टेक्सटाइल सेक्टर में 6000 करोड़ से आने वाला 1 करोड़ रोज़गार कहां गया?

सरकार कभी नहीं बताती कि कितनों को रोज़गार मिला लेकिन यह ज़रूर बताती है कि फलां योजना में कितनों को रोज़गार मिलेगा. मिलेगा के नाम पर आंकड़ा कुछ भी बता दिया जाता है, कभी 50 लाख तो कभी एक करोड़ तो कभी साढ़े सात लाख.

सरकार कभी नहीं बताती कि कितनों को रोज़गार मिला लेकिन यह ज़रूर बताती है कि फलां योजना में कितनों को रोज़गार मिलेगा. मिलेगा के नाम पर आंकड़ा कुछ भी बता दिया जाता है, कभी 50 लाख तो कभी एक करोड़ तो कभी साढ़े सात लाख. आप मंत्रियों के पुराने बयान को निकालेंगे तो यह तो पता चलेगा कि इतना लाख रोज़गार मिलने वाला है लेकिन फिर उस पर दोबारा प्रेस कांफ्रेंस नहीं होती है कि हमने कहा था इतना लाख मिलेगा लेकिन मिला उससे कम या ज़्यादा.

22 जून 2016 की यह प्रेस कांफ्रेंस है. उस दिन टेक्सटाइल सचिव रश्मि वर्मा ने प्रेस को बताया था कि केंद्र सरकार ने टेक्सटाइल सेक्टर के लिए 6000 करोड़ के पैकेज देने का फैसला किया है. इस पैकेज की मदद से तीन साल के भीतर एक करोड़ लोगों को रोज़गार दिया जाएगा. उसके बाद कई अखबारों ने इस पैकेज की खबर को प्रमुखता से छापा. क्या तीन साल में एक करोड़ रोज़गार पैदा हुआ. 2016 से 2021 आ गया है, यह भी जा रहा है, क्या सरकार बता सकती है कि 6000 करोड़ के पैकेज से 2016 से 2019 के बीच एक करोड़ रोज़गार पैदा हुआ या नहीं. क्या एक करोड़ रोज़गार नहीं मिलने की आपने कोई हेडलाइन देखी है?

इस प्रेस कांफ्रेंस की याद इसलिए आई क्योंकि बुधवार को केंद्र सरकार ने इसी तरह का एलान किया और प्रेस कांफ्रेंस की. इस प्रेस कांफ्रेंस में फिर से टेक्सटाइल सेक्टर को अगले पांच साल के लिए पैकेज देने का एलान किया जाता है. 10683 करोड़ का. एक महीना पहले 6 अगस्त को कपड़ा राज्य मंत्री ने संसद में लिखित जवाब में कहा था कि सरकार ने 10,683 करोड़ की योजना को मंज़ूरी दे दी है. सरकार लिखा है मंत्रालय नहीं. कल की खबर है कि कैबिनेट ने मंज़ूरी दी है. कैबिनेट की बैठक से पहले ही संसद में इसकी सरकारी मंज़ूरी की खबर दी चुकी थी. क्या कैबिनेट ने सरकार द्वारा मंज़ूर हो चुके फैसले को मंज़ूरी दी है? नहीं तो कैबिनेट की मंज़ूरी के पहले मंत्री सदन में किसकी मंज़ूरी की जानकारी रख रही थीं.

इस मौके पर मंत्रियों ने कहा कि साढ़े सात लाख रोज़गार पैदा होंगे और कुछ और लाख. हम यह नहीं समझ पाए कि किस हिसाब से साढ़े सात लाख गिन लिया गया और उसी हिसाब से कुछ लाख और की गिनती क्यों नहीं हो सकी. क्यों सरकार ने कहा कि साढ़े सात लाख और कुछ लाख रोज़गार पैदा होगा. दूसरा सवाल यह है कि 10,683 करोड़ के पैकेज से सिर्फ साढ़े सात लाख और कुछ लाख रोज़गार पैदा होता है? 2016 में 6000 करोड़ के पैकेज से 1 करोड़ रोज़गार पैदा हो रहा था. ज़्यादा बजट से कम रोज़गार और कम बजट से करोड़ रोज़गार पैदा होने का गणित आप ही समझ सकते हैं अगर आपको समझ आती है तो.

2016 में एक करोड़ रोज़गार पैदा करने का जो दावा किया गया था वो सरकार ने किया था. आपने अभी सुना कि उस समय की टेक्सटाइल सचिव रश्मि वर्मा खुद कह रही हैं. जिस विभाग के पास यह हिसाब लगाने की क्षमता होती है कि कितनों को रोज़गार मिला वही विभाग कहे कि रोज़गार का डेटा नहीं है तो फिर आप स्तब्ध रह जाते हैं. जब आप रोज़गार का डेटा नहीं रखते हैं तो फिर कितना रोज़गार मिलेगा, कैसे बता देते हैं. कपड़ा राज्य मंत्री दर्शना जारदोश सूरत से सासंद हैं जो कपड़ा व्यापार का केंद्र है. इस छह अगस्त को मंत्री जी जवाब देती हैं कि सरकार टेक्सटाइल सेक्टर में रोज़गार पैदा होने का लक्ष्य नहीं तय करती है. अंग्रेज़ी में लिखा है The Government does not fix target for employment generation in textile sector. यह सवाल बीजेपी के सांसद अशोक महादेवराव नेते ने ही पूछा था कि क्या यह सही है कि पिछले पांच वर्षों में टेक्सटाइल सेक्टर में लक्ष्य से बहुत कम रोज़गार पैदा हुआ है.

सरकार कैसे चल रही है इसे पता करते करते हम कई घंटे कंप्यूटर पर बैठे रह जाते हैं. चल नहीं पाते हैं. अब आपने सुना और देखा कि सरकार कह रही है कि वह टेक्सटाइल सेक्टर में रोज़गार के आंकड़े फिक्स नहीं करती है. हंसिएगा नहीं, मुझे सीरीयस लोग पंसद हैं. 

12 मार्च 2020 को स्मृति ईरानी राज्यसभा में लिखित जवाब देती हैं कि सरकार ने 2016 में निवेश और करीब 1 करोड़ 11 लाख रोज़गार बढ़ाने के लिए 6000 करोड़ का पैकेज लांच किया है. इसकी भाषा बता रही है 2016 से 19 का यह पैकेज 2020 में भी पूरी तरह लांच नहीं हुआ है क्योंकि मंत्री कह रही हैं कि इससे 1 करोड़ 11 लाख रोज़गार पैदा होगा.

मतलब तीन साल में हुआ नहीं. अब देखिए जो संख्या 2016 से 1 करोड़ थी 2020 में 1 करोड़ 11 लाख हो गई. कितनी सटीक संख्या है तभी तो 1.11 करोड़ कहा गया है. लेकिन वही सरकार उसी संसद में कहती है कि रोज़गार के टारगेट फिक्स नहीं करती, उसी सरकार की मंत्री उसी संसद में रोज़गार के टारगेट बताती हैं. यही नहीं जब सरकार संसद में कहती है कि नौकरी का डेटा नही है, वह टारगेट नहीं फिक्स करती है तो फिर उसके कुछ हफ्ते बाद प्रेस कांफ्रेंस में क्यों कहती है कि साढ़े सात लाख रोज़गार पैदा होगा? हेडलाइन तो छप जाएगी लेकिन जब आप पूछेंगे तीन साल बाद तो जवाब मिलेगा कि टारगेट फिक्स नहीं करते. आप समझ रहे हैं न कि क्यों नहीं समझ आ रहा है. Do you get my point.

2017 में मोदी सरकार के तीन साल पूरे हुए थे. उसकी खुशी में बीजेपी MODIFEST मना रही थी. भारत के 120 शहरों में 26 मई से 15 जून तक MODIFEST बनाने का एलान किया गया था. इसी कार्यक्रम का एलान करते हुए स्मृति ईरानी यूपीए की सरकार की आलोचना कर रही हैं कि उस सरकार के समय टेक्सटाइल जैसे बड़े सेक्टर में डेटा तक ठीक से नहीं रखा जाता था. अभी आपने सुना कि किस तरह 2020-21 में मोदी सरकार के मंत्री कह रहे हैं कि कोई डेटा नहीं है और न ही कोई टारगेट सेट किया जाता है. एक एक लाइन ध्यान से सुनेंगे तो आपको शुरू की बातों को देखने का व्यापक संदर्भ मिलेगा.

अगर 2017 में कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी के द्वारा डेटा सेंटर रिवाइव किया गया था वो कहां है, वही क्यों नहीं बता रहा है कि 6000 करोड के पैकेज से एक करोड़ रोज़गार मिला या नहीं. उसका हिसाब कहां से पता चलेगा? टेक्सटाइल पैकेज की हकीकत का आलम यह है कि अगस्त 2019 में इंडियन एक्सप्रेस में नार्दन इंडिया टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन ने आधे पन्ने का एक विज्ञापन ही छपवा दिया. जिसमें बताया गया कि भारत का कताई उद्योग सबसे बड़े संकट का सामना कर रहा है, भारी संख्या में नौकरियां जा रही हैं. विज्ञापन में लोगों को कतार में खड़े दिखाया गया जिसके सामने नो जॉब की तख़्ती टंगी है. लिखा था कि कताई क्षमता का एक तिहाई बंद हो चुका है. करोड़ों का नुकसान हुआ है. कताई मिलें भारत के किसानों से कपास ख़रीदने की स्थिति में नहीं हैं. इसका असर कपास के किसानों पर भी पड़ने वाला है. अगले सीज़न में 80,000 करोड़ के कपास उत्पादन की आशा है. अगर यह कपास नहीं बिका तो टेक्सटाइल का संकट खेती तक पहुंचेगा. खेती के बाद रोज़गार के सबसे बड़े सेक्टर की यह हालत है.

सवाल है कि छह हज़ार करोड़ का पैकेज देने के बाद भी ऐसी हालत क्यों हुई. कभी ऐसा नहीं हुआ था कि कोई सेक्टर अपनी व्यथा सुनाने के लिए विज्ञापन दे. 2016 के पैकेज से तीन साल में एक करोड़ रोज़गार का सृजन होना था, तीसरे साल में ये हालत हो गई. उस समय 20 अगस्त 2019 के प्राइम टाइम में टेक्सटाइल एसोसिएशन के एक सदस्य ने कहा कि 25 से 50 लाख के बीच नौकरियां जा चुकी हैं. टेक्सटाइल सेक्टर में बिक्री 30 से 35 परसेंट घट गई है. निर्यात 30 प्रतिशत से अधिक कम हो गया है. एक करोड़ रोज़गार देेने की बात हुई थी पचास लाख के जाने की बात आ गई. यह तबकी बात है जब कोरोना का कहर नहीं आया था. यानी पहले से यह सेक्टर पिछड़ता जा रहा था.

2019 में इस विज्ञापन के छपने के बाद हमने कई लोगों से बात करने का प्रयास किया था लेकिन डर के मारे किसी ने ज़ुबान नहीं खोली. ज़ाहिर है कि 2016 के पैकेज से एक करोड़ रोज़गार पैदा नहीं हुआ होगा. जब सेक्टर ही बैठ गया तो रोज़गार कहां से पैदा होता. जिस सेक्टर में 10 करोड़ से अधिक लोग रोजगार और कारोबार पाते हों उसकी ये स्थिति है 2019 में. अब हर साल कोई दो हज़ार करोड़ देकर इस सेक्टर को सहारा दिया जा रहा है ताकि साढ़े सात लाख रोज़गार पैदा हो.

16 अगस्त 2019 कंफेडरेशन आफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को 16 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी है. इसमें बताया गया है कि एक साल के भीतर निर्यात में ही 35 प्रतिशत की कमी आ गई. अप्रैल से लेकर जून 2019 के बीच बांग्लादेश से आयात 40 प्रतिशत बढ़ गया है. यानी भारत के टेक्सटाइल मार्केट में बांग्लादेश ने अपनी बढ़त बना ली है. यही नहीं चीन ने भारत का धागा लेना कम कर दिया है. वह भारत की जगह वियतनाम से धागा ख़रीदने लगा है. भारत 2013 से 2018 के बीच चीन को जितना निर्यात कर रहा था उसकी तुलना में 37 फीसदी निर्यात कम हो गया है. इस बीच वियतनाम ने चीन को धागा निर्यात करने के मामले में 139 प्रतिशत की बढ़त हासिल की है. 2016 में भी पैकेज देकर कहा गया कि बांग्लादेश और वियतनाम से मुकाबला करने के लिए कंपनियों को मदद दी जा रही है. इस मदद की ये हालत है कि 2021 की प्रेस कांफ्रेंस में भी मंत्री बांग्लादेश और वियतनाम का नाम जपते रहे कि भारतीय कंपनियां इनका मुकाबला कर सकेंगी. इकनोमिक टाइम्स को दिए इंटरव्यू में टेक्सटाइल सचिव उपेंद्र प्रसाद सिंह ने भी यही सब कहा है.

फरवरी 2020 में भी कंफेडरेशन आफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री की रिपोर्ट है कि अप्रैल 2020 से जनवरी 2021 के बीच टेक्सटाइल सेक्टर में माइनस 26.6 प्रतिशत की गिरावट आई है. पहनने वाले कपड़ों के सेक्टर माइनस 35 परसेंट नीचे चला गया है. यह भारत का सबसे अधिक रोज़गार देने वाले सेक्टरों में से एक है. आप समझ सकते हैं क्या इस सेक्टर में कितनी नौकरियां गई होंगी. इससे पता चलता है कि 6000 करोड़ का पैकेज और एक करोड़ रोज़गार देने का एलान हेडलाइन के लिए ही बड़ा था. अब इस पैसे से उद्योग को कितना फायदा हुआ और उसमें काम करने वाले लोगों के हाथ में कितना गया, इसका अंदाज़ा लगा सकते हैं लेकिन इस खेल को समझाने के लिए आंकड़े नहीं मिले. लेकिन सवाल पूछा जाना चाहिए कि ये पैकेज कंपनियों के मुनाफे में जा रहा है या रोज़गार पैदा करने में. आप कहेंगे कि टीवी में इतना डेटा देना बोरिंग हो जाता है लेकिन खेल तो दिलचस्प है. जब आप खेल समझेंगे तो डेटा बोरिंग नहीं लगेगा.

12 मार्च 2020 को राज्यसभा में सरकार ने कहा कि टेक्सटाइल सेक्टर को टेक्नालजी सुधार में मदद के लिए 2016-22 के बीच 17, 822 करोड़ दिया जा रहा है जिससे 2022 तक एक लाख करोड़ का निवेश होगा और रोज़गार पैदा होगा.

क्या 2016-22 के बीच 17,822 करोड़ खर्च हुआ? कहीं इसी का बचा पैसा तो नए फैसले के कवर में घोषित नहीं हुआ है? क्योंकि हमने 2016 से लेकर अब तक बजट में Amended Technology Upgradation Fund Scheme के तहत कितना पैसा दिया गया है, उसे जोड़ा तो आठ हज़ार करोड़ भी नहीं है. वैसे आपको जानना चाहिए कि कपड़ा मंत्रालय का 2020-21 का बजट 3514 करोड़ था जिसे संशोधित बजट में 3300 करोड़ कर दिया गया. मुमकिन है बहुत सारा डेटा होने के कारण आपके ध्यान से कुछ बातें छूट गई हों इसलिए आप जब यू ट्यूब में दोबारा देखेंगे तो हेडलाइन का यह खेल समझ आ जाएगा.

करनाल में लघु सचिवालय के बाहर किसानों का धरना जारी है. जैसे जैसे किसानों की संख्या बढ़ रही है कि पुलिस और RAF की भी तैनाती बढ़ रही है. गुरुवार को प्रशासन ने अपना पक्ष जारी किया. यहां लंगर की व्यवस्था भी बढ़ती जा रही है. करनाल गए हमारे सहयोगी रवीश रंजन का कहना है कि सिंघु बार्डर और गाज़ीपुर बार्डर की तरह करनाल का धरना भी लंबा खींचता हुआ दिख रहा है. करनाल मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का क्षेत्र है. बुधवार को प्रशासन ने बात की थी लेकिन आज दोपहर के दो बजे तक बातचीत का कोई न्यौता नहीं आया. यह सवाल उठने लगा कि क्या सरकार अब आगे बातचीत नहीं करेगी. उधर हरियाणा सरकार ने गन्ने के दाम बढ़ा दिए हैं और कहा है कि किसानों को पंजाब के मुख्यमंत्री की तरह हरियाणा के मुख्यमंत्री को भी मिठाई खिलानी चाहिए.

हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज का बयान इस ओर इशारा करता है. उन्होंने कहा कि किसानों की IPC और देश की IPC अलग नहीं हो सकती है. सरकार वही मानेगी जो जायज़ मांग होगी. किसी के कहने पर किसी को फांसी पर नहीं लटकाया जा सकता है. सरकार निष्पक्ष जांच के लिए तैयार है लेकिन सिर्फ एक अधिकारी की नहीं पूरे करनाल प्रकरण की जांच होगी.

प्रधानमंत्री फसल बीमा से कई राज्य अलग हो चुके हैं. इसमें बीजेपी शासित बिहार भी है औऱ गुजरात भी. बंगाल और पंजाब भी अलग हो चुके हैं. इन राज्यों का कहना है कि बीमा कंपनियां प्रीमियम बहुत लेती हैं जिसके कारण सरकार के खज़ाने पर दबाव पड़ता है और किसानों को मुआवज़ा भी कम देती हैं. संसद की स्थायी समिति ने भी फसल बीमा योजना को लेकर कई गंभीर टिप्पणियां की हैं जिसके बारे में हमने दो दिन 14 और 15 जनवरी को प्राइम टाइम में बताया था. आज कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने एक ट्वीट किया. ट्विट प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के हैंडल से हुआ है और मंत्री जी ने उसे दोबारा ट्वीट किया है.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पर इन दिनों एक हैशटैग अभियान चल रहा है. हैशटैग PMFBY FOR KISAN, इसमें किसानों को सेल्फी लेकर भेजने के लिए कहा गया है. यह उन किसानों के लिए है जिन्होंने बीमा करवाया हुआ है. इस में जीतने पर 21000 रुपये दिए जाएंगे. कुल मिलाकर समां बांधा जा रहा है कि यह योजना सफल है. इसी ट्विटर हैंडल पर हमें ये पोस्टर मिला जिसे कृषि मंत्री ने ट्वीट किया है.

एक पोस्टर बनाया गया है जिसमें तस्वीरों से समझाया गया है कि फसल बीमा किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक है. अब इसके ऊपर टेक्स्ट में लिखा है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरूआत से रबी 2020-21 क किसानों द्वारा चुकाए गए 21,484 करोड़ रुपये के प्रीमियम के एवज में कृषि एवं कृषि कल्याण मंत्रालय द्वारा 99,044 करोड़ रुपये दावों का निपटारन किया जा चुका है. यह आंकड़े PMFBY द्वारा किसानों को दिए गए सतत आर्थिक सहयोग को दर्शाते हैं.

अब इस ट्वीट में यह नहीं बताया गया है कि प्रीमियम के तौर पर सरकार ने अभी तक कितना पैसा बीमा कंपनियों को दिया है. किसानों का हिस्सा बताया गया है कि उन्होंने 21,484 करोड़ प्रीमियम दिया और दावा मिला 99,044 करोड़. लेकिन सरकार ने कितना दिया? क्या सरकार नहीं बताना चाहती कि बीमा कंपनियों को कितना फायदा हुआ? यही बात किसान नेता भी कह रहे हैं कि बीमा योजना से बीमा कंपनियों को 30 से 35000 करोड़ का फायदा हुआ है. इसी 10 अगस्त को लोकसभा में संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट पेश हुई है. उसमें बताया गया है कि गुजरात में 2016 के खरीफ के सीज़न से 2019 के खरीफ के सीज़न तक 12,021 करोड़ का प्रीमियम दिया गया. किसानों को मुआवज़ा मिला 5232 करोड़. यानी गुजरात में ही खरीफ़ की फसल की बीमा से तीन साल में बीमा कंपनियों को 6 हज़ार करोड़ से अधिक का मुनाफा हुआ. इस दौरान सभी राज्यों में बीमा कंपनियों को प्रीमियम के रूप में 99550 करोड़ मिला. बीमा कंपनियों ने दावे के रुप में मात्र 76000 करोड़ के करीब दिया. यानी उन्हें 24000 करोड़ से अधिक का फायदा हुआ.


इस रिपोर्ट को पढ़िए. तो अभी जो हैशटैग PMFBY FOR KISAN चल रहा है उसकी हकीकत का पता चलेगा. बिहार में तो 2444 करोड़ का प्रीमियम दिया गया और किसानों को दावे के रुप में मिला 749 करोड़. बिहार जैसे गरीब राज्य में ही बीमा कंपनियों को 1700 करोड़ का फायदा हुआ. किसान फसल के नुकसान की भरपाई के लिए जितना दावा करते हैं, बीमा कंपनियां उतना नहीं देती हैं. हमने कई जगहों से इसे लेकर रिपोर्ट की है. किसानों के अलग अलग अनुभव रहे हैं.

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भारत का किसान एक लीटर डीज़ल पर करीब 50 रुपये टैक्स देता है. ऊपर से बीमा का प्रीमियम भी दे रहा है. इसलिए सरकार जो प्रीमियम देती है उसमें किसानों का भी हिस्सा है. सरकार को बताना चाहिए कि केंद्र और राज्य ने मिल कर कितना प्रीमियम दिया है. बताने का मतलब है ट्वीट करना चाहिए पोस्टर बनाकर. कृषि मंत्री को बताना चाहिए कि बिहार और गुजरात की सरकार फसल बीमा से क्यों बाहर हैं, अगर यह योजना इतनी ही सफल है तो.