देश की एक बड़ी आबादी जो रोजी-रोजगार के लिए बड़े शहरों का रुख करती है, उसे वर्षों की नौकरी के बाद अपना एक घर लेने में कई बार जीवन भर की जमा-पूंजी लग जाती है. डाउन पेमेंट में मोटी राशि और फिर होम लोन की किस्त. इतने के बावजूद घर खरीदारों की एक बड़ी संख्या ऐसी हैं, जो फ्लैट की चाबी पाने के लिए या तो वर्षों तक इंतजार करती रहती है या फिर कई बार तो खाली हाथ रहना पड़ता है और मोटा पैसा सालों-साल अटका रहता है. होमबायर्स संगठन FPCE की 192 पन्नों की ताजा रिपोर्ट में जो आंकड़े सामने आए हैं, वो जानकर कोई भी चौंक जाएगा.
रिपोर्ट के मुताबिक, वजह चाहे जो भी हो, लेकिन देशभर के करीब 27.6 लाख खरीदारों का पैसा बिल्डर्स के पास फंसा हुआ है. प्रति खरीदार औसतन 45 लाख रुपये के हिसाब से कुल रकम 12.44 लाख करोड़ रुपये पहुंच जाती है. NDTV इंडिया से बातचीत में अंसल हाउसिंग के डायरेक्टर कुशाग्र अंसल इतनी बड़ी रकम फंसी होने के पीछे RERA कानूनों के क्रियान्वयन में कमी को एक बड़ी वजह बताते हैं.
FPCE ने अपनी रिपोर्ट में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के RERA ट्रैकर डेटा के आधार पर ये अनुमान लगाया है. ये आंकड़े 2 मार्च 2026 तक के हैं. आज 10 सितंबर 2026 तक हो सकता है, ये रकम और ज्यादा हो गई हो.

बता दें कि RERA यानी रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 के 10 साल पूरे होने पर होमबायर्स संगठन 'फोरम फॉर पीपल्स कलेक्टिव एफर्ट्स' (FPCE) ने 'RERA एक्सटेंशन एब्यूज: हाउ रेगुलेटरी फेलियर इज बेट्रायिंग इंडियाज होमबायर्स' शीर्षक से 192 पन्नों की ये रिपोर्ट जारी की है.
संसद ने होमबायर्स के लिए बनाया था कानून, लेकिन...
संसद ने घर खरीदारों और बिल्डर्स के बीच आपसी समझौतों को रेगुलेट करने के लिए ये कानून बनाया था. RERA का उद्देश्य रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करना है, ताकि घर खरीदारों के साथ अन्याय न हो. FPCE का कहना है कि RERA फेल नहीं है, लेकिन इसका क्रियान्वयन सही से नहीं हो पा रहा. राज्यों के RERA रियल एस्टेट कानून का ठीक से पालन कराने में नाकाम रहे हैं.
192 पन्नों की रिपोर्ट पर एक्सपर्ट ने क्या उपाय बताए
FPCE के प्रेसिडेंट अभय उपाध्याय ने कहा, 'एक कानून के रूप में RERA असफल नहीं हुआ है, बल्कि इसका क्रियान्वयन (एनफोर्समेंट) विफल रहा है. और जब एनफोर्समेंट कमजोर होता है, तो सबसे मजबूत कानून भी असल में नाकाम हो जाता है.' उपाध्याय ने इस रिपोर्ट को 'कमियों को सुधारने की एक कोशिश' बताया है, ताकि RERA को उसी अनुशासन, जवाबदेही और मूल उद्देश्य के साथ लागू किया जा सके जिसके लिए इसे बनाया गया था.
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कानून के मुताबिक, प्रमोटर्स (बिल्डर्स) को प्रोजेक्ट से जुड़ी सभी जरूरी जानकारियां और मंजूरियां सार्वजनिक करनी होती हैं. उन्हें घर खरीदारों से मिलने वाली रकम का 70 प्रतिशत हिस्सा एक अलग बैंक खाते में जमा करना भी अनिवार्य है, जिसका इस्तेमाल केवल जमीन की लागत और प्रोजेक्ट के निर्माण के लिए ही किया जा सकता है.
अंसल हाउसिंग के डायरेक्टर कुशाग्र अंसल ने कहा कि ये रिपोर्ट उन्होंने भी पढ़ी है. उपायों के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि RERA का ही पूरा फेल्योर नहीं है. RERA ने भारतीय रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता, जवाबदेही और ग्राहक-केंद्रितता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हालांकि, किसी भी कानून की सफलता केवल उसके प्रावधानों पर नहीं, बल्कि उसके समान और प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है.'
उपायों को लेकर उन्होंने कहा कि राज्यों में RERA की कार्यप्रणाली, लंबित मामलों के त्वरित निपटारे और समयबद्ध परियोजना पूर्णता पर और ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. अंसल का मानना है कि हर बार डेवलपर ही गलत नहीं होते. वे कहते हैं, 'ऐसे प्रोजेक्ट्स जहां वास्तविक और वैध कारणों से देरी हुई है, वहां सभी स्टेकहोल्डर्स के हितों को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक समाधान तलाशना जरूरी है.'

डेवलपर समुदाय का मानना है कि मजबूत नियामकीय व्यवस्था और जिम्मेदार डेवलपमेंट प्रैक्टिस मिलकर होमबायर्स का विश्वास और मजबूत कर सकते हैं. उद्योग और नियामकों के बीच बेहतर समन्वय, स्पष्ट प्रक्रियाएं और समयबद्ध निर्णय न केवल खरीदारों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे, बल्कि रियल एस्टेट सेक्टर के दीर्घकालिक और टिकाऊ विकास को भी गति देंगे.
पुख्ता सबूतों के आधार पर बनाई गई रिपोर्ट
उपाध्याय ने आगे कहा, 'क्योंकि घर खरीदार के लिए यह सिर्फ नियम-कानून का मामला नहीं है. यह उनकी जीवन भर की जमापूंजी, आशियाने और सुरक्षा का सवाल है. इसमें सुधार की जरूरत सिर्फ किताबी नहीं है, बल्कि बहुत तात्कालिक है.'
FPCE ने बताया कि इस रिपोर्ट के निष्कर्ष पुख्ता सबूतों पर आधारित हैं- जिन्हें कई राज्यों के RERA प्राधिकरणों के आधिकारिक रिकॉर्ड, एक्सटेंशन ऑर्डर, नियामक फाइलिंग और दर्ज फैसलों से लिया गया है.
...तो फिर दिक्कतें कहां हैं?
RERA के क्रियान्वयन में कई कमियों की ओर इशारा करते हुए संगठन ने कहा कि प्रोजेक्ट्स की डिलीवरी के लिए समयसीमा (एक्सटेंशन) बढ़ाने से पहले कानूनी शर्तों की ठीक से जांच नहीं की जा रही है.
FPCE ने कहा कि देरी से निपटने के बजाय उसे रेगुलराइज कर दिया जाता है और कड़ाई से पालन कराने की जगह प्रशासनिक नरमी बरती जाती है.
उपाध्याय ने आगे कहा, 'नियामक प्रक्रिया (रेगुलेटरी प्रोसेस), रोक लगाने का काम करने के बजाय एक ऐसा जरिया बन गई है जिससे देरी को ही आधिकारिक रूप दे दिया जाता है.'
उन्होंने कहा कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अटके हुए हाउसिंग प्रोजेक्ट्स से जुड़े कई मामलों में नियामक प्रणालियों के कामकाज पर कड़ी टिप्पणियां की हैं.
बता दें कि FPCE केंद्रीय सलाहकार परिषद (CAC) का सदस्य है, जो इस अधिनियम की धारा 41 के तहत बनाई गई एक राष्ट्रीय सलाहकार संस्था है.
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