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Success Story: बिहार की 'किसान चाची' की कहानी, साइकिल से पद्मश्री और लाखों के अचार बिजनेस का सफर

बिहार के मुजफ्फरपुर की किसान चाची यानी राजकुमार देवी ने तंगहाली से निकलकर साइकिल पर अचार बेचा और आज हजारों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर पद्मश्री से सम्मानित बिजनेस आइकन बनीं. जानिए उनकी सफलता की कहानी.

Success Story: बिहार की 'किसान चाची' की कहानी, साइकिल से पद्मश्री और लाखों के अचार बिजनेस का सफर
बिहार की किसान चाची ने अपनी लगन और मेहनत से अचार का लोकर ब्रांड तैयार किया.
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जब हौसला और कुछ कर गुजरने की चाह हो, तो उम्र या पारिवारिक समस्याएं कभी आड़े नहीं आतीं. इस बात को सच कर दिखाया है बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की रहने वाली राजकुमार देवी ने, जिन्हें आज पूरी दुनिया किसान चाची के नाम से जानती है. एक सिंपल होममेकर से लेकर राष्ट्रपति के हाथों पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित होने तक का उनका ये सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. लेकिन इस कहानी की खास बात है उनका कमाल का बिजनेस और आंत्रप्रेन्योरशिप का माइंडसेट. राजकुमारी देवी ने मार्केटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन के लिए ऐसा नया तरीका सोचा कि आज उन्होंने साइकिल पर अचार बेचते-बेचते बड़ा कारोबार खड़ा कर दिया. 

मजबूरी को बनाया बिजनेस का जरिया

राजकुमार देवी का शुरुआती जीवन बहुत मुश्किल भरी रही. शादी के बाद घर की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी. पति की बेरोजगारी के बीच परिवार को आगे बढ़ाने की सोच ने उन्हें कुछ अलग सोचने पर मजबूर किया. उन्होंने कई सालों से चली आ रही खेती से हटकर कुछ नया करने का रिस्क लिया. साल 1990 के समय, जब गांव की महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी बड़ी बात माना जाता था, तब उन्होंने अपने घर की बाड़ी में खाली पड़ी जमीन पर सब्जी और फल उगाने की शुरुआत की.

इसके बाद उन्हें लगा केवल कच्ची सब्जियां बेचने से ज्यादा पैसा नहीं कमाया जा सकता क्योंकि वो जल्दी खराब हो जाती हैं. यहीं से उनके अंदर के असली बिजनेसमैन का जन्म हुआ. उन्होंने वैल्यू एडिशन को समझा और बची हुई सब्जियों और फलों से अचार और मुरब्बा बनाना शुरू किया.

मार्केटिंग का अनोखा अंदाज

किसी भी नए बिजनेस या स्टार्टअप के लिए सबसे बड़ी चुनौती मार्केटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन को लेकर होती है. किसान चाची के पास ना तो कोई बड़ा बजट था और ना ही कोई दुकान. उन्होंने खुद ही अपने प्रोडक्ट की ब्रांडिंग और मार्केटिंग करने का फैसला किया. वो साइकिल पर अचार के डिब्बे लादकर आस-पास के गांवों और बाजारों में बेचने निकल पड़ीं. शुरुआत में लोगों ने ताने मारे, लेकिन उनके आचार का कमाल का स्वाद और उनकी मेहनत रंग लाने लगी. इसके बाद धीरे-धीरे चाची के हाथ का आचार एक लोकल ब्रांड बन गया.

कम लागत में बड़ा मुनाफा

राजकुमार देवी का बिजनेस मॉडल पूरी तरह से लो-कॉस्ट, हाई-प्रॉफिट और लोकल रिसोर्सेज पर बेस्ड है. उन्होंने अपने इस छोटे बिजनेस को आनंदपुर कृषि फॉर्म का नाम दिया. जब मार्केट में डिमांड तेजी से बढ़ी, तो उन्होंने अकेले काम करने के बजाय गांव की दूसरी जरूरतमंद महिलाओं को अपने साथ जोड़ना शुरू किया. उन्होंने महिलाओं को अचार, मुरब्बा, जैम और जेली बनाने की ट्रेनिंग दी. आज उनके इस बिजनेस मॉडल से 4,000 से ज्यादा महिलाएं जुड़ी हुई हैं, जो खुद आत्मनिर्भर बनकर अपने परिवार का सहारा बन रही हैं. किसान चाची ने ना सिर्फ खुद को एक आंत्रप्रेन्योर बनाया, बल्कि एक पूरा सेल्फ-हेल्प ग्रुप नेटवर्क खड़ा कर दिया, जो कॉर्पोरेट कंपनियों की सप्लाई चेन की तरह काम करता है.

पद्मश्री से मिला सम्मान

उनके इस अनोखे बिजनेस विजन को देखते हुए भारत सरकार ने साल 2019 में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाजा. इसके अलावा उन्हें और कई मंचों पर सम्मानित किया जा चुका है. आज वो देश के बड़े मैनेजमेंट संस्थानों और विश्वविद्यालयों में जाकर युवाओं को गांव के बिजनेस और आंत्रप्रेन्योरशिप के गुर सिखाती हैं. किसान चाची राजकुमार देवी की सक्सेस स्टोरी ये साबित करती है कि एक सफल बिजनेस खड़ा करने के लिए किसी बड़े इन्वेस्टमेंट या फैंसी डिग्री की नहीं, बल्कि एक सही विजन, बाजार की समझ की जरूरत होती है.

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