राहत इंदौरी का शेर है - 'चराग़ों को उछाला जा रहा है, हवा पर रौब डाला जा रहा है... न हार अपनी न अपनी जीत होगी, मगर सिक्का उछाला जा रहा है ...'
उपराज्यपाल के बिना किसी ठोस आश्वासन के धरना राजनीति के भारीभरकम नेता अरविंद केजरीवाल को बड़े हल्के तरीके से खत्म करना पड़ा...मई के महीने में भी अरविंद केजरीवाल ने तीन घंटे का धरना उपराज्यपाल हाउस पर दिया था...तभी से उपराज्यपाल की टीम और उनके खास सलाहकार इस बात पर एक मत थे कि अगली बार केजरीवाल के धरने की ललकार पर तुरंत अपनी जगह और अपने वक्त में घेर लेना है...अरविंद केजरीवाल समझदार राजनीतिक खिलाड़ी हैं लेकिन उनकी कमी भी जिद है और यही उनकी ताकत...हर बार धरने की जिद उनकी ताकत साबित होती थी लेकिन इस बार गलत जगह और समय ने उनकी जिद को कमजोरी साबित कर दिया...अब शायद राजनीति में धरने का ये शाट्स वो कभी न खेलना चाहेंगे क्योंकि ये उनकी कमी के तौर पर जगजाहिर हो चुकी है....विरोधियों की कमी पर तंज कसने और उसका मजाक बनाने में माहिर नरेंद्र मोदी इसका इस्तेमाल चुनाव प्रचार के दौरान जरूर करेंगे क्योंकि उनके सिपहसलार उपराज्यपाल ने नौकरशाहों के जरिए विरोधियों को थका कर वापस जो भेज दिया...हालांकि लोकतंत्र के लिए ये कोई अच्छी परिपाटी नहीं है...लेकिन नरेंद्र मोदी और उनकी टीम संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को तार तार करने में भला पीछे कब रही है?
उधर अरविंद केजरीवाल की राजनीति के प्रशंसक मानते हैं कि धरने ने उन्हें बीजेपी के खिलाफ हो रहे महागठबंधन में एक मजबूत विपक्षी नेता के तौर पर स्थापित किया है वो भी कांग्रेस के इग्नोर करने के बावजूद और इस धरने से ये भी पता लगा है कि कांग्रेस के भीतर केजरीवाल को लेकर असमंजस की खाई बहुत चौड़ी है...लेकिन मेरी नजर में चार राज्यों के मुख्यमंत्री शनिवार को अरविंद केजरीवाल के घर जरूर आए लेकिन वो ये कहना भी नहीं भूले कि अरविंद केजरीवाल की जगह अगर कोई बीजेपी का मुख्यमंत्री भी होता तो वे सॉलिडारिटी प्रकट करने जरूर आते....फिर इन चारों मुख्यमंत्रियों का अरविंद केजरीवाल से धरना खत्म करने की अपील न करना मेरे नजदीक अरविंद केजरीवाल से सहानुभूति कम और नरेंद्र मोदी को तानाशाह साबित करना ज्यादा था...
खुद आम आदमी पार्टी के सबसे व्यवहारिक राजनेता संजय सिंह मानते हैं कि कभी कभी अतिउत्साह में उनके साथी आंदोलन शुरू करते हैं...इस धरने को करने से पहले केजरीवाल ने अपने धरना साथियों से कितनी चर्चा की...इस पर मेरी जानकारी शून्य है...जनता की यादश्त बहुत कमजोर होती है...दिल्ली में इस तरह की हल्की राजनीतिक धमाचौकड़ी अभी होती रहेगी क्योंकि ये वक्त गंभीर नेताओं का नहीं बल्कि नेताओं के टीवी एक्टर बनने का है इसीलिए वेटिंग रूम के इस सबसे लंबे धरने को राजनीतिक चतुरता के लिए कम बल्कि राजनीतिक चुटकुले के तौर पर ज्यादा याद किया जाएगा....
रवीश रंजन शुक्ला एनडटीवी इंडिया में रिपोर्टर हैं.
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OPINION
This Article is From Jun 19, 2018
अरविंद केजरीवाल को इस धरने से क्या मिला?
राहत इंदौरी का शेर है - 'चराग़ों को उछाला जा रहा है, हवा पर रौब डाला जा रहा है... न हार अपनी न अपनी जीत होगी, मगर सिक्का उछाला जा रहा है ...'
- जून 19, 2018 21:14 pm IST
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Arvind Kejariwal