विश्व पुस्तक दिवस के मौके पर उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों से एक साफ तस्वीर सामने आती है. पहाड़ के गांवों और कस्बों में पढ़ने-लिखने की संस्कृति को फिर से जीवित करने के लिए लगातार प्रयास हो रहे हैं. सिटीजन लाइब्रेरी, पुस्तकालय गांव, दून लाइब्रेरी और स्थानीय समूहों की पहल अब किताबों को समाज के केंद्र में ला रही है.
डोईवाला में सिटीजन लाइब्रेरी: गांव के बच्चों के लिए नया सहारा
डोईवाला के थानो क्षेत्र में शुरू हुई 'जिए पहाड़ सिटीजन लाइब्रेरी' गढ़वाल की पहली और उत्तराखंड की 22वीं सिटीजन लाइब्रेरी है. इस पहल का उद्देश्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र-छात्राओं को उनके अपने क्षेत्र में ही संसाधन उपलब्ध कराना है.
इस अभियान की शुरुआत टनकपुर चम्पावत से हुई थी, जहां पूर्व उपजिलाधिकारी हिमांशु कफल्टिया ने इसकी नींव रखी. अब यह पहल 22 पुस्तकालयों तक पहुंच चुकी है. समिति के समन्वयक अनिल चौधरी ने बताया कि लक्ष्य छोटे कस्बों और गांवों तक पुस्तकालय स्थापित करना है.
सिटीजन लाइब्रेरी के माध्यम से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को भी मजबूत किया जा रहा है. IIT, NEET, JEE, UPSC, SSC, IBPS, RRB, CLAT जैसी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सामग्री और मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है.
किताबों पर ऑनलाइन चर्चा
इन दिनों पिथौरागढ़ में रहने वाले IIT दिल्ली के एलुमिनी लव कुश कुमार साप्ताहिक ऑनलाइन पुस्तक चर्चा का संचालन करते हैं. इस चर्चा में प्रतिभागी अपनी पढ़ी हुई किताबों पर बात करते हैं. चर्चा में यह बताया जाता है कि किताब में क्या अच्छा लगा, उससे क्या सीखा और दूसरों को क्यों पढ़नी चाहिए. इस तरह पढ़ना एक साझा अनुभव में बदल रहा है और अलग-अलग जगहों के पाठक एक मंच पर जुड़ रहे हैं. लव कुश कहते हैं कि पिथौरागढ़ में पढ़ाई-लिखाई का माहौल बनाने के लिए लंबे समय से प्रयासरत शिक्षक महेश पुनेठा ने उन्हें इस काम के लिए प्रेरित किया है.

'जिये पहाड़ सिटीजन लाइब्रेरी'की शुरुआत चम्पावत के टनकपुर में एक सरकारी अधिकारी ने की थी. अब तक ऐसे 22 पुस्तकालय खुल चुके हैं.
मणिगुह का पुस्तकालय गांव
रुद्रप्रयाग जिले के मणिगुह गांव में 'गांव घर फाउंडेशन' के सुमन मिश्रा, बीना नेगी, आलोक सोनी और राहुल रावत ने मिलकर 'पुस्तकालय गांव' की शुरुआत की. यहां दस हजार से अधिक किताबों का संग्रह तैयार किया गया है.cपुस्तकालय को गांव की पहचान से जोड़ने के लिए 'पुस्तकालय मंदिर' बनाए गए. इन मंदिरों की जिम्मेदारी गांव की लड़कियों को दी गई. इससे गांव में किताबों के प्रति सम्मान और जुड़ाव बढ़ा है. यहां कंप्यूटर, ऑनलाइन अंग्रेजी कक्षाएं और स्मार्ट क्लास की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है. गांव के बच्चों को अब शिक्षा के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता.
देहरादून की दून लाइब्रेरी
देहरादून स्थित दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र को प्रोफेसर बीके जोशी, चंद्रशेखर तिवारी, सुरजीत किशोर दास और एम रामचंद्रन के निर्देशन में विकसित किया गया. यह संस्थान पढ़ने के साथ-साथ विमर्श का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है. यहां विषय विशेषज्ञों के व्याख्यान, गोष्ठियां, पुस्तक समीक्षा, प्रदर्शनी और फिल्म फेस्टिवल आयोजित किए जाते हैं. वर्ष 2007 से 2026 के बीच 250 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं. पुस्तकालय के चद्रशेखर तिवारी बताते हैं कि शहर से कई लोग यहां हर कार्यक्रम में हमेशा शामिल होते हैं, दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों से भी लोग कार्यक्रमों में शामिल होने पुस्तकालय पहुंचते हैं.
वहीं पौड़ी क्षेत्र में दगड्या ग्रुप के फाउंडर आशीष नेगी पिछले आठ साल से बच्चों के साथ शिक्षा और संस्कृति पर काम कर रहे हैं. उनके द्वारा बच्चों को किताबें उपलब्ध करवाने के साथ ही थिएटर, आर्ट और फिल्म फेस्टिवल जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं.
चामी गांव में अरुण कुकसाल ने 'चामी टीनएजर्स क्लब' की शुरुआत की. इसमें रिंकी बिष्ट बच्चों को पढ़ाती हैं. यहां बच्चों के लिए किताबें, कंप्यूटर और पढ़ाई की सुविधा उपलब्ध कराई गई है. करीब 50 बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी इस पहल के माध्यम से उठाया जा रहा है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)