ट्रेन में टिकट नहीं है. टिकट के लिए पैसे का दबाव है. रेलवे को सब नहीं देखता है उसे सब कुछ प्रतिशत में दिखता है इसलिए रेलवे ने बताया कि सिर्फ़ 17% लोगों के ही सेंटर 5 सौ किलोमीटर से दूर दिए जा रहे हैं. मगर रेलवे ने ये नहीं बताया कि 17 प्रतिशत का मतलब आठ लाख है. आठ लाख छात्रों को पांच सौ किलोमीटर से लेकर दो हज़ार किलोमीटर दूरी के सेंटर देने का क्या तुक है? क्या उनके लिए दो चार पांच दिन अतिरिक्त रूप से परीक्षा नहीं हो सकती थी? यह दलील भी विचित्र है कि जिन्होने देरी से फ़ॉर्म भरे हैं, उन्हीं का सेंटर दूर है. वैसे तो मुझे कई छात्रों ने बताया कि उन्होंने शुरू में फ़ॉर्म भरा था मगर उनका सेंटर भी बहुत दूर है. क्या रेलवे ने छात्रों को बताया था कि देरी से भरने का क्या मतलब है? उन्हें फ़ॉर्म पहले दो दिन में ही भर देने चाहिए वरना उनका सेंटर बहुत दूर पड़ सकता था? दो साल से रेलवे इस बात का प्रचार कर रहा है कि दुनिया की सबसे बड़ी ऑनलाइन परीक्षा होने जा रही है और जब परीक्षा होने जा रही है तब उसकी ये हालत है कि रेलवे के पास परीक्षा आयोजित कराने के केंद्र नहीं हैं.
क्या ये केन्द्र बेंगलुरु में भी नहीं है वहां के छात्रों को चंडीगढ़ और भोपाल भेजा जा रहा है. मैं नीचे कुछ छात्रों के मैसेज की कॉपी पोस्ट कर रहा हूं. आप देखिए कि वे किस मानसिक स्थिति से गुज़र रहे हैं. आख़िर 47,56,000 में से 8 लाख को दूर भेजने का क्या मतलब है? रेलवे ने ये बंटवारा क्यों किया? क्या इसलिए कि बहुत से छात्र गरीबी के कारण दूर के सेंटर पर न जा सकें?
एक समस्या और है. दूर सेंटर के कारण जो आसपास की दूसरी परीक्षाएं हैं, यूनिवर्सिटी और नौकरी की, उससे छात्र वंचित हो सकते हैं. मुझे कई छात्रों ने इस बारे में भी लिखा है कि उनकी दूसरी परीक्षाएं छूट जा रही है. इससे उनके अवसरों पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है.
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