुरू हुआ…
1. सुबह अब मेरी होने लगी
पहले दिन की शुरुआत दूसरों के मैसेज से होती थी, अब मेरी सोच से होने लगी. मैंने सुबह बैठकर सिर्फ 10–15 मिनट खुद के साथ बिताना शुरू किया, कभी चाय के साथ, कभी बस खामोशी में. इस छोटे से बदलाव ने मुझे ये एहसास कराया कि सुबह का समय सबसे पवित्र और सबसे शक्तिशाली होता है. जब आप उस समय को बिना किसी डिस्ट्रेक्शन के बिताते हैं, तो आप दिन की शुरुआत क्लियरिटी और कंट्रोल के साथ करते हैं, ना कि कन्फ्यूजन और जल्दबाजी के साथ.
2. दिमाग हल्का और साफ लगने लगा
पहले उठते ही दिमाग में 100 चीजें घुस जाती थीं, न्यूज, मैसेजेस, सोशल मीडिया, ऑफिस की टेंशन… लेकिन जब मैंने मोबाइल हटाया, तो दिमाग को एक तरह का डिजिटल ब्रेक मिलने लगा. सुबह अब ओवरलोड नहीं होता था, बल्कि एक साफ स्लेट की तरह लगता था. इसका असर ये हुआ कि मैं अपने विचारों को बेहतर तरीके से समझने लगा और दिनभर कम स्ट्रेस महसूस करने लगा.
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3. फोकस में जबरदस्त सुधार आया
ऑफिस में मैंने नोटिस किया कि जो काम पहले 2-3 घंटे में होता था, अब 1-1.5 घंटे में हो रहा है. क्योंकि अब मेरा दिमाग सुबह से ही बिखरा हुआ नहीं होता था. पहले मैं काम शुरू करने से पहले ही थक जाता था, लेकिन अब मैं फ्रेश माइंड के साथ काम करता था. इससे प्रोडक्टिविटी तो बढ़ी ही, साथ ही काम में सेटिस्फेक्शन भी आने लगा.
4. मूड और बिहेवियर बदल गया
पहले छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाता था, कभी ट्रैफिक, कभी ऑफिस का प्रेशर, कभी लोगों की बातें… लेकिन जब सुबह शांत होती है, तो उसका असर पूरे दिन के बिहेवियर पर पड़ता है. अब मैं सिचुएशन्स को रिएक्ट करने के बजाय समझने लगा. सब्र बढ़ गया और बेवजह तनाव कम हो गया.
5. मैंने खुद को फिर से महसूस किया
सबसे बड़ा बदलाव ये था कि मैंने खुद से बात करना शुरू किया. पहले मेरा दिमाग दूसरों की जानकारी से भरा रहता था, किसने क्या पोस्ट किया, किसने क्या कहा… लेकिन अब उसमें मेरे खुद के विचार आने लगे. मैंने सोचना शुरू किया कि, मैं क्या चाहता हूं, मेरी प्राथमिकता क्या हैं और मैं अपनी जिंदगी को किस दिशा में ले जाना चाहता हूं. ये क्लियरिटी पहले कभी नहीं मिली थी.
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15 दिन बाद जो समझ आया…

मेरा नया नियम जो मैं आज भी फॉलो करता हूं-
- उठते ही मोबाइल नहीं.
- पहले पानी, फिर खुद के साथ 15-20 मिनट
- हल्की एक्सरसाइज या शांत बैठना
- उसके बाद ही दुनिया से जुड़ना
इसके अलावा मैंने ये भी तय किया कि रात को सोने से पहले भी मोबाइल कम इस्तेमाल करूं, ताकि सुबह उठना और आसान हो सके. हम सोचते हैं कि मोबाइल हमें कनेक्टेड रखता है, लेकिन सच ये है कि वो हमें खुद से डिसकनेक्टेड कर देता है.
(कपिल शर्मा, एक आईटी प्रोफेशनल, जिन्होंने सिर्फ सुबह की एक आदत बदलकर अपनी पूरी सोच बदल दी)
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