देश के जाने-माने दिग्गज कारोबारी और वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल (Anil Agarwal) इन दिनों कठिन दौर से गुजर रहे हैं. बेटे अग्निवेश की मौत के बाद उन्होंने जो एक पोस्ट लिखी, वो बेहद भावुक कर देने वाला है, जिसमें उन्होंने कुछ ऐसा लिखा कि 'एक बेटा, पिता से पहले कैसे दुनिया छोड़ सकता है!' 7 जनवरी, बुधवार का दिन उनके जीवन का सबसे काला दिन साबित हुआ, जब न्यूयॉर्क में स्कीइंग के दौरान घायल हुए बेटे अग्निवेश ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया और इसी के साथ टूट गए, एक पिता के कई सपने, कई उम्मीदें, छूट गईं कई सारी कहानियां, कई सारे काम, जो पिता-पुत्र को साथ-साथ करना था. पहले से ही सादगी भरा जीवन जी रहे पिता अनिल अग्रवाल ने कहा, अब वे और सादगीपूर्ण तरीके से जीवन गुजारेंगे. जो भी कमाएंगे, उसका 75 फीसदी हिस्सा समाज को समर्पित कर देंगे.
अनिल अग्रवाल का पूरा जीवन भावुक कहानियों से भरा पड़ा है. संघर्षों से जूझते हुए उन्होंने एक मुकाम हासिल किया. ये कहानियां, ऐसे इंसान की है, जो हमेशा जमीन से जुड़ा रहा, जिसने गरीबी देखी, संघर्ष देखा, लेकिन तमाम बाधाओं के बीच भी उसने हार नहीं मानी. उनकी सफलता के पीछे उसकी लगन, उसकी पत्नी का अटूट साथ और देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा रहा.

अनिल अग्रवाल के जीवन की ऐसी कहानियां आपकी आंखें नम कर देंगी. आइए उनके जीवन के कुछ ऐसे ही किस्सों से होकर गुजरते हैं.
पत्नी की धमकी और सादगी भरा प्यार
ये उस जमाने की बात है, जब अनिल अग्रवाल की शादी नहीं हुई थी. उन्होंने अपनी होने वाली पत्नी किरण को कभी ठीक से देखा भी नहीं था. उनकी सगाई हो गई थी, लेकिन उस जमाने में मिलने-जुलने का चलन नहीं था. इसलिए उन्होंने पता लगाया कि वो सुबह 8:30 बजे स्कूल जाती हैं. तब वह घूमते-घूमते उस रास्ते से निकले, ताकि उन्हें देख सकें. एक लड़की लाल स्कर्ट-व्हाइट शर्ट पहने, हाथ में बस्ता लिए जा रही थी. बस आगे से उसे देख लिया. शादी से पहले एक बार मौका मिलने पर किरण ने उनसे कहा, 'देखो, अगर हमको हाथ लगाए ना, तो हम एक हाथ से ईंट तोड़ देंगे.' अनिल अग्रवाल ने कहा, 'हम हाथ नहीं लगाएंगे.' यह सुनकर वह मान गईं. ये उस दौर में एक सादगी भरा, ईमानदार और समझदारी भरा रिश्ता था, जो आज तक कायम है.

संघर्ष के दिनों में पत्नी का साथ
1976 से 1986 तक का दौर अनिल अग्रवाल के लिए बहुत मुश्किल भरा था. उस समय किरण हमेशा उनका साथ देती थीं. चाहे रात के 2 बज जाए, वो खुद तब तक खाना नहीं खाती थीं, जब तक अनिल घर नहीं आ जाते. अनिल अग्रवाल बताते हैं कि वह थाली लेकर इंतजार में बैठी रहती थीं और दोनों साथ बैठकर खाना खाते थे.
पैसे पर कंट्रोल और साधारण जीवन
अग्रवाल बताते हैं कि आज भी उनकी पत्नी उन्हें रोज के खर्च के लिए सिर्फ 200 पाउंड देती हैं, जिसमें से भी वह सिर्फ 100 पाउंड खर्च करते हैं. वह कहते हैं, 'ये एक अंकुश है और यह अच्छा है.' उनके पास अपनी सैलरी के अलावा कुछ नहीं है, और वह उसी से सारी इच्छाएं पूरी करते हैं. वह मानते हैं कि पैसा सिर्फ एक बाय-प्रोडक्ट है, असली मकसद तो अच्छा काम करना है.
मुंबई में शुरुआती दिनों की मुश्किलें
अनिल अग्रवाल जब मुंबई पहुंचे, तो रिश्तेदारों ने साथ नहीं दिया. उन्हें कालबादेवी में 27 रुपये में एक बेड मिला, जहां 7 बेड लगे थे. वहीं अपना लोहे का बक्सा नीचे रखकर वो सो जाया करते. रात दो-तीन बजे गलियों में पाव-भाजी खाने का आनंद और भीड़ में धक्का खाने का अनुभव... ये सब उनके लिए नया था.
पहली फैक्ट्री खरीदने के लिए पैसे जुटाना
शमशेर स्टर्लिंग (Shamsher Sterling Corporation) नाम की दिवालिया कंपनी खरीदने के लिए उन्हें 5 लाख रुपये चाहिए थे. कुछ तो उनके पिता ने दिए, रसिक भाई (एक दोस्त) ने मदद की और मामा से 1.25 लाख रुपये लिए. इस तरह जुटाए पैसों से उन्होंने वह फैक्ट्री खरीदी, जिसने उनकी तकदीर बदल दी.
धीरूभाई से मिलने की जिद
वह धीरूभाई अंबानी से मिलना चाहते थे. पता लगा कि वह ब्रेबोर्न स्टेट्स के हेल्थ क्लब में जाते हैं. किसी तरह एंट्री पाई और एक कोने में चुपचाप बैठ गए. जब मौका मिला, तो उन्होंने एक बिहारी चुटकुला सुनाया. धीरूभाई और अन्य लोगों को अच्छा लगा और उन्होंने कहा, 'कल फिर आना.' इस तरह उनकी एंट्री हो गई.
लंदन में लिस्टिंग के लिए अटल जी से मदद
अनिल अग्रवाल की कंपनी को लंदन में लिस्टिंग के लिए भारत सरकार से एक 'क्लीन चिट' चाहिए थी. कोई सुन नहीं रहा था. आखिरकार वो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पास पहुंचे. उन्हें विश्वास दिलाया कि वह भारत में भारी निवेश लाएंगे. अटल जी ने वित्त मंत्री जसवंत सिंह से कहा, 'इस लड़के की मदद करनी चाहिए.' इस तरह मदद मिली और उन्होंने लंदन में 30-35 बिलियन डॉलर जुटाए.
तूतीकोरिन कॉपर प्लांट का सपना और विवाद
अनिल अग्रवाल के मन में एक विचार आया, 'हम कॉपर आयात क्यों करते हैं? हम खुद क्यों नहीं बना सकते?' ये सुनकर कई लोगों को लगा, ये क्या पागलपन है. तब 15 लोगों ने नौकरी छोड़ दी. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. तूतीकोरिन में प्लांट लगाया. हालांकि कुछ लोगों ने इसे बंद कराने की कोशिश की और प्रदूषण का मुद्दा उठाकर विवाद खड़ा किया. लेकिन आखिरकार ये देश के लिए एक राष्ट्रीय संपत्ति बन गया.

बचपन का सपना और विनम्र शुरुआत
वह बचपन में अखबार में पढ़ते थे कि जेआरडी टाटा, जीडी बिरला ने कंपनियां खरीदी हैं. तब वह मन ही मन कहते थे, 'हम भी एक दिन ऐसा करके दिखाएंगे.' वो हिल्टन होटल में 70 पाउंड देकर ठहरते, ताकि फोन पर कह सकें, 'मैं लंदन के हिल्टन से बोल रहा हूं.' इससे विश्वास बढ़ता था.
परिवार और देश के प्रति प्रेम
अनिल अग्रवाल कहते हैं, 'यह देश ही मेरा घर है, मैं यहीं रहूंगा.' उनका सपना है कि भारत की कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बने. साथ ही, वह 'नंद घर' प्रोजेक्ट के जरिए 8 करोड़ बच्चों और महिलाओं को सशक्त बनाना चाहते हैं. उनका लक्ष्य भारत में एक विश्वस्तरीय यूनिवर्सिटी बनाना है, ताकि भारत के बच्चों को विदेश न जाना पड़े.

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