देश की जरूरत पूरा करने से पहले टीके निर्यात क्यों किए गए?

मोदी जी हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेज दिया? इतनी सी बात पोस्टर पर लिख देने से जेल हो गई. 27 मार्च को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में भारत के प्रतिनिधि ही कह रहे हैं कि जितना देश के लोगों को टीका नहीं दिया उससे ज्यादा विदेश के लोगों को दे दिया. यही सवाल तो पोस्टर वाले ने पूछा है कि क्यों दिया?

ऑक्सीजन की सप्लाई कम होने से कितने लोग अस्पताल के भीतर तड़प कर मर गए. कोई जेल नहीं गया. दिल्ली के भी दो अस्पतालों में 37 लोग मर गए. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार गोवा के गोवा मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की आपूर्ति में बाधा से 80 से अधिक लोग मर गए. कोई जेल नहीं गया. दिल्ली में पोस्टर लगाने के जुर्म में 25 लोग जेल चले गए. दिल्ली पुलिस ने 25 FIR कर दी है. उन लोगों को गिरफ्तार कर लिया जिनकी एक साल के दौरान कमाई कम हो गई है. जिनकी दिहाड़ी बंद हो गई है. जिन्हें लगा कि पोस्टर लगाने से कुछ पैसे मिल जाएंगे. इंडियन एक्सप्रेस में गिरफ्तार हुए लोगों का ब्यौरा छपा है.

मोदी जी हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेज दिया? इतना ही लिखा है इस पोस्टर में. लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को विकृत करने के आरोप में मामला दर्ज हो गया और गिरफ्तारियां हो गईं. ऐसी खबरों को देखकर आप थोड़ा और डरे होंगे कि लोग भले तड़प कर मर गए, बोलना नहीं है चुप रहना है. आप डरते आ रहे थे और आप डरते रहेंगे. आपके डरने से एक फायदा होगा. जेलें नहीं भरेंगी. इतने लोगों को जेल में भरना आसान नहीं तो आप घर में डर से दुबक कर सरकार की मदद कर रहे हैं. अपने घर को ही जेल समझिए. do you get my point.

राजनीतिक दलों में आम आदमी पार्टी ने सबसे पहले विदेशों में टीका भेजने को लेकर सवाल उठाया और प्रधानमंत्री को पत्र तक लिखा. दूसरे दल भी उठाने लगे. लेकिन गिरफ्तारी का विरोध करने में कांग्रेस आगे निकल गई.

रविवार को इस गिरफ्तारी के बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा, कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस पोस्टर को ट्वीट किया और कहा कि हमें भी गिरफ्तार करो. कई नेताओं ने तो इस पोस्टर को अपने प्रोफाइल पिक्चर में ही लगा लिया है. साथ ही कई आम लोगों ने भी ट्वीट किया है कि हमें गिरफ्तार करो. अभी तक इनमें से किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है. रविवार शाम को आम आदमी पार्टी ने एक बयान जारी किया और कहा ऐसे और पोस्टर छपवाएंगे. क्या वाकई में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दिल्ली में ऐसे पोस्टर छाप कर लगाने का साहस करेगी? 

मोदी जी हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेज दिया? इतनी सी बात पोस्टर पर लिख देने से जेल हो गई. 27 मार्च को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में भारत के प्रतिनिधि ही कह रहे हैं कि जितना देश के लोगों को टीका नहीं दिया उससे ज्यादा विदेश के लोगों को दे दिया. यही सवाल तो पोस्टर वाले ने पूछा है कि क्यों दिया? 14 मई के प्राइम टाइम में हमने इसके बारे में विस्तार से बताया है. यू ट्यूब पर आप देख सकते हैं.

वैसे भी इसमें वाहवाही लूटने वाली कोई बात तो नहीं थी कि हमने अपने लोगों के लिए कम दूसरों के लिए ज़्यादा टीके भेजे हैं. 23 मार्च को सांसद भाजपा संभाजी छत्रपति के सवालों के जवाब में स्वास्थ्य राज्य मंत्री राज्य सभा में लिखित जवाब देते हैं. और सरकार की नीति बताते हैं. आप भी ग़ौर से सुनें. इससे पता चलेगा कि सरकार क्यों विदेशों को निर्यात कर रही थी या मदद कर रही थी. मंत्री जी कहते हैं कि ' किसी भी स्थानीय बीमारी के महामारी का रूप लेने पर, सम्पूर्ण विश्व को एक इकाई के तौर पर मानते हुए इसका प्रबंधन करना होता है और अधिकांश परिस्थितियों में किसी राज्य विशिष्ट अथवा देश विशिष्ट दृष्टिकोण के साथ कार्य करना सम्भव नहीं होता है. अतः कोविड-19 वैक्सीन का निर्यात, जिससे टीकाकरण में विश्व स्तर पर सुविधा प्रदान होगी, और इसके साथ-साथ विश्व के सभी देशों में अत्यधिक जोखिम वाली आबादी को एक साथ सुरक्षित करने के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिससे कोविड-19 के संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ा जा सके और कोविड-19 के मामलों को दूसरे देशों के साथ-साथ भारत के पड़ोसी देशों से आने के अवसरों को न्यूनतम किया जा सके.'

स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे टीके को लेकर किए गए सवाल के लिखित जवाब में कह रहे हैं कि किसी देश या राज्य के नज़रिए से प्रबंध नहीं किया जा सकता. दुनिया की आबादी सात अरब है. मोदी सरकार एक करोड़ टीका लेकर कोरोना का ग्लोबल चेन तोड़ने निकली थी ये तो पता ही नहीं था. यह तो वैसे ही हुआ कि कोई समंदर में कील ठोंकने निकला हो. दुनिया के बड़े देश अपनी आबादी से अधिक टीका खरीद रहे थे. भारत की सरकार 30 करोड़ के लिए भी टीके का इंतज़ाम नहीं कर सकी है और एक करोड़ टीका लेकर ग्लोबल चेन ब्रेक करने के नज़रिए से काम कर रही थी. यही नहीं मंत्री जी कहते हैं कि 'कोविड-19 के मामलों को दूसरे देशों के साथ-साथ भारत के पड़ोसी देशों से आने के अवसरों को न्यूनतम किया जा सके. यानी दूसरे देश से संक्रमण भारत न आए इसलिए दूसरे देशों को टीका दिया जा रहा था. इस हिसाब से अश्विनी चौबे को सारा टीका लाद कर लंदन चले जाना चाहिए था. ताकि लंदन से कोविड का वायरस भारत न आ सके.

आप सीरीयस हैं न. Never joke and laugh while watching prime time. ये होती है नीति. इंडिया में कोरोना के चेन को तोड़ने की जगह दूसरे देशों के चेन को तोड़ रहे थे. मई महीने में सीरम इंस्टीट्यूट के अदार पूनावाला फाइनैंनशल टाइम्स से कहते हैं कि उन्हें कोई ऑर्डर ही नहीं मिला. हमने सोचा ही नहीं कि एक साल में एक अरब से ज़्यादा डोज़ बनाने होंगे. सबको लगा कि भारत ने कोविड को हरा दिया है. क्या पूनावाला सही कह रहे हैं कि कोई ऑर्डर नहीं था? अच्छी बात है कि इस सच को सामने लाने के आरोप में पुलिस ने पूनावाला को गिरफ्तार नहीं किया लेकिन दिल्ली में पोस्टरवाला जेल चला गया.

तो हम ग्लोबल चेन तोड़ने के लिए टीका बाहर भेज रहे थे लेकिन वायरस को अपने यहां समझने के लिए जो सिस्टम है उसको तोड़ रहे थे.

शाहिद जमील. 15 मई तक Indian SARS-COV-2 Genomics Consortia (Insacog) के प्रमुख थे. अपने पद से इस्तीफा दे दिया. यह कमेटी दिसंबर में बनी थी. रायटर्स में 3 मई को छपी ख़बर के अनुसार इस कमेटी ने भारत में फैले वायरस के बारे में चेतावनी मार्च के पहले हफ्ते में ही सरकार के चोटी के अधिकारियों को दे दी थी. ज़रूर चेतावनी की लिखित कापी होगी लेकिन भारत की जनता को कैसे मिलेगी? आपको याद होगा कि मार्च के ही पहले हफ्ते में स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने कहा था कि भारत में महामारी खत्म होने को है. तो क्या स्वास्थ्य मंत्री को जीनोम कमेटी की चेतावनी नहीं पहुंची. क्या लोगों की जान इतनी सस्ती हो गई है कि इन सब सवालों का ठोस जवाब न आए. बहरहाल शाहिद जमील ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.

मार्च में ही स्वास्थ्य मंत्री कह रहे थे कि अब महामारी खत्म होने के कगार पर है. शाहिद जमील ने जिस कमेटी की अध्यक्षता से इस्तीफा दिया है उसका काम है ये पता लगाना कि वायरस कहीं रूप बदल कर जानलेवा तो नहीं हो रहा है. उन्होंने इस्तीफे का कारण नहीं बताया लेकिन कहा जा रहा है कि मई महीने में न्यूयार्क टाइम्स में उन्होंने एक लेख लिखा जिसके कारण दबाव बनाया गया. इस वक्त जब लोग जानना चाहते हैं कि क्या वायरस और जानवेला हो जाएगा या कमज़ोर होगा, इन सबके बीच इसका पता लगाने वाले समूह के प्रमुख को इस्तीफा देना पड़ रहा है. 13 मई को शाहिद जमील ने न्यूयार्क टाइम्स में लिखा है कि 'वैज्ञानिक चाहते हैं कि तथ्यों के आधार पर नीति बने लेकिन उनकी बातें सुनी नहीं जा रही हैं. “scientists were facing stubborn resistance to evidence-based policy-making.” जलील लिखते हैं कि '30 अप्रैल को 800 वैज्ञानिकों ने प्रधानमंत्री से अपील की थी कि हमें डेटा दिया जाए जिसका हम अध्ययन कर सकें. बता सकें कि भविष्य में क्या होने वाला है और महामारी को रोका जा सके. लेकिन डेटा के आधार पर फैसले नहीं हो रहे हैं. इसलिए भारत में महामारी नियंत्रण से बाहर हो गई है. इस कारण लोगों की जो जानें जा रही हैं उसका सदमा स्थायी रूप से बना रहेगा.'

भारत के 800 वैज्ञानिक प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख रहे हैं कि हमें डेटा दिया जाए ताकि वायरस का अध्ययन कर सकें. अब तक इस पत्र पर 900 से अधिक वैज्ञानिकों ने दस्तखत किए हैं. पत्र लिखने वालों में पार्था मज़ूमदार भी हैं जिन्हें भारत में जीन गुरु कहा जाता है. जो नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल जेनोमिक्स के निदेशक हैं. जीन गुरु डेटा न मिलने की शिकायत कर रहे हैं? ज़ाहिर है इन वैज्ञानिकों को भी यही लगता होगा कि उनके सामने देश के लोग तड़प तड़प कर मर रहे हैं और वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं.

900 वैज्ञानिकों का पत्र लिखना क्या सामान्य घटना है? पत्र लिखने वाले वैज्ञानिकं में एल एस शशिधर भी हैं, जो इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस, एजुकेशन और रिसर्च में प्रोफेसर हैं. प्रोफेसर एल एस शशिधर इंटरनेशनल यूनियन आफ बायोलॉजिक साइंसेस के अध्यक्ष हैं. इस स्तर के लोगों को पत्र लिखना पड़ रहा है कि हमें डेटा दिया जाए ताकि हम बता सकें कि यह वायरस भविष्य में क्या रुख लेगा. इस पत्र में तो यह भी लिखा है कि आत्मनिर्भर भारत नीति के कारण वैज्ञानिक उपकरणों का आयात करना एक जटिल काम हो गया है. काफी समय लग रहा है. इसके लिए मंत्रालयों के सचिव से मंज़ूरी लेनी पड़ रही है. यही कारण है कि हम टेस्टिंग नहीं बढ़ा पा रहे हैं और न हम वायरस की सटीक जीन सिक्वेंसिंग कर पा रहे हैं. हम मांग कर रहे हैं कि ऐसे अंकुशों को हटा लिया जाए.

वैज्ञानिक डेटा ही नहीं मांग रहे हैं बल्कि यह भी कह रहे हैं कि आत्मनिर्भर भारत की नीति ने उनके काम को कितना मुश्किल कर दिया है. इसमें एक पोज़िटिव न्यूज़ है कि पत्र लिखने के लिए वैज्ञानिकों को जेल नहीं भेजा गया है. पोस्टर लगाने वाले को ही भेजा गया है.

22 अप्रैल को कैरवान पत्रिका की विद्या कृष्णन रिपोर्ट करती हैं कि कोविड से लड़ने के लिए जो टास्क फोर्स बनाया गया है उसकी एक भी बैठक फरवरी और मार्च में नहीं हुई. इस साल 11 जनवरी को टास्क फोर्स की बैठक हुई थी. उसके बाद 15 और 21 अप्रैल को हुई है. जब तबाही का तूफान आया है. फरवरी महीने में जब अमरावती में तेज़ी से संक्रमण फैला था और तालाबंदी हुई थी तभी इन वैज्ञानिकों ने चेतावनी दे दी थी. तब भी इस टास्क फोर्स की बैठक नहीं बुलाई गई. कैरवान की रिपोर्ट है. हिंदी में भी छपी है.

एक जानकारी और देता हूं. कैरवान की रिपोर्ट के अनुसार जुलाई 2020 के बाद से भारतीय चिकित्सा शोध परिषद ICMR ने 9 महीने तक इलाज का प्रोटोकोल ही अपडेट नहीं किया. अप्रैल महीने में अपडेट किया गया है. अगर यह सही है तो कितना गंभीर है. डर बीजेपी के खेमे में भी है. यूपी के सीतापुर के विधायक राकेश राठौड़ भी अपना डर बयान कर रहे हैं. जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि यहां का ट्रामा सेंटर पांच साल से बन कर तैयार है, चालू क्यों नहीं हुआ है. सीतापुर में अखिलेश यादव ने 2016 में एक बड़ा ट्रामा सेंटर बनवाया था. लेकिन आज तक वो चालू नहीं हुआ है. इस वक्त जब लोग जगह जगह अस्पताल की तलाश में मर गए ऐसी इमारतें खड़ी रह गईं.

प्रधानमंत्री मोदी का बयान आया है कि राज्यों को डेटा नहीं छिपाना चाहिए. प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से जारी बयान में जो लिखा है आप उन पंक्तियों को ग़ौर से सुनें. 15 मई को पत्र सूचना कार्यलय PIB की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि, प्रधानमंत्री ने कोविड और टीकाकरण से जुड़ी स्थिति को लेकर एक उच्च स्तरीय बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें उन्होंने कहा कि राज्यों को अपने प्रयासों का सही नतीजा न मिलने पर दिखने वाली बड़ी संख्या का दवाब न लेते हुए पारदर्शी तरीके से अपनी संख्या की जानकारी देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.

प्रधानमंत्री साफ साफ कह सकते थे कि मरने वालों का डेटा ईमानदारी से दिया जाए या संक्रमितों की संख्या सही बताई जाए. बस एक जनरल सी बात है. जिस प्रधानमंत्री से भारत के 900 वैज्ञानिक डेटा मांग रहे हैं, डेटा में पारदर्शिता मांग रहे हैं, वही प्रधानमंत्री संख्या को लेकर राज्यों को पारदर्शिता का सुझाव दे रहे हैं. पिछले साल से यह सवाल उठ रहा है कि टेस्टिंग का डेटा सही नहीं है और मरने वालों की संख्या सही नहीं है. अब सुझाव आया है. अमल का हाल और हश्र भी देख लीजिएगा.

पिछले हफ्ते के प्राइम टाइम में आपने भोपाल से हमारे सहयोगी अनुराग द्वारी की रिपोर्ट देखी होगी. भोपाल के श्मशान और कब्रिस्तान के आंकड़ों के हिसाब से 3811 लग मरे हैं. जबकि सरकारी आंकड़ों में 104 मरे हैं. क्या प्रधानमंत्री के सुझाव या निर्देश के बाद डेटा बदल जाएगा?

अनुराग की रिपोर्ट बताती है कि भोपाल के भदभदा श्मशान घाट में आज भी अंतिम संस्कार में लंबा इंतज़ार करना पड़ रहा है. 13-13 घंटे का इंतज़ार. कई जगहों पर श्मशान में अंतिम संस्कार से पहले आधार कार्ड की फोटो कापी मांगी जाती है. यह एक अलग टार्चर है कि आप फोटोकापी लेकर श्मशान जा रहे हैं. खैर कोर्ट चाहे तो स्वतंत्र जांच बिठा कर इन आधार कार्ड की सारी कापी कब्रिस्तान और श्मशान से ज़ब्त कर सकती है. कोविड के मरीज़ों की गिनती कोविड में न हो इसके लिए तरह तरह के नियम बनाए गए हैं. उसके बाद भी संख्या में इतना अंतर है कि छिपाए नहीं छिप रही है. गांवों की संख्या का तो किसी को पता ही नहीं है. गुजरात में दिव्य भास्कर ने एक रिपोर्ट छापी है कि गुजरात में मार्च से लेकर 1 मई तक 4,218 लोग कोविड से मरे. लेकिन इन 71 दिनों में एक लाख, 23 हज़ार 871 मृत्यु प्रमाण पत्र जारी हुए. पिछले साल इसी समय जारी मृत्यु प्रमाण पत्र से 65,781 अधिक मृत्यु प्रमाण पत्र जारी हुए हैं. इनमें से ज़्यादातर की मृत्यु कोविड से हुई है. इस खबर के बाद गुजरात के गृह राज्य मंत्री ने कहा कि यह निराधार है. मृत्यु की संख्या और मृत्यु प्रमाण पत्र की संख्या में अंतर हो सकता है. क्योंकि लोग मृत्यु के समय पर प्रमाण पत्र के लिए पंजीकरण नहीं कराते हैं. हम इससे भी इंकार नहीं कर सकते कि कभी कभी लोग एक से अधिक जगह पर रजिस्ट्रेशन करा लेते हैं.

गृहमंत्री के अनुसार लोग दो श्मशान में पंजीकरण करा रहे हैं लेकिन कोई दो दो मृत्यु प्रमाण पत्र लेकर क्या करेगा. क्या गृहमत्री की सफाई कबूल है? तो फिर प्रधानमंत्री की डेटा में पारदर्शिता की बात कैसे लागू होगी. दिव्य भास्कर के संपादक देवेंद्र भटनाकर ने अपनी खबर को लेकर ट्वीट किया है कि सारे मृत्यु प्रमाण पत्र मार्च से लेकर मई के बीच हुई मौतों के ही हैं. उनकी खबर सही है.

गुजरात के अखबारों ने कोविड से हुई मौत और इलाज में हो रही लापरवाही को लेकर शानदार रिपोर्टिंग की है. दिव्य भास्कर, गुजरात समाचार, सौराष्ट्र समाचार और संदेश ने. इंडियन एक्सप्रेस और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके पत्रकार दीपक पटेल हर दिन गुजरात को लेकर ट्वीट करते हैं.

संदेश अखबार ने गांधीनंगर के चालीस गांवों का सर्वे कराया तो पाया कि 2460 लोग मरे हैं. सरपंच और गांव के प्रभावशाली लोगों का कहना है कि ज़्यादातर लोग कोविड से मरे हैं. जबकि सरकारी आंकड़ों के हिसाब से पूरे गांधीनगर में महामारी शुरू होने से अब तक 185 लोग ही मरे हैं. दिव्य भास्कर ने भी खबर छापी है कि गांधीनगर के चार गांवों में कोविड से 690 लोग मरे हैं. जबकि गांधीनगर में कुल 252 गांव हैं. यानी संख्या कितनी अधिक हो सकती है. 14 मई को सौराष्ट्र समाचार के भावनगर संस्करण के 20 पन्नों में से छह पन्नों में 146 लोगों की श्रद्धांजलि छपी है. जबकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे सौराष्ट्र में 39 लोग मरे हैं.

मरने वालों की संख्या क्यों छिपाई जा रही है? प्रधानमंत्री के इस बयान का क्या मतलब रह जाता है कि अगर संख्या ज्यादा है तो राज्य ज़्यादा बताएं. क्या सिर्फ दिखाने के लिए यह बयान दिया गया है कि राज्यों से कहा गया था. ये सवाल तो पिछले साल भी उठे थे. क्या हुआ. क्या प्रधानमंत्री गुजरात सरकार से कह सकते हैं कि मरने वालों का आंकड़ा सही करे और गुजरात सरकार कर देगी? क्या सरकार घर घर सर्वे कराने जा रही है जिनकी मौत कोविड से हुई है?


यूपी से आपने ऐसी कितनी ही रिपोर्ट देख ली होगी. कमाल खान की रिपोर्ट है कि गंगा के किनारे बसे दूसरे शहरों की तरह प्रयागराज में भी गंगा किनारे श्रृंगवेरपुर, झूंसी और फाफामऊ तीन अलग अलग जगहों पे बड़े पैमाने पर क़बरें नज़र आने लगी हैं. यहां इतने ज़्यादा शव हो गए हैं कि कई लोग यहां शव दफना कर उसके चारों तरफ बांस गाड़ कर घेरा बना दे रहे हैं ताकि कोई खाली जगह समझ कर उसे दूसरा शव दफनाने के लिए खोद न दे. इन घाटों पे रहने वाले पंडे कहते हैं कि पहले भी कुछ लोग शवों को दफनाते रहे हैं, लेकिन महामारी के बीच इनकी तादाद बहुत ज़्यादा बढ़ गयी है. कोरोना से डर भी है और गरीबी भी कारण है. ऐसे में वे भी शवों को चुपचाप बालू में गाड़ कर चले जाते हैं. अब सरकार ने इन जगहों पर जल पुलिस और एसडीआरएफ़ की पेट्रोलिंग शुरू कर दी है. वे लोगों को पारंपरिक तरीके से अंतिम संस्कार के लिए प्रेरित कर रहे हैं. सरकार ने उसके लिए मुफ्त लकड़ी देने को कहा है. उन्नाव और कन्नौज से भी ऐसी ही खबरें आ रही हैं.

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दैनिक भास्कर ने खबर छापी कि गंगा किनारे के 27 ज़िलों में 2000 शव बहते हुए या नदी किनारे दफ़न पाए गए हैं. सरकारी आंकड़ों में मरने वालों की संख्या पर सवाल उठते रहेंगे, फर्क किसे पड़ता है. दुनिया भर की सरकारें ये घपला कर रही हैं. इसलिए अलग-अलग अर्थशास्त्री अपने मॉडल से दुनिया भर के देशों में मरने वालों की संख्या का अनुमान लगा रहे हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन की एक संस्था है Institute for health metrics and evaluation, इसने ये बोला है कि पिछले साल कोरोना शुरू होने से लेकर इस साल के 13 मई तक भारत में मरने वालों का आधिकारिक आंकड़ा 2 लाख, 48 हज़ार 16 है. जबकि उनके मॉडल के हिसाब अब तक 7,36,811 लोगों की मौत हुई है. 9 मई को ब्राउन यूनिवर्सिटी के डॉ आशीष झा के हिसाब से भारत में हर दिन 25 हज़ार के आस-पास लोग मर रहे हैं. Economist पत्रिका के हिसाब से भारत में इस साल दस लाख लोग मरे हैं. सरकारी आंकड़ों से 270 फीसदी अधिक मौतें हुई हैं. तो इतनी तबाही के बाद आप कहां है, झूठ के समंदर में. जहां सच का ऑक्सीजन है नहीं.